GSEB Class 12 Hindi Rachana पद्यांश का भावार्थ / विचार-विस्तार

   

Gujarat Board GSEB Hindi Textbook Std 12 Solutions Rachana पद्यांश का भावार्थ / विचार-विस्तार Questions and Answers, Notes Pdf.

GSEB Std 12 Hindi Rachana पद्यांश का भावार्थ / विचार-विस्तार

पद्यांश का भावार्थ

निम्नलिखित प्रत्येक पद्यांश का भावार्थ स्पष्ट कीजिए :

प्रश्न 1.
जो रहीम उत्तम प्रकृति का करि सकत कुसंग। चंदन विष व्यापत नहीं, लपटे रहत भुजंग ।।
उत्तर :
रहीमजी कहते हैं कि बुर संगति उत्तम स्वभाववाले व्यक्ति का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती। चंदन के पेड़ पर साँप लिपटे रहते हैं, फिर भी चंदन वृक्ष पर उनके विष का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इसमें संदेह नहीं कि अच्छाई में अद्भुत शक्ति होती है। गुलाब का फूल काँटों में पलता और खिलता है, पर उसमें काँटों की चुभन नहीं होती, सुगंध और मनमोहक सुन्दरता होती है। कमल का फूल भी कीचड़ में खिलता है, पर उसकी स्वच्छ और सुन्दर पंखुड़ियों की छवि पर कीचड़ का कोई असर नहीं होता। रावण की लंका में रहकर भी विभीषण का स्वभाव राक्षसों जैसा नहीं था। इस तरह यदि हम अच्छे हैं, तो बुरे लोगों के बीच रहकर भी अच्छे ही रहेगें।

प्रश्न 2.
बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर ।
पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर ।।
उत्तर :
बड़प्पन की पहचान अधिक धन-दौलत या गाड़ी-बंगले से नहीं होती । बड़ा वही है जिसका दिल बड़ा हो । बड़े दिलवाले लोग ही परोपकारी होते हैं। वे दूसरों की सेवा में ही सुख मानते हैं। किसीके काम आने में ही वे अपने जीवन को सार्थक समझते हैं । बड़ा तो खजूर का पेड़ भी होता है, पर उसका बड़प्पन किसी के काम नहीं आता।

उसकी छाया इतनी नहीं होती कि थकाहारा पथिक उसमें सुख से घड़ीभर आराम कर सके। उसके फल इतने ऊँचे होते हैं कि राही उन्हें पाकर अपनी भूख नहीं मिटा सकता। इसलिए कवि बड़ा उसीको मानते हैं जो बिना किसी स्वार्थ के दूसरों का भला करता है और उसीमें अपने जीवन को धन्य मानता है।

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प्रश्न 3.
सहनशीलता, क्षमा, दया को तभी पूजता जग है,
बल का दर्प चमकता उसके पीछे जब जगमग है।
उत्तर :
बलवान से सभी डरते हैं, कायर से कोई नहीं डरता। सहनशीलता, क्षमा और दया जैसे महान गण उसी व्यक्ति को शोभा देते हैं जिसमें बल है, शक्ति है। कायर व्यक्ति के लिए ये गुण उसकी कमजोरी या मजबूरी के द्योतक हैं। अपनी कायरता को छिपाने के लिए ही वह सहनशील, क्षमावान और दयालु होने का ढोंग करता है। उसकी असलियत को जाननेवाले कभी उसका आदर नहीं करेंगे।

सिंह यदि चूहे को क्षमा करे तो यह उसकी दयालुता मानी जाएगी, परंतु चूहा सिंह को क्षमा करने की बात करे तो इसे सुनकर हंसी ही आएगी। इसी तरह कायर और कमजोर लोग किसीका अत्याचार सहन करके अपनी सहनशीलता का बखान नहीं कर सकते। डॉक्टर किसी गरीब पर दया करके उसका मुफ्त इलाज कर सकता है, लेकिन गरीब व्यक्ति डॉक्टर पर क्या दया करेगा? इस प्रकार व्यक्ति में बल होने पर ही उसमें सहनशीलता, क्षमा और दया जैसे गुण अपना महत्त्व रखते हैं।

प्रश्न 4.
रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि।
जहाँ काम आवै सुई, कहा करै तरवारि।
उत्तर :
कुछ लोग वस्तु के आकार-प्रकार को देखकर उसका मूल्य ऑकते हैं। वास्तव में वस्तु का महत्त्व उसके कद पर निर्भर नहीं होता। रहीमजी हमें यही समझाना चाहते हैं कि बड़ों को देखकर छोटों की अनदेखी नहीं करनी चाहिए। तलवार का आकार बड़ा है। वह युद्ध में बहुत उपयोगी है। उसकी तुलना में सुई बहुत छोटी होती है, फिर भी सुई का काम तलवार नहीं कर सकती। इसलिए हमें छोटों को भी बड़ों के समान ही महत्त्व देना चाहिए ।

प्रश्न 5.
दुर्बल को न सताइए जाकी मोटी हाय।
मुए ढोर के चाम से लोह भसम हो जाय।।
उत्तर :
जिस प्रकार शारीरिक शक्ति का महत्त्व है, उसी प्रकार भावनाओं की शक्ति भी अपना महत्त्व रखती है। बलवान लोग शरीर से दुर्बल लोगों को अपने डंडे का जोर दिखाकर सताते हैं। धनवान लोग अपने धन के जोर पर निर्धनों पर जुल्म ढाते हैं। उन्हें यह पता नहीं कि दुर्बल की भावना दुर्बल नहीं होती और निर्धन की बददुआ में बहुत जोर होता है।

लुहार की धौंकनी की शक्ति कौन नहीं जानता? वह बनती तो मरे हुए पशु के चमड़े से, पर उसका जोर मरा हुआ नहीं होता। उसकी हवा से लोहा भी भस्म हो जाता है। इसी तरह दुर्बल की आह बड़े-बड़ों का सर्वनाश कर देती है। धौंकनी के रूप में वह लाचार पशु ही लोहे से बदला लेता है, जिसने लोहे के छुरे के रूप में उसे मारा था। इसी तरह दुर्बल की हाय भी अभिशाप बनकर अपने सतानेवालों से प्रतिशोध अवश्य लेती है। इसीलिए अपने शरीर या धन के बल पर किसी गरीब को सताना नहीं चाहिए।

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प्रश्न 6.
जो जल बाडै नाव में, घर में बाढ़े दाम।
दोनों हाथ उलीचिए, यह सज्जन को काम।।
उत्तर :
जब नाव में पानी भर जाता है, तब नाव को डूबने की नौबत आ जाती है। उस स्थिति में उचित यही है कि नाव में से पानी को उलीचकर बाहर निकाल दिया जाए। नाव को और उसमें बैठे हुए लोगों को बचाने का यही एक उपाय है। इसी प्रकार घर में संपत्ति का अधिक बढ़ना अच्छा नहीं है। संपत्ति के कारण परिवार में कलह होती है।

परिवार के लोग कई तरह के व्यसनों के शिकार हो जाते हैं और उनके जीवन में कई तरह की बुराइयाँ आ जाती है। इनके कारण परिवार धीरे-धीरे नष्ट हो जाता है। इसलिए जब घर में संपत्ति अधिक हो जाए तो उसका सदुपयोग करना चाहिए। उसे लोक-कल्याण के कामों में लगाना चाहिए। सदुपयोग से ही धन की शोभा बढ़ती है और घर के वातावरण में सुख-शान्ति रहती है। इस प्रकार संपत्ति के सागर में घर की नाव को डूबने से बचाने के लिए उसे परोपकार में लगाने में बुद्धिमानी है।

विचार-विस्तार

प्रश्नपत्र के नये प्रारूप के अंतर्गत पद्यांश के भावार्थ-लेखन के स्थान पर विचार-विस्तार का प्रश्न भी पूछा जा सकता है। दिए गए विधानों के सही विचार-विस्तार के लिए 3 अंक दिए जाते है।

निम्नलिखित विधानों का विचार-विस्तार कीजिए :

प्रश्न 1.
वक्ष ही जल है, जल ही रोटी है और रोटी ही जीवन है।
उत्तर :
वृक्ष, जल और रोटी ये तीनों अलग-अलग वस्तुएं हैं, फिर भी इनमें गहरा सम्बन्ध है। अलग-अलग होकर भी ये परस्पर जुड़े हुए हैं। वृक्ष वन का प्रतीक है। सघन वन बरसाती बादलों को आकर्षित करते हैं। इसलिए वनप्रदेशों में अच्छी वर्षा होती है। वनों में जल संचित रहने से उनमें से बहनेवाली नदियों में भी जल का प्रवाह बराबर बनता रहता है। पानी की सुविधा होने से खेती अच्छी होती है और खाद्यान्नों की आपूर्ति में कमी या रुकावट नहीं आती।

भरपूर खाद्यान्न होने से लोगों को भरपेट भोजन मिलता है। वे स्वस्थ और सक्रिय रहते हैं। वे सुखी और सम्पन्न जीवन बिताते हैं। रेगिस्तानों में वृक्षों के अभाव के कारण वर्षा भी नहीं के बराबर होती है और इसलिए वहाँ अन्न का अभाव रहता है। यही कारण है कि रेगिस्तानों में लोगों का जीवन बड़ा संघर्षपूर्ण होता है। इसलिए इसमें कोई संदेह नहीं कि वृक्ष ही जल है और जल ही रोटी है और रोटी ही जीवन है।

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प्रश्न 2.
बोया पेड़ बबूल का, आम कहाँ से खाय?
उत्तर :
हम जैसा काम करेंगे, वैसा ही हमें फल मिलेगा। हम जिस फल का बीज बोएंगे, उसी फल के पेड़ उगेंगे और फिर हमें वैसे ही फल मिलेंगे। बबूल का बीज बोया है तो हमें आम के फल कैसे मिलेंगे? बबूल के पेड़ से हमें कटि ही मिलेंगे। आम के फल तो आम का बीज बोने पर ही मिलेंगे। इसी प्रकार हम अच्छा काम करेंगे तो हमें उसका अच्छा फल मिलेगा और बुरे काम का बुरा फल मिलेगा। इसलिए स्वस्थ, सुखी और सफल जीवन जीना है तो हमें अपने में अच्छे गुणों का विकास करके मेहनत तथा ईमानदारी से सत्कर्म करने चाहिए। हमारे सत्कर्म ही हमें सुख और शांति देंगे।

प्रश्न 3.
कर्म करना श्रेयस्कर है।
उत्तर :
जीवन में कर्म का बड़ा महत्त्व है। सच तो यह है कि कर्म करने के लिए ही हमें यह जीवन मिला है। कर्म करके ही व्यक्ति को आजीविका प्राप्त होती है और वह अपने परिवार का पालन करता है। कर्म करने से समय का सदुपयोग होता है और व्यक्ति जीवन में ऊँचा उठ सकता है। अपनी-अपनी योग्यता के अनुसार कर्म करके ही कोई उद्योगपति, कोई वैज्ञानिक, कोई नेता, कोई कलाकार या साहित्यकार बनता है।

असाधारण कर्म करके राम, कृष्ण, ईसा आदि देवत्व को प्राप्त हुए। महान कर्म करके ही तिलक, गांधी, लिंकन आदि पुरुष महापुरुष बने। कर्मयोगी व्यक्ति ही समाज के लिए आदरणीय बनते हैं। इतिहास के पृष्ठों पर उन्हीं की गौरवगाथा लिखी जाती है। इसलिए जीवन में कर्म करना श्रेयस्कर है।

प्रश्न 4.
अब पछताए होत क्या, जब चिड़ियाँ चुग गई खेत।
उत्तर :
हर आदमी के लिए जीवन में सजग रहना जरूरी है। जब खेत में फसल तैयार खड़ी हो, तब उसकी रखवाली करनी चाहिए। रखवाली करने से फसल को पक्षियों से बचाया जा सकता है। उस समय यदि आलस्य के वशीभूत होकर खेत पर नहीं गए, तो पक्षी सारी फसल चुग जाएंगे और फिर पछताना पड़ेगा। लेकिन तब पछताने से कोई लाभ नहीं होगा।

इसी तरह प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्तव्य के प्रति सावधान रहना चाहिए। परीक्षा सिर पर हो और पढ़ाई की तरफ लापरवाही की जाए तो परीक्षा में असफलता ही मिलेगी। तब पछतावा किसी काम न आएगा और एक साल बरबाद हो जाएगा। इसलिए सही वक्त पर सही काम करने में ही बुद्धिमानी है।

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प्रश्न 5.
खाली दिमाग शैतान की दुकान ।
उत्तर :
समय का सदुपयोग व्यक्ति का सबसे बड़ा गुण है, सबसे बड़ी बुद्धिमत्ता है। व्यक्ति को हमेशा किसी-न-किसी उपयोगी काम में लगा रहना चाहिए। व्यस्तता से समय का सदुपयोग तो होता ही है, मन की प्रक्रिया भी सही दिशा में कार्यरत रहती है। व्यक्ति काम में लगा है तो उसका मन भी काम में लगा है। काम न होने पर व्यक्ति का मन विचलित रहता है। वह यहाँ-वहां की व्यर्थ कल्पनाओं में रहता है।

उसे तरह-तरह की खुराफातें सूझती रहती हैं। जब बच्चों के पास कोई काम नहीं होता, तो तरह-तरह की शरारतें उनके दिमाग में आती हैं। वे उत्पात मचाते हैं। इसी प्रकार निकम्मे युवकों के मन में गलत योजनाएं बनती रहती हैं। काम के अभाव में वे गलत रास्तों पर चल पड़ते हैं। आजकल जितने अपराध हो रहे हैं, उनमें अधिकतर बेरोजगार युवक ही शामिल रहते हैं। यदि ये काम में लगे होते तो ये ऐसे गलत चक्करों में क्यों पड़ते?

प्रश्न 6.
सच्चा मित्र जीवन की औषधि है।
उत्तर :
औषधि शरीर को रोगों से मुक्त करती है। तरह-तरह की बीमारियां भी औषधियों से दूर होती है। इसी प्रकार सच्चा मित्र व्यक्ति के जीवन के रोग दूर करता है। वह उसकी बुरी आदतें छुड़ाता है । जब व्यक्ति निराश होकर धैर्य खो बेठता है, तब सच्चा मित्र उसे आशा बंधाता है और जीने का साहस देता है । कर्तव्य-पथ से भटके हुए व्यक्ति को सही मार्ग पर लानेवाला उसका सच्चा मित्र ही होता है। सच्चा मित्र संकट में व्यक्ति की रक्षा करता है । इस प्रकार सच्चा मित्र हर तरह से व्यक्ति के जीवन को स्वस्थ और सुखी रखने का प्रयत्न करता है, इसलिए उसे जीवन की औषधि कहा गया है।

प्रश्न 7.
जो बीत गई सो बात गई।
उत्तर :
इसमें संदेह नहीं कि बीता हुआ समय मनुष्य के मन पर अपनी गहरी छाप छोड़ जाता है, परंतु उस छाप का क्या महत्त्व है ! भूतकाल की बीती बातों की जुगाली करने से कोई लाभ नहीं होता। बीती बातों पर अधिक सोचने से हमारी मानसिक शक्तियाँ क्षीण हो जाती हैं। हम अपनी क्रियाशक्ति खो देते हैं। पुरानी असफलताओं को याद करने से भविष्य भी अंधकारमय दिखने लगता है। सामने कर्तव्य पड़े होते हैं, पर उन्हें करने का उत्साह नहीं रहता ।

इसलिए बीती बातों को भूल जाने में ही भलाई है। पुरानी शत्रता, परानी कड़वाहटे दिमाग से निकाल दें और वर्तमान में चैन से जीने की कोशिश करें । हम आशा का आँचल थामकर मन में नया उत्साह लाएँ । इससे हम एक नए जीवन का अनुभव करेंगे । इसलिए ‘जो बीत गई सो बात गई’ उक्ति का यही आशय है कि हम विगत के सूखे-मुरझाए फूलों को फेंककर अनागत के पुष्पों की सुगंध का आनंद लें।

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प्रश्न 8.
बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर।
उत्तर :
बड़प्पन वही है जिसमें उदारता हो, परोपकार की भावना हो। केवल अधिक धन-दौलत से ही कोई बड़ा नहीं हो जाता। खजूर का पेड़ बहुत ऊंचा होता है। भूखे पथिक को न उसके फल खाने को मिलते हैं और न थके राही को वह पर्याप्त शीतल छाया दे पाता है। उसके ऊँचा होने से किसी को कोई लाभ नहीं होता। कवि बड़ा उसी को कहते हैं जो दूसरों का भला करे और परोपकार में ही अपने जीवन की सार्थकता अनुभव करे।

प्रश्न 9.
असफलता सफलता का सोपान है।
उत्तर :
सफलता सबको अच्छी लगती है। असफल होना कोई नहीं चाहता। परंतु यह नहीं भूलना चाहिए कि विश्व के अनेक महान वैज्ञानिकों को अपने प्रारंभिक प्रयोगों में असफलता का मुंह देखना पड़ा था। कई महान लेखकों की आरंभिक रचनाओं को छापने से इन्कार कर दिया गया था। बड़े-बड़े उद्योगपतियों को अपने कारोबार की शुरूआत में घोर निराशा ही हाथ लगी थी। परंतु वे वैज्ञानिक, लेखक और उद्योगपति अपनी आरंभिक असफलता से हताश नहीं हुए। असफलता से उनका हौसला कम न हुआ।

असफलता के आईने में उन्होंने अपनी कमियों और कमजोरियों को देखा और उन्हें दूर किया। दृढ़ संकल्प से वे फिर आगे बढ़े और एक दिन सफलता के शिखर पर पहुंच गए। सच कहा जाए तो उनकी प्रारंभिक असफलता उनकी सफलता के ताले को खोलने की कुंजी बन गई । इस प्रकार यदि असफलता से हताश न हुआ जाए तो वह सफलता की प्रबल प्रेरणा और उसका सोपान बन सकती है।

प्रश्न 10.
मनुष्य स्वयं अपने भाग्य का निर्माता है।
उत्तर :
भाग्यवादी लोग मानते हैं कि व्यक्ति को उनके भाग्य के विधान के अनुसार फल मिलता है। भाग्य में सुख लिखा है तो सुख : मिलेगा और दुःख लिखा है तो दुःख ही मिलेगा। भाग्यवादी व्यक्ति भाग्य के भरोसे बैठकर अपना जीवन बरबाद करते रहते हैं। वे उद्योग करते : ही नहीं, क्योंकि वे मानते हैं कि भाग्य के बिना उद्योग भी फलीभूत नहीं होगा। परंतु पुरुषार्थी व्यक्ति अपने पुरुषार्थ पर भरोसा करता है। वह अपनी जन्मपत्री लेकर ज्योतिषियों के दरवाजे नहीं खटखटाता। वह अपनी योजना के अनुसार काम करता है।

वह कभी समय नहीं गवाता। उसकी कर्मनिष्ठा सदैव उसे प्रेरणा देती रहती है। वह हमेशा आगे बढ़ने के प्रयत्न में लगा रहता है। जमशेदजी टाटा, जुगलकिशोर बिड़ला, डॉ. हामी भाभा, मोतीलाल नेहरू, टॉमस अल्वा एडिसन जैसे व्यक्तियों ने अथक परिश्रम करके धन और यश कमाया। उन्होंने साबित कर दिया मनुष्य का भाग्य उसके हाथ की रेखाओं में नहीं, बल्कि उसके हाथों में होता है, उसके आत्मविश्वास में होता है। वह चाहे तो पुरुषार्थ करके स्वयं अपने भाग्य का निर्माण कर सकता है।

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प्रश्न 11.
निन्दक नियरे राखिये आंगन कुटि छवाय ।
उत्तर :
मैले कपड़ों को धोने के लिए साबुन और पानी का उपयोग किया जाता है। साबुन मैल को काटकर निकाल देता है और पानी से धुलाई के बाद कपड़े स्वच्छ हो जाते हैं। इसी प्रकार निंदा करनेवाला व्यक्ति हमें हमारे स्वभाव के दोषों से परिचित कराता है। अपने दोषों को जानकर ही हम उन्हें दूर कर सकते हैं। स्वभाव के दोषों को दूर करने के लिए निंदा के कटु शब्द ही साबुन और पानी का काम करते हैं। इसलिए हमें अपनी निंदा सुनकर क्रोध या आवेश में नहीं आना चाहिए, पर निंदा का स्वागत करना चाहिए और अपनी निंदा करनेवालों से दूर नहीं भागना चाहिए।

प्रश्न 12.
पराधीन सपनेहूँ सुख नाहीं।
उत्तर :
पराधीनता का अर्थ है अपनी इच्छाएं मारकर दूसरे की इच्छा के अनुसार काम करना। पिंजरे में बंद तोता क्या आकाश में उड़ने की चाहत पूरी कर सकता है? चिड़ियाघर में पिंजड़ों में बंद प्राणी क्या जंगल के अपने स्वाभाविक जीवन का आनंद लूट सकते हैं? पराधीनता की यह पीड़ा ही गुलाम देशों को आज़ादी के लिए तड़पाती थी।

पराधीनता की पीड़ा से छटकारा पाने के लिए ही महात्मा गांधी. पं. नेहरू, सरदार पटेल जैसे नेताओं ने आंदोलन किये, लाठियां खाई और जेल गए। अपनी मातृभूमि को पराधीनता के नरक से मुक्त करके स्वतंत्रता के स्वर्ग में ले जाने के लिए ही भगतसिंह, बिस्मिल, चंद्रशेखर आजाद जैसे व्यक्ति फांसी के फंदे पर लटक गए। व्यक्ति का विकास स्वतंत्रता में ही होता है। स्वतंत्र राष्ट्र ही गौरवपूर्ण ढंग से जी सकता है। इसलिए पराधीनता में सुख पाने की आशा करना व्यर्थ है।

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