GSEB Class 11 Hindi प्रयोजनमूलक हिन्दी हिन्दी के विविध रूप

   

Gujarat Board GSEB Hindi Textbook Std 11 Solutions प्रयोजनमूलक हिन्दी हिन्दी के विविध रूप Questions and Answers, Notes Pdf.

GSEB Std 11 Hindi प्रयोजनमूलक हिन्दी हिन्दी के विविध रूप

स्वाध्याय

1. निम्नलिखित प्रश्नों के संक्षिप्त में उत्तर लिखिए :

प्रश्न 1.
राजभाषा से क्या तात्पर्य है?
उत्तर :
राजभाषा का अर्थ है देश की वह भाषा, जो राजकार्यों तथा न्यायालयों आदि में प्रयुक्त हो।

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प्रश्न 2.
हिन्दी किन-किन राज्यों की मुख्य राजभाषा है?
उत्तर :
हिन्दी हिन्दीभाषी राज्यों की मुख्य राजभाषा है। ये राज्य हैं – उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, झारखंड, बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़।

प्रश्न 3.
हिन्दी भारत की राजभाषा कब बनी?
उत्तर :
स्वाधीनता के बाद 14 सितंबर, 1949 को हिन्दी भारत की राजभाषा बनी थी।

प्रश्न 4.
किन-किन देशों में भारतीय मूल के लोग हिन्दी का प्रयोग कर रहे हैं?
उत्तर :
भारतीय मूल के लोग कई देशों में हैं। फीज़ी , मारिशस, सूरीनाम, त्रिनिदाद और गुयाना आदि देशों में भारतीय मूल के लोग हिन्दी का प्रयोग कर रहे हैं।

2. संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए :

प्रश्न 1.
हिन्दी का जनपदीय रूप
उत्तर :
हिन्दीभाषी क्षेत्र के निवासी अपने-अपने क्षेत्रों के दैनिक व्यवहार में अपनी-अपनी बोलियाँ बोलते हैं, औपचारिक रूप से हिन्दी का प्रयोग करते हैं। इस रूप में हिन्दी की बोलियाँ जनपदीय भाषा की भूमिका निभाती हैं।

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प्रश्न 2.
हिन्दी का शैलीगत स्वरूप
उत्तर :
हिन्दी हमारे राष्ट्रीय आंदोलनों की भाषा रही। केशवचन्द्र सेन, सुभाषचंद्र बोस, लोकमान्य तिलक, स्वामी दयानन्द और महात्मा गांधी ने हिन्दी के सार्वदेशिक रूप के कारण इसे राष्ट्रभाषा नाम दिया। इसमें अरबी-फारसी तथा संस्कृत भाषा के प्रचलित शब्दों को बोलचाल की भाषा के रूप में स्वीकार किया गया। इस समय शैली की दृष्टि से हिन्दी के दो रूप प्रमुख दिखते हैं :

  • संस्कृतनिष्ठ हिन्दी और
  • अरबी-फारसी मिश्रित हिन्दी।

3. सविस्तार उत्तर लिखिए :

प्रश्न 1.
खड़ी बोली हिन्दी के आरंभिक विकास का परिचय दीजिए।
उत्तर :
खड़ी बोली हिन्दी का विकास उन्नीसवीं शताब्दी में हुआ। . परन्तु इसका प्राचीनतम रूप ‘पुरानी हिन्दी’ के नाम से दसवीं-ग्यारहवीं शताब्दी में मिलता है। तेरहवीं शताब्दी के अंत भाग में अमीर खुसरो की पहेलियाँ – मुकरियाँ खड़ी बोली में मिलती हैं। हिन्दी के आरंभिक विकास में नाथों, सिद्धों तथा संतों का बहुत योगदान रहा। नामदेव, तुकाराम, नरसिंह मेहता तथा प्राणनाथ आदि संतों ने साहित्यिक हिन्दी के विकास में विशेष योगदान दिया। इसी समय हिन्दी का उपयोग तीर्थस्थानों तथा वाणिज्य व्यापार में भी होने लगा। इस प्रकार ‘संपर्कभाषा’ के रूप में हिन्दी का विकास हुआ।

प्रश्न 2.
स्वाधीनता आंदोलन में हिन्दी का क्या महत्त्व था?
उत्तर :
स्वाधीनता मिलने के पहले हमारे देश में अनेक आंदोलन हुए। इनका नेतृत्व बंगाल में केशवचन्द्र सेन और सुभाषचन्द्र बोस, महाराष्ट्र में लोकमान्य तिलक, गुजरात में स्वामी दयानंद और महात्मा गांधी आदि नेताओं ने किया। इन्होंने अपने भाषणों तथा उद्बोधनों में हिन्दी का प्रयोग किया। इतना ही नहीं राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी को अपनाने का आग्रह किया। स्वतंत्रता आंदोलनों में लोकप्रिय नारों की भाषा हिन्दी ही रही। राष्ट्रीय, जागरण करानेवाले फिल्मी गीतों की भाषा भी हिन्दी ही थी। इस प्रकार स्वाधीनता आंदोलनों को प्रभावशाली तथा व्यापक बनाने में हिन्दी का खुलकर प्रयोग हुआ।

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प्रश्न 3.
हिन्दी के जनव्यवहार के क्षेत्र कौन-कौन से है?
उत्तर :
हिन्दी के जनव्यवहार के निम्नलिखित क्षेत्र हैं :

  1. सरकारी अधिकारियों, कर्मचारियों और सामान्य जनता के बीच संवाद।
  2. सभा-समारोहों का संचालन।
  3. किसी सूचना की उद्घोषणा।
  4. चुनाव प्रचार के व्याख्यान।
  5. किसी मैच या घटना का आँखों देखा हाल।
  6. समाचार लेखन या वाचन आकाशवाणी, टेलिविजन।
  7. समस्या निराकरण हेतु विभिन्न विभागों – बैंक, पोस्ट ऑफिस या रेलवे आदि से संबंधित पत्रव्यवहार।
  8. फिल्म आदि से संबंधित पत्रव्यवहार इनकी शैली औपचारिक, अनौपचारिक या आत्मीय हो सकती है।

हिन्दी के विविध रूप Summary in Hindi

हिन्दी हमारे देश की राजभाषा है। यह देश के बहुत बड़े क्षेत्र में बोली तथा समझी जाती है और देश के लोगों की संपर्क भाषा है। देश के कई राज्यों के प्रशासनिक कार्य हिन्दी में होते हैं। अब हिन्दी का मानकीकरण हो चुका है। पर आरंभ में यह इतनी परिष्कृत नहीं थी। इस गद्यांश में आरंभिक काल में हिन्दी के आधार, उसके विकास में अनेक लोगों के योगदान, उसकी भूमिका, व्यापकता तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसके प्रयोग आदि के बारे में बताया गया है।

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गद्यांश का सार :

हिन्दी का प्राचीनतम रूप : हिन्दी का राष्ट्रीय रूप खड़ी बोली पर आधारित है। खड़ी बोली हिन्दी का विकास उन्नीसवीं सदी में हुआ पर इसका आरंभिक रूप बहुत पुराना है। दसवीं-ग्यारहवीं सदी में हिन्दी का’ प्राचीनतम रूप ‘पुरानी हिन्दी’ के नाम से मिलता है। तेरहवीं शताब्दी के आखिरी काल में अमीर खुसरो की खड़ी बोली में कविताएँ मिलती हैं।

खड़ी बोली का रूप : हिन्दी खड़ी बोली का विकसित रूप है। यह दिल्ली और उसके आसपास के क्षेत्रों में बोली जानेवाली बोली थी। इसमें कई बड़ी बोलियों को मिलाकर हिन्दी भाषा बनी है। इसमें हरियाणी, ब्रज, अवधी, भोजपुरी, मगही, मैथिली, कन्नौजी, बुंदेली, मेवाती, मारवाड़ी, जयपुरी तथा गढ़वाली आदि भाषाएं प्रमुख हैं।

हिन्दी के विकास में योगदान : प्रारंभिक हिन्दी के विकास में नाथों, सिद्धों तथा संतों का बड़ा योगदान रहा है। उन्होंने ही अपनी रचनाओं के माध्यम से इसे पूरे भारत में पहुंचाया।

बड़े नगरों का प्रभाव : हिन्दी पर बड़े नगरों की भाषाओं का भी प्रभाव पड़ा है। वहाँ हिन्दी का अलग रूप दिखाई देता है। जैसे- बंबइया (मुंबई) हिन्दी, कलकतिया (कोलकाता) हिन्दी तथा हैदराबादी हिन्दी।

हिन्दी का मानकीकरण : आधुनिक काल में हिन्दी का मानकीकरण किया गया है। आज हिन्दी पूरे देश के लिए औपचारिक भाषा है। यह हिन्दीभाषी राज्यों में राजकाज की भाषा बन गई है।

हिन्दी का उपयोग : आजादी की लड़ाई में हिन्दी ने प्रमुख भूमिका निभाई थी। हिन्दी के सार्वदेशिक रूप के कारण गांधीजी तथा अन्य बड़े नेताओं ने विभिन्न राष्ट्रीय आंदोलनों में इसी का प्रयोग किया था। उन्होंने समूचे देश के लिए हिन्दी अपनाने पर जोर दिया था।

हिन्दीभाषी क्षेत्र : देश का विशाल क्षेत्र हिन्दीभाषी क्षेत्र के रूप में जाना जाता है। उत्तराखंड से लेकर हिमाचल, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, झारखंड, बिहार, मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ तक यह क्षेत्र फैला है। इन क्षेत्रों में औपचारिक रूप से हिन्दी का ही प्रयोग होता है।

हिन्दी का विस्तार : आज हिन्दी का प्रयोग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रहा है। देश से बाहर फीज़ी, मारिशस, सूरीनाम, त्रिनिदाद और गुयाना में भी भारतीय मूल के निवासी हिन्दी का प्रयोग करते हैं। इसके अलावा आस्ट्रेलिया, चीन, जापान तथा कोरिया में विश्वविद्यालय स्तर पर हिन्दी का अध्ययन होता है।

राजभाषा : आज़ादी मिलने के पश्चात 14 सितंबर, 1949 को हिन्दी को राजभाषा का पद प्राप्त हुआ था।

हिन्दी के रूप : हिन्दी के दो रूप हैं : (1) जनव्यवहार की हिन्दी तथा (2) प्रयोजन परक कार्यक्षेत्रों की हिन्दी। संवाद, सभा-संचालन, प्रचार, मैच अथवा घटना का आँखों देखा हाल बताना आदि हिन्दी के प्रथम रूप में आते हैं। राजभाषा के रूप में प्रयोग की जानेवाली हिन्दी भाषा को प्रयोजनमूलक हिन्दी कहते हैं। हिन्दी आज सामाजिक, सांस्कृतिक एकता का माध्यम है।

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हिन्दी के विविध रूप शब्दार्थ :

  • बहुभाषी – बहुत सी भाषाएँ बोलने या जाननेवाला।
  • भू-भाग – भूखंड, प्रदेश।
  • समायोजन – आवश्यक वस्तुओं का जोगाड़ करना।
  • जनपदीय – जिसका संबंध जिले से हो।
  • आंचलिक – जिसका संबंध किसी अंचल या क्षेत्र विशेष से हो।
  • अंतरराष्ट्रीय – राष्ट्र या राष्ट्रों के बीच होनेवाला।
  • व्यापक – सर्वत्र फैला हुआ, विस्तृत।
  • मानकीकरण – किसी वस्तु का शुद्ध रूप निश्चित करना।
  • राजकाज – सरकारी काम-काज।
  • मुकरियाँ – पहेली जैसी कविताएँ।
  • नाथ – गोरखपंथी साधुओं की एक उपाधि।
  • सिद्ध – वह संत या योगी, जिसे सिद्धि प्राप्त हुई हो।
  • वाणिज्य – बड़े पैमाने पर किया जानेवाला व्यापार।
  • व्यवहत – व्यवहार अथवा प्रयोग में लाया हुआ।
  • सार्वदशिक – सभी देशों से संबद्ध।
  • प्रशासनिक – राज्य के प्रशासन से संबंध रखनेवाला कार्य।
  • अभिव्यक्ति – व्यक्त करना, प्रकट करना।

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