GSEB Class 11 Hindi Vyakaran काव्य गुण-दोष-विवेचन (1st Language)

   

Gujarat Board GSEB Solutions Class 11 Hindi Vyakaran काव्य गुण-दोष-विवेचन (1st Language) Questions and Answers, Notes Pdf.

GSEB Std 11 Hindi Vyakaran काव्य गुण-दोष-विवेचन (1st Language)

काव्य गुण

1. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए :

प्रश्न 1.
काव्य में गुण की क्या उपादेयता है?
उत्तर :
गुण के उचित प्रयोग से काव्य उदात्त बनता है और काव्य-सौंदर्य में वृद्धि होती है।

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प्रश्न 2.
गुण का संबंध किन काव्यांगों से अनिवार्य रूप से है?
उत्तर :
काव्य की विषयवस्तु, पात्र एवं रस से गुण का अनिवार्य संबंध होता है।

प्रश्न 3.
प्रयोग के आधार पर गुण के कौन-कौन-से प्रकार हैं?
उत्तर :
प्रयोग के आधार पर गुण के तीन प्रकार होते हैं :

  • ओज गुण
  • माधुर्य गुण
  • प्रसाद गुण।

2. संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए :

(1) ओज गुण
(2) प्रसाद गुण
(3) माधुर्य गुण
उत्तर :
(1) ओज गुण : ओज गुण का संबंध मुख्य रूप से ‘वीर रस’ की रचनाओं से होता है, साथ ही कभी-कभी ‘रौद्ररस’ और ‘वीभत्स रस’ में भी इसका प्रयोग होता है। ‘ओज गुण’ के कारण काव्य में ओजस्विता आती है, जिससे पाठक का श्रोता में स्फूर्ति का संचार होता है, उसका अंग-अंग फड़कने लगता है। भाषा की दृष्टि से कठोर वर्णयुक्त शब्दों; सामासिक, संधियुक्त पद ‘ओज गुण’ के लिए अनुकूल माने गए हैं; जैसे –

निकसत म्यान से मयूखें प्रलैं भानु केसी,
फोर तम तोय में गयंदन के जाल को।
लागति लपरि कंठ बैरिन के नागिन सी,
रुद्रहि रिझावै दें दै मुंडन के मालको।।

– भूषण

(2) ‘प्रसाद गुण’ : इस गुण के कारण काव्यार्थ सीधे पाठक या श्रोता के हृदय में उतरकर उसे निर्मल आनंद प्रदान करता है। यह गुण किसी रस-विशेष के लिए नहीं है। इसका प्रयोग सभी स्थानों पर आवश्यकतानुरुप होता है; जैसे –

जाकी रही भावना जैसी। प्रभु मूरति देखी तिन तैसी।।
देखहि भूप महारनधीरा। मनहुँ वीररस धरे सरीरा।।
पुरवासिन देखेउ दोउ भ्राता। नरभूषण लोचन सुखदाता।।

– तुलसीदास

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इसका संबंध प्रासादत्मकता, प्रवाहिता, निर्मलता से है।
(3) माधुर्य गुण : माधुर्य गुण के कारण कवि पाठक या श्रोता के पढ़ने या सुनने में अच्छा लगता है और उसका भाव-अर्थ हमारे मन को द्रवित करके हमें आनंदविभोर कर देता है; जैसे –

चमचमात चंचल नयन बिच घूघट-पट झीन।
मानहु सुर-सरिता-विमल-जल उछरत जुगमीन।।

– बिहारी

माधुर्य गुण श्रृंगार, करुण और शांत रसों के लिए अधिक अनुकूल माना गया है। कोमल वर्णों का प्रयोग, संधि या सामासिक .. पदों की न्यूनता इसके लिए जरूरी है। विषयवस्तु की कोमलता – प्रेम, प्रकृति, भक्ति और निर्वेद इसके लिए जरूरी रहती है। शब्दचयन द्वारा लयात्मकता माधुर्य गुण में आती है। इसमें कठोर वर्णों (‘ट’ वर्ग) के प्रयोग का निषेध है।

काव्य-दोष

1. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए :

प्रश्न 1.
काव्यदोष से आप क्या समझते हैं?
उत्तर :
काव्य का भाव : अर्थग्रहण में बाधक तत्त्वों को काव्यदोष माना जाता है। काव्यदोष के कारण संप्रेषण में बाधा पहुँचती है।

प्रश्न 2.
काव्यदोष के मुख्य प्रकार कौन-कौन से हैं?
उत्तर :
काव्यदोष के मुख्य चार प्रकार बताए गए हैं :

  • शब्दगत दोष,
  • रसगत दोष,
  • अर्थगत दोष और
  • पदगत दोष।

प्रश्न 3.
शब्दगत काव्यदोष में किन-किन दोषों को समाविष्ट किया जाता है? किसी एक का उदाहरण दीजिए।
उत्तर :
शब्दगत काव्यदोष के अंतर्गत – श्रुति कटुत्व, कर्ण कटुत्व, न्यून पदत्व, च्युत-संस्कृति दोष, अधिक पदत्व, अश्लीलत्व, पुनरुक्त, निहितार्थ दोष, निरर्थक दोष, अवाचक दोष तथा अप्रयुक्त दोष आदि की गणना की जाती है। जहाँ मधुर पदों का प्रयोग किया जा सकता हो यदि वहाँ कटु पदों का प्रयोग किया जाए तो श्रुतिकटुत्व दोष उत्पन्न होता है;
जैसे –

कवि से कठिनतर कर्म की करते नहीं हम धृष्टता।
पर क्या न विषयोत्कृष्टता करती विचारोत्कृष्टता।।

ध्यान रहे कि यही श्रुतिकटुत्व रौद्र रस, वीर रस या वीभत्स रस में गुण बन जाता है।

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प्रश्न 4.
‘रसगत दोष’ से आप क्या समझते हैं, किसी एक रसगत दोष का उदाहरण दीजिए।
उत्तर :
रस के आस्वाद में बाधा डालनेवाले तत्त्वों को रसदोष कहते हैं। ये केवल किसी एक पद में ही नहीं वर्न काव्य और नाटक की प्रबंध रचना में भी हो सकते हैं। स्व-शब्दवाच्य, कष्टकल्पना (विभाव-अनुभाव की), प्रकृति-विपर्यय, अननुसंधान (अंगी की विस्मृति), अकांडप्रथन या अकांड छेदन, अनंद वर्णन आदि प्रमुख रसदोष हैं। कष्ट कल्पना : जहाँ विभाव-अनुभाव का ठीक-ठीक ज्ञान न हो सके कि किस रस का यह विभाव है या अनुभाव, वहाँ यह दोष होता है; जैसे –

उठति गिरति फिरि-फिरि उठति, उठि-उठि गिरि-गिरि जात।
कहा करौं कासों कहौं क्यों जीवै यहि भाँति।।

यहाँ नायिका की विरह दशा का वर्णन है किन्तु वह व्याधि के बहाने और ही लगती है।

प्रश्न 5.
स्वशब्दवाच्यदोष किसे कहते हैं? एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर :
जब कवि किसी रस के विभावानुभाव आदि की उपयुक्त योजना न कर उस रस का या उसके अंगों का कथन मात्र कर देता। है, तब वह स्वशब्दवाच्यदोष हैं; जैसे –

जात जगायो है न अलि, आँगन आयो भानु।
रसमोयो सोयो दोऊ, प्रेम समोयो प्रानु।।

यहाँ नायिका का स्वभाव व्यभिचारी भाववर्णन है। ‘सोने’ को और भाँति से कहना प्रेम की शब्द वाच्यता है।

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प्रश्न 6.
वर्णनदोष से क्या समझते हैं? एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर :
स्वेच्छाचारिता के कारण काव्य में विषय, भाव, भाषा, प्रकृति, अर्थ सभी का रूप विकृत होने लगा है इन्हें वर्णनदोष के अंतर्गत रखा गया है। प्रकृति-विरोध, अर्थ-विरोध, स्वभाव-विरोध, भाव-विरोध तथा अभिधेयार्थ-विरोध वर्णनदोष के प्रमुख प्रकार हैं। स्वभाव-विरोध दोष का एक उदाहरण देखिए –

पता नहीं था संगर में, फिर पलक भाँजते धमक गया।
बार किया, संहार किया, छिप गया अचानक चमक गया।

– श्याम नारायण पांडेय (हल्दीघाटी)

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