GSEB Solutions Class 9 Hindi Chapter 14 युग और मैं

   

Gujarat Board GSEB Hindi Textbook Std 9 Solutions Chapter 14 युग और मैं Textbook Exercise Important Questions and Answers, Notes Pdf.

GSEB Std 9 Hindi Textbook Solutions Chapter 14 युग और मैं

Std 9 GSEB Hindi Solutions युग और मैं Textbook Questions and Answers

स्वाध्याय

1. निम्नलिखित प्रश्नों के एक वाक्य में उत्तर दीजिए :

प्रश्न 1.
प्रस्तुत कविता के रचनाकार का नाम बताईए।
उत्तर :
‘युग और मैं’ कविता के रचनाकार नरेन्द्र शमां है।

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प्रश्न 2.
गगन और धरती से क्या हो रहा है?
उत्तर :
गगन से आग के गोले बरस रहे हैं और धरती से ज्वालाएं उठ रही है।

प्रश्न 3.
सात समंदर में क्या हो रहा है?
उत्तर :
सात समंदर में हिंसा की आग से पानी खौल रहा है।

प्रश्न 4.
काव्य-शीर्षक का समानार्थी शब्द दीजिए।
उत्तर :
कविता और जमाना।

2. संक्षेप में उत्तर लिखिए :

प्रश्न 1.
बुद्धि और हाथ किस कार्य के लिए हैं.?
उत्तर :
बुद्धि का कार्य संसार के अज्ञान को दूर करके यहाँ छाई जड़ता मिटाना है। हाथों का काम बुद्धि के मार्गदर्शन में पृथ्वी को स्वर्ग की तरह सुंदर बनाना है।

प्रश्न 2.
ज्ञान और पृथ्वी की कैसी स्थिति हो रही है.?
उत्तर :
ज्ञान अपनी गहराई खो रहा है। पुथ्वी दु:ख के समुद्र में डूब रही है।

प्रश्न 3.
मानव की क्या स्थिति हो गयी है?
उत्तर :
मानव ईश्वर बनने का प्रयास कर रहा था। उसे सारी सृष्टि पर अपना नियंत्रण स्थापित करना था। परंतु आज वह सब छोड़कर अपने ही विनाश में लग गया है।

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3. सविस्तार उत्तर दीजिए :

प्रश्न 1.
कवि के हृदय में कैसी व्यथा है?
उत्तर :
कवि संसार में हो रहे संहार के दृश्यों को देखकर बहुत दुखी है। उसे लगता है कि ऐसी स्थिति में उसकी चिंता करनेवाला कोई नहीं है। उसकी करुण कथा को सुनने में किसी की दिलचस्पी नहीं है। कवि अपनी पौड़ा के पूंट पी लेने में ही अपनी भलाई समझता है। सारी दुनिया को दुःख में डूबो देखकर वह भी गम के समुद्र में डूब जाना बेहतर मानता है। उसे लगता है कि ऐसी स्थिति में उसका कोई भी निशाना सही बैठनेवाला नहीं है। इस प्रकार कवि के हृदय में घोर दुःख और निराशा है।

प्रश्न 2.
‘युग और मैं’ कविता का संदेश लिखिए।
उत्तर :
‘युग और मैं’ कविता में कवि ने संसार की स्थिति के संदर्भ में अपनी स्थिति देखी है। कवि कहता है कि प्रायः मनुष्य अपनी मामूली पीड़ा को भी बड़ी मानने लगता है। उसे लगता है कि उसके अस्तित्व का कोई महत्त्व नहीं है। प्रस्तुत कविता के माध्यम से कवि कहना चाहता है कि दुनिया की स्थिति देखकर मनुष्य को कभी हताश और निराश नहीं होना चाहिए। उसे आत्मविश्वासपूर्वक पूर्ण जीने का प्रयत्न करना चाहिए।

4. संदर्भ सहित स्पष्टीकरण दीजिए :

प्रश्न 1.
मानव को ईश्वर बनना था, निखिल सृष्टि वश में लानी,
काम अधूरा छोड़कर रहा आत्मघात मानव ज्ञानी।
सब झूठे हो गये, निशाने, तुम मुझसे छूटे तो क्या !
उत्तर :
प्रस्तुत पंक्तियों नरेन्द्र शर्मा की ‘युग और मैं’ कविता से ली गई हैं। इनमें कवि ने बताया है कि मनुष्य किस तरह अपनी प्रगति की राह से भटककर गुमराह हो गया है।

मनुष्य ने विज्ञान के क्षेत्र में अनोखी सिद्धियाँ प्राप्त कर ली हैं। इन सिद्धियों के बल पर वह स्वयं को ईश्वर समझने लगा। ऐसी सिद्धियोंवाले देश सारी दुनिया पर अपना अधिकार करने के फेर में पड़ गए। उन्होंने ईश्वर बनने की राह छोड़ दी और अपना ही विनाश करने लगे। कवि कहता है कि जब सबने अपनी राह छोड़ दी तो मैं अगर भटक गया तो इसमें मेरा क्या दोष?

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प्रश्न 2.
जाने कब तक घाव भरेंगे इस घायल मानवता के?
जाने कब तक सच्चे होंगे सपने सब की समता के?
सब दुनिया पर व्यथा पड़ी है, मेरी ही क्या बड़ी व्यथा!
उत्तर :
प्रस्तुत पंक्तियाँ नरेन्द्र शर्मा, की ‘युग और मैं’ कविता से ली गई हैं। इनमें कवि ने दुनिया के भविष्य के प्रति निराशा प्रकट की है। कवि कहते हैं कि वर्तमान में संसार संहार की वृत्तियों में उलझा है। चारों ओर विध्वंस की स्थिति है। एक-दूसरे पर प्रभुत्व स्थापित करने की होड़ है। ऐसी दशा में मनुष्य की बराबरी (समता) की बातें केवल बातें ही रह जाएंगी।

जबतक संसार में शांति और भाईचारे की भावना नहीं होगी तब तक मनुष्यता का वातावरण नहीं बनेगा। बिना उसके मानव-मानव की समानता का आदर्श कभी व्यवहार में नहीं आ सकेगा। कवि कहता है कि जब सारी दुनिया गैरबराबरी की पीड़ा से परेशान है तो मैं अपनी पीड़ा की क्यों चिंता करूं?

5. विरोधी शब्द लिखिए :

प्रश्न 1.

  1. हस्ती
  2. अंगार
  3. समुंदर

उत्तर :

  1. नास्ति
  2. ओला
  3. पोखर

6. निम्नलिखित शब्दों के समानार्थी शब्द देकर उनका वाक्य में प्रयोग कीजिए।

प्रश्न 1.

  1. अनगिनत – ………….
  2. गगन – ………….
  3. दुनिया – ………….
  4. निखिल – ………….
  5. तहस-नहस – ………….
  6. आपा – ………….

उत्तर :

  1. अनगिनत – असंख्य वाक्य : आज अनगिनत मनुष्य बेकार हैं।
  2. गगन – आकाश वाक्य : गगन में बादल छाए हुए हैं।
  3. दुनिया – संसार वाक्य : दुनिया बहुत बड़ी है।
  4. निखिल – संपूर्ण वाक्य : निखिल विश्व में कई अजायबियाँ हैं।
  5. तहस-नहस – बर्बाद बाक्य : दंगे में सारा गाँव तहस-नहस हो गया।
  6. आपा – अभिमान वाक्य : सुधीर को अपना आपा छोड़ देना चाहिए।

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7. ऐसी स्थिति में आप क्या कर सकते हैं?

प्रश्न 1.
जब मौत सभी को निगल रही हो? चारो ओर अत्र-तत्र सर्वत्र आग लगी हो, हुत्याएँ हो रही हों।।
उत्तर :
इन तीनों परिस्थितियों में सबसे पहले मैं 108 नंबर डायल करके पुलिस को जानकारी दे दूंगा। इसके अतिरिक्त –

जब मौत सभी को निगल रही हो – जब मौत सभी को निगल रही हो और वह मेरे बस की बात होगी तो मैं सबकी सहायता करूंगा। अगर वह मेरे बस की बात नहीं है तो भी मैं भीतर से स्थिर रहकर मेरे हिस्से में मेरा जो भी कम होगा, मैं करता रहूंगा। मैं तनिक भी विचलित नहीं हो पाऊँगा।

चारों और अत्र-तत्र सर्वत्र आग लगी हो – मेरी चारों ओर जब आग लगी हो तब सबसे पहले मैं दमकल (fire brigade) (1) को बुलाने का प्रबंध करुंगा। मेरी आसपासवाले लोगों को बुलाने का प्रबंध करूंगा। मेरी आसपासवाले लोगों को और जानवरों को बचाने में जुट जाऊँगा। जितनी भी हो सके मैं उन सबकी सहायता करने की कोशिश करूंगा। हत्याएं हो रही होंजब मेरे इर्द-गिर्द हत्याएं हो रही हों तब भी मैं हत्या को रोकने का भरसक प्रयास करूंगा। हत्याएं करनेवाले लोगों के दिलो-दिमाग को शान्त करने की कोशिश करूंगा और येनकेन प्रकारेण हत्याएं रोककर ही रहूंगा।

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निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दो-तीन वाक्यों में लिखिए :

प्रश्न 1.
आज मनुष्य किस संघर्ष में रत है?
उत्तर :
आज लोग एक-दूसरे को परास्त करने में लगे हैं। एक नए संसार की रचना के लिए मनुष्य वर्तमान जगत के वैभव का नाश करने में लगा है।

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निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक-एक वाक्य में लिखिए :

प्रश्न 1.
कवि अपनी व्यथा की चिंता क्यों नहीं करता?
उत्तर :
जब सारी दुनिया व्यथा से ग्रस्त है, तब कवि को अपनी व्यथा की चिंता करना व्यर्थं लगता है।

प्रश्न 2.
मनुष्य को हाथ किसलिए मिले थे?
उत्तर :
मनुष्य को धरती पर स्वर्ग का निर्माण करने के लिए हाथ मिले थे।

प्रश्न 3.
मनुष्य को बुद्धि किसलिए मिली थी?
उत्तर :
मनुष्य को संसार के अज्ञान को हटाकर, जड़ता मिटाने के लिए बुद्धि मिली थी।

प्रश्न 4.
मनुष्य ने कौन-सा काम अधूरा छोड़ दिया?
उत्तर :
मनुष्य ने ईश्वर बनकर सारी सृष्टि को अपने वश में करने का काम अधूरा छोड़ दिया।

प्रश्न 5.
कवि को किसकी पीड़ा है?
उत्तर :
कवि को मानवता जख्मी होने की पीड़ा है।

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प्रश्न 6.
कवि को अपनी पीड़ा कैसी लगती है?
उत्तर :
लाखों लोगों की पौड़ा के सामने कवि को अपनी पीड़ा साधारण लगती है।

प्रश्न 7.
आज का वातावरण कैसा है?
उत्तर :
आज का वातावरण विनाशक प्रवृत्तियों से भरा हुआ है।

प्रश्न 8.
कवि का क्या उलट गया है?
उत्तर :
कवि का पासा उलट गया है।

प्रश्न 9.
कवि को किसका गम नहीं है?
उत्तर :
कवि को अपने डूबने का गम नहीं है।

सही विकल्प चुनकर रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए :

प्रश्न 1.

  1. ज्ञान अपनी ………. खो रहा है। (गहराई, सुस्ती)
  2. पृथ्वी ……. के समुद्र में डूब रही है। (दुःख, चिनगारी)
  3. सात समंदर में …… की आग से पानी खौल रहा है। (अहिंसा, हिंसा)
  4. मनुष्य को संसार की ……… दूर करने के लिए बुद्धि दी गई है। (जड़ता, व्यथा)
  5. आज एक-दूसरे पर ……. स्थापित करने की होड़ है। (प्रभुत्व, विश्वास)

उत्तर :

  1. गहराई
  2. दुःख
  3. हिंसा
  4. जड़ता
  5. प्रभुत्व

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निम्नलिखित विधान ‘सही’ हैं या ‘गलत’ यह बताइए :

प्रश्न 1.

  1. कवि संसार के संहार से अत्यंत दु:खी हैं।
  2. मनुष्य अपनी मामूली पीड़ा को बड़ी मानता है।
  3. बुद्धि का काम जड़ता को दूर करना नहीं है।
  4. गगन से आग के गोले बरस रहे हैं।
  5. धरती से ज्वालाएँ उठ रही हैं।

उत्तर :

  1. सही
  2. सही
  3. गलत
  4. सही
  5. सही

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक-एक शब्द में लिखिए

प्रश्न 1.

  1. दुनियाभर के दुःखों के सामने कवि का दुःख कैसा है?
  2. मनुष्य की बुद्धि कैसी हो गई है?
  3. नरक का निर्माण कौन कर रहा है?
  4. हिंसा से ग्रस्त कौन है?

उत्तर :

  1. नगण्य
  2. उलटी
  3. मनुष्य
  4. सारा संसार

निम्नलिखित प्रश्नों के साथ दिए गए विकल्पों से सही विकल्प चुनकर उत्तर लिखिए :

प्रश्न 1.
धब्बों के समान किसे बताया गया है?
A. देशों को
B. सागरों को
C. जंगलों को
D. तारों को
उत्तर :
A. देशों को

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प्रश्न 2.
कवि की कथा कैसी है?
A. मधुर
B. अनन्त
C. सुन्दर
D. करुण
उत्तर :
D. करुण

प्रश्न 3.
घायल कौन है?
A. दानवता
B. सुन्दरता
C. मानवता
D. पशुता
उत्तर :
C. मानवता

प्रश्न 4.
कवि को किसके सपनों की चिन्ता है?
A. करुणा
B. समता
C. विषमता
D. दानवता
उत्तर :
B. समता

निम्नलिखित शब्दों के पर्यायवाची शब्द लिखिए :

प्रश्न 1.

  1. बस्ती
  2. हस्ती
  3. समता
  4. गम
  5. धब्या
  6. घाव
  7. भव
  8. व्यथा

उत्तर :

  1. आबादी
  2. अस्तित्व
  3. समानता
  4. दुःख
  5. दाग
  6. जख्म
  7. संसार
  8. पीड़ा

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निम्नलिखित शब्दों के विरोधी शब्द लिखिए :

प्रश्न 1.

  1. विनाश
  2. आदर
  3. मनुष्यता
  4. मामूली
  5. परास्त
  6. निर्माण

उत्तर :

  1. विकास
  2. अनादर
  3. दानवता
  4. असामान्य
  5. विजयी
  6. हास

निम्नलिखित प्रत्येक वाक्य में से भाववाचक संज्ञा पहचानकर लिखिए:

प्रश्न 1.

  1. सारी दुनिया पर व्यथा आ पड़ी है।
  2. चारों ओर विनाश की स्थिति दिखाई देती है।
  3. जाने कब तक सच्चे होंगे सपने सबकी समता के?
  4. सारी दुनिया असमानता से पीड़ित है।

उत्तर :

  1. व्यथा
  2. विनाश
  3. समता
  4. असमानता

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निम्नलिखित प्रत्येक वाक्य में से विशेषण पहचानकर लिखिए :

प्रश्न 1.

  1. जाने कब तक घाव भरेंगे इस घायल मानवता के?
  2. खौल रहे हैं सात समंदर डूब जाती है दुनिया।
  3. आज हुआ सबका उलटा रुख, मेरा उलटा पासा क्या?
  4. काम अधूरा छोड़, कर रहा आत्मघात मानव जानी।
  5. मानव को ईश्वर बनना था, निखिल सृष्टि वश में लानी।

उत्तर :

  1. घायल
  2. सात
  3. उलटा
  4. अधूरा, ज्ञानी
  5. निखिल

निम्नलिखित शब्दों के उपसर्ग पहचानकर लिखिए :

प्रश्न 1.

  1. विनाश
  2. निर्माण
  3. संपूर्ण
  4. अज्ञान
  5. प्रयास
  6. विध्वंश
  7. प्रगति
  8. गैरबराबरी
  9. अनगिनत
  10. अतिथि
  11. विषम
  12. प्रबंध
  13. असामान्य
  14. विजयी
  15. परास्त
  16. प्रत्येक

उत्तर :

  1. विनाश – वि + नाश
  2. निर्माण – नि: + मान
  3. संपूर्ण – सम् + पूर्ण
  4. अज्ञान-अ + ज्ञान
  5. प्रयास – प्र + यास
  6. विध्वंस – वि + ध्वंस
  7. प्रगति – प्र + गति
  8. गैरबराबरी – गैर + बराबरी
  9. अनगिनत – अन + गिनत
  10. अतिथि – अ + तिथि
  11. विषम – वि + सम
  12. प्रबंध – प्र + बंध
  13. असामान्य – अ + सामान्य
  14. विजयी – वि + जयी
  15. परास्त- पर + अस्त
  16. प्रत्येक – प्रति + एक

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निम्नलिखित शब्दों के प्रत्यय पहचानकर लिखिए :

प्रश्न 1.

  1. दुःखी
  2. पीड़ित
  3. समता
  4. समत्व
  5. गहराई
  6. अस्तित्व
  7. मनुज
  8. जड़ता
  9. दिलचस्पी
  10. स्थिति
  11. स्थापित
  12. रचनाकार
  13. विनाशक
  14. बराबरी
  15. जानकारी
  16. देवत्व
  17. विषमता
  18. विजयी
  19. दानवता

उत्तर :

  1. दुःखी – दुःख + ई
  2. पीड़ित – पीड़ा + इत
  3. समता – सम + ता
  4. समत्व – सम् + त्य
  5. गहराई – गहरा + ई
  6. अस्तित्व – अस्ति + त्व
  7. मनुज – मनु + ज
  8. जड़ता – जड़ + ता
  9. दिलचस्पी – दिल + चस्प + ई
  10. स्थिति – स्थित + इ
  11. स्थापित – स्थाप(ना) + इत
  12. रचनाकार – रचना + कार
  13. विनाशक – विनाश + क
  14. बराबरी – बराबर + ई
  15. जानकारी – जान(ना) + कार + ई
  16. दैवत्व – दैवी + त्व
  17. विषमता – विषम + ता
  18. विजयी – विजय + ई
  19. दानवता – दानव + ता

युग और मैं Summary in Gujarati

ગુજરાતી ભાવાર્થ :

કવિ કહે છે કે આજે વિનાશનું વાતાવરણ છે. જ્યારે અસંખ્ય વસતી નાશ પામી રહી છે ત્યારે મારી વસતીની શી વિસાત? જ્યારે સમગ્ર દેશ નાશ પામી રહ્યા છે તો મારું અસ્તિત્વ તો બહુ તુચ્છ છે. તે નાશ પામે તેમાં શું આશ્ચર્ય?

આજે બોંબના રૂપમાં આકાશમાંથી આગના ગોળા વરસી રહ્યા છે. ધરતીમાંથી આગની જ્વાળાઓ ફૂટી રહી છે. જ્યારે સૌ કોઈ મોતના મુખમાં જઈ રહ્યા છે ત્યારે હું મારી બાબતમાં શું કહું? જ્યારે આખી દુનિયા દુઃખોથી ત્રાસેલી છે તો મારાં દુઃખદર્દ શી ગણતરીમાં?

ઘાયલ માનવતાના ઘા ક્યારે રુઝાશે એ કોઈને ખબર નથી. દુનિયાના સૌ લોકોની સમાનતાનું સ્વપ્ન ક્યારે સાચું પડશે? જ્યારે આખી દુનિયા દુઃખોથી પીડાઈ રહી છે ત્યારે હું મારી વ્યથાને ભારે કેવી રીતે કર્યું?

હિંસાની આગમાં સાતે સમુદ્રો ઊકળી રહ્યા છે સમગ્ર સંસાર હિંસાથી પીડિત છે, જેનાથી જ્ઞાનના ઊંડાણનો તાગ મળી રહ્યો
હતો એ દુનિયા જ સ્વયં ડૂબી રહી છે. જ્યારે આખી દુનિયા ડૂબી રહી છે તો હું પણ દુઃખમાં ડૂબું તેમાં શો અફસોસ?

ઈશ્વરે મનુષ્યને હાથ એટલા માટે આપ્યા છે કે તે ધરતી પર સ્વર્ગનું નિર્માણ કરે. મનુષ્યને બુદ્ધિ એટલા માટે આપવામાં આવી છે કે તે દુનિયાનું અજ્ઞાન દૂર કરે. પરંતુ આજે બધું બદલાઈ ગયું છે. જ્યારે બધાની સ્થિતિ દયનીય થઈ ગઈ છે ત્યારે મારી દયનીય દશા શી વિસાતમાં?

મનુષ્ય ઈશ્વર બનવાના પ્રયત્ન કરી રહ્યો હતો. તેણે સમગ્ર સૃષ્ટિ પોતાના વશમાં કરવી હતી, પરંતુ તે કામ તેણે વચમાં જ અધૂરું છોડી દીધું અને જ્ઞાની હોવા છતાં આત્મહત્યાની પ્રવૃત્તિમાં પડી ગયો. આવા જ્ઞાનીઓનાં નિશાન પણ ધારી જગ્યાએ લાગવાને બદલે નિષ્ફળ ગયાં, તો મારાથી નિશાન ચૂકી જવાય તો તેમાં બીજું શું થઈ શકે?

આજે એકબીજાનો નાશ કરીને નવી દુનિયા રચવાની સ્પર્ધા જાગી છે. આજે મનુષ્ય વર્તમાન જગતના વૈભવનો નાશ કરવાની મથામણમાં રોકાયેલો છે, જ્યારે આખું વિશ્વ નષ્ટ થઈ રહ્યું હોય, તો જે મારું છે એ બચવાનો પ્રશ્ન જ ક્યાં છે?

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युग और मैं Summary in English

The poet says. “Today it is the atmosphere of destruction. When a large number of population die, what is the importance of my population ? When the whole country is being destroyed, my existence is useless. What surprise is there in its destruction ?

Today the balls of fire have been raining from the sky in the form of bombs. The flames of fire burst from the earth. While everyone is going to the mouth of death, what can I say about me? When the whole world is terrified with miseries, what is there in my misery?

Nobody knows when the wounds of wounded men will be healed. When will the dream of equality of people come true? When the whole world is suffering from pain, how can I say that my pain is heavy?

In the fire of violence all the seven oceans are boiling – the whole world is suffering from violent. The world from which we had got the depth of knowledge is itself sinking down. While the whole world is sinking down, why should I be sorry if I sink in misery?

God has given hands to the man so that he can creat heaven on the earth. Intelligence has been given to the man so that he can remove the ignorence of the world. But today all have been changed. When the position of all has become pitiable what is the importance of my pitiable position?

Man is trying to be God. He had to control the the whole world, but he left the work incompleted in the middle and fell in the activity of suicide even though he is learned. The target of the learned people have been failed. If I miss the target, what can be done?

Today there is a competition of creating a new world by destroying one another. Today man is engaged in destroying prosperity of the world. While the whole world is being destroyed, then where is the question of saving what I have ?

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युग और मैं Summary in Hindi

विषय-प्रवेश :

आज का वातावरण विनाशक प्रवृत्तियों से भरा हुआ है। गांव उजड़ रहे हैं। शहर बरबाद हो रहे हैं। मानवता घायल होकर कराह रही है। दुनिया की यह दशा देखकर कवि दुःखी हैं, परंतु लाखों लोगों की पीड़ा के सामने उन्हें अपनी पीड़ा साधारण लगती है। प्रस्तुत कविता में कवि ने यही बताया है कि संसार के दुःख-दर्द के सामने मनुष्य को अपने दुःख-दर्द बड़े समझकर निराश नहीं होना चाहिए।

कविता का सार :

चारों ओर विनाश ही विनाश : आज बस्तियाँ उजड़ रही हैं। देश मिट रहे हैं। धरती विनाश की ज्वालाओं से लिपटी हुई है। दुनियाभर के दुःखों के सामने मेरा दुःख तो बहुत मामूली है।

व्यथा से भरी हुई दुनिया : आज मनुष्यता घायल है। मानव-समता के सपने साकार होते दिखाई नहीं देते। हिंसा की आग में सातों समुद्र खौल रहे हैं। उनमें दुनिया डूबती नजर आती है। ऐसे में अगर मैं दुःख में डूब रहा हूँ तो यह कौन-सी बड़ी बात है?

पासा उलट गया : स्वर्ग का निर्माण करने के लिए मिले हाथ आज नरक का निर्माण कर रहे हैं। मनुष्य की बुद्धि जड़ हो गई है। ऐसा लगता है कि पूरा पासा ही पलट गया है। इसीलिए जिस मनुष्य को ईश्वर बनना था, वह स्वयं को मिटाने में लग गया है। ऐसे में मैं मिट रहा हूँ तो क्या आश्चर्य?

तहस-नहस हो रहा विश्व : आज दुनिया के देश एक-दूसरे का विनाश करने में लगे हुए हैं। मनुष्य संसार के वैभव को नष्ट कर रहा है। इस विश्वव्यापी विनाश के सामने अगर मैं न टिक पार्क तो मेरे स्वाभिमान का क्या?

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कविता का अर्थ :

उजड़ रही … हस्ती क्या।

कवि कहते हैं कि आज विध्वंस का वातावरण है। जब असंख्य बस्तियां उजड़ रही हैं तब मेरी वस्ती किस बिसात में है? जब धब्बों (दागों) की तरह देश मिट रहे हैं, तो मेरा अस्तित्व तो बहुत तुच्छ है। वह मिट जाए तो क्या आश्चर्य!

बरस रहे …. करुण कथा।

आज बमों के रूप में आकाश से आग के गोले बरस रहे हैं। धरती से आग की ज्वालाएं निकल रही हैं। जब सभी मौत के मुंह में जा रहे हैं, तब मैं अपने बारे में क्या बताकै? जब सारा संसार दुःख से पीड़ित है तो मेरा दुःख-दर्द किस गिनती में है?

जाने कब तक …….. व्यथा।

घायल मानवता के घाव कब भरेंगे, यह कोई नहीं जानता। दुनिया के सभी लोगों की बराबरी का सपना न जाने कब सच होगा। जब सारी दुनिया दर्द से कराह रही है, तो मैं अपनी व्यथा को बड़ी कैसे कहूँ?

खौल रहे ……….. गम तो क्या!

हिंसा की आग में सातों समुद्रों का पानी उबल रहा है-सारा संसार हिंसा से ग्रस्त है। जिससे जान की गहराई का पता लगाया जाता था, दुनिया उसमें डूब रही है। जब सारी दुनिया इब रही हो तो मैं अगर गम (दुःख) में डूब रहा हूँ तो इसमें कौन-सी बड़ी बात है?

हाथ बने ……. उलटा पासा क्या।

ईश्वर ने मनुष्य को हाथ इसलिए दिए थे कि वह धरती पर स्वर्ग का निर्माण करे। मनुष्य को बुद्धि इसलिए दी गई थी कि वह संसार को जड़ता (अज्ञान) से दूर करे। लेकिन आज सब बदल गया है। जब सभी की स्थिति दयनीय हो गई है तो मेरी दयनीयता किस बिसात में?

मानव को ……. मुझसे छूटे तो क्या?

मनुष्य ईश्वर बनने का प्रयत्न कर रहा था। उसे सारी सृष्टि अपने वश में करनी थी। लेकिन वह काम उसने बीच में ही छोड़ दिया और ज्ञानी होकर भी आत्महत्या की प्रवृत्ति में लग गया। जब ऐसे ज्ञानियों के निशाने सही न लगे और मेरे निशाने भी चूक गए, तो इसमें और क्या हो सकता है?

एक-दूसरे ……. आपा क्या।

आज एक-दूसरे को नष्ट (परास्त) कर एक नया संसार रचने की होड़ लगी है। आज का मनुष्य वर्तमान जगत के वैभव को नष्ट करने के संघर्ष में लगा हुआ है। जब सारा विश्व नष्ट हो रहा हो, तो जो मेरा है, उसके बचने का प्रश्न ही नहीं उठता।

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युग और मैं शब्दार्थ :

  • बस्ती – गाँव और कस्बे।
  • धब्बा – दाग।
  • हस्ती – अस्तित्व।
  • अंगार – आग के गोले।
  • लपट – चाला।
  • निगलना – लील जाना, खा जाना।
  • घाव – जख्म।
  • समता – बराबरी।
  • व्यथा – दर्द, पीड़ा।
  • खोलना – उबलना।
  • थाह लेना – गहराई मापना।
  • गर्क होना – डूबना।
  • गम – दुःख।
  • मनुज – मनुष्य।
  • जड़ता – बुद्धि का काम न करना।
  • निखिल – सारा, सम्पूर्ण।
  • आत्मघात – आत्महत्या।
  • अभिभव – आदर।
  • भव – संसार।
  • निरत – लगा हुआ।
  • गत – बीता हुआ।
  • आपा – अहंकार, अभिमान।

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