GSEB Solutions Class 10 Hindi Kritika Chapter 3 साना-साना हाथ जोड़ि

   

Gujarat Board GSEB Std 10 Hindi Textbook Solutions Kritika Chapter 3 साना-साना हाथ जोड़ि Textbook Exercise Important Questions and Answers, Notes Pdf.

GSEB Std 10 Hindi Textbook Solutions Kritika Chapter 3 साना-साना हाथ जोड़ि

निम्नलिखित गद्यांशों को पढ़कर प्रश्नों के उत्तर लिखिए :

सुबह हमें यूमथांग के लिए निकल पड़ना था, पर आँख खुलते ही मैं बालकनी की तरफ भागी । यहाँ के लोगों ने बताया था कि यदि मौसम साफ हो तो बालकनी से भी कंचनजंघा दिखाई देती है । हिमालय की तीसरी सबसे बड़ी चोटी कंचनजंघा । पर मौसम अच्छा होने के बावजूद आसमान हलके-हलके बादलों से ढका था, पिछले वर्ष की ही तरह इस बार भी बादला के कपाट ठाकुर जी के कपाट की तरह बंद ही रहे ।

कंचनजंघा न दिखनी थी, न दिखी । पर सामने ही रकम-रकम के. रंग-बिरंगे इतने सारे फूल दिखाई पड़े कि लगा फूलों के बाग में आ गई हूँ। बहरहाल… गैंगटॉक से 149 किलोमीटर की दूरी पर यूमथांग था । ‘यूमथांग यानी घाटियाँ… सारे रास्ते हिमालय की गहनतम घाटियाँ और फूलों से लदी वादियाँ मिलेंगी आपको’ ड्राइवर-कम-गाइड जितेन नार्गे मुझो बता रहा था ।

प्रश्न 1.
लेखिका बालकनी की तरफ क्यों भागी ?
उत्तर :
लेखिका को लोगों ने बताया था कि यदि आसमान साफ हो तो बालकनी से भी कंचनजंघा दिखाई देती है । इसलिए वे कंचनजंघा को देखने के लिए बालकनी में से यहाँ भागकर गई ।

प्रश्न 2.
कंचनजंघा लेखिका को क्यों नहीं दिखाई दी ?
उत्तर :
आसमान हलके-हलके बादलों से ढंका था । वहाँ पूरी तरह से बादल छाए थे । इसलिए लेखिका को कंचनजंघा दिखाई – नहीं दी ।

प्रश्न 3.
लेखिका को ऐसा क्यों लगा कि वे फूलों के बाग में आई हैं ?
उत्तर :
बालकनी से बाहर देखने पर लेखिका को तरह-तरह के रंग-बिरंगे ढेरों फूल दिखाई पड़े । इतने सारे फूलों को देख उन्हें लगा कि वह फलों के बाग में आई हैं ।

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प्रश्न 4.
जितेन नार्गे ने यूमथांग के विषय में क्या बताया ?
उत्तर :
जितेन नार्गे ने यूमथांग के विषय में बताया कि यूमथांग यानी घाटियाँ । हिमालय की गहनतम घाटियाँ और फूलों से लदी वादियाँ यहाँ हैं ।

2. जगह-जगह गदराए पाईन और धूपी के खूबसूरत नुकीले पेड़ों का जायजा लेते हुए हम पहाड़ी रास्तों पर आगे बढ़ने लग कि एक जगह दिखाई दी… एक कतार में लगी सफेद-सफेद बौद्ध पताकाएँ । किसी ध्वज की तरह लहराती…शांति और अहिंसा की प्रतीक ये पताकाएँ जिन पर मंत्र लिख्खे हुए थे । नागें ने बताया-यहाँ बुद्ध की बड़ी मान्यता है ।

जब भी किसी बुद्धिस्ट की मृत्यु होती है, उसकी आत्मा की शांति के लिए शहर से दूर किसी भी पवित्र स्थान पर एक सौ आट श्वेत पताकाएँ फहरा दी जाती हैं । नहीं, इन्हें उतारा नहीं जाता है, ये धीरे-धीरे अपने आप ही नष्ट हो जाती हैं । कई बार किसी नए कार्य की शुरुआत में भी ये पताकाएँ लगा दी जाती हैं पर वे रंगीन होती हैं । नागें बोलता जा रहा था और मेरी नजर उसकी जीप में लगी दलाई लामा की तसवीर पर टिकी हुई थी ।

कई दुकानों पर भी मैंने दलाई लामा की ऐसी ही तसवीर देखी थी । हिचकोले खाती हमारी जीप थोड़ी और आगे बढ़ी । अपनी लुभावनी हँसी बिखेरते हुए जितेन बताने लगा… इस तरह का नाम है कवी-लोग स्टॉक । यहाँ ‘गाइड’ फिल्म की शूटिंग हुई थी । तिब्बत के घीस-खे बम्सन ने लेपचाओं के शोमेन के कुंजतेक के साथ संधि-पत्र पर यहीं हस्ताक्षर किए थे ।

एक पत्थर यहाँ स्मारक के रूप में भी है । (लेपचा और भुटिया । सिक्किम की इन दोनों स्थानीय जातियों के बीच चले सुदीर्घ झगड़ों के बाद शांति वार्ता का शुरुआती स्थल ।)

प्रश्न 1.
पहाड़ी रास्तों पर लेखिका ने क्या देख्ना ?
उत्तर :
लेखिका ने पहाड़ी रास्तों का जायजा लेते हुए देखा कि जगह-जगह गदराए पाईन और धूपी के खूबसूरत नुकीले पेड़ थे । उन्होंने एक कतार में लगी सफेद-सफेद बौद्ध पताकाएँ देखी ।

प्रश्न 2.
किसी बुद्धिस्ट की आत्मा की शांति के लिए क्या किया जाता है ?
उत्तर :
बुद्धिस्ट की आत्मा की शांति के लिए शहर से दूर किसी भी पवित्र स्थान पर एक सौ आठ श्वेत पताकाएँ फहरा दी जाती हैं। फिर ये पताकाएँ उतारी नहीं जाती ।

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प्रश्न 3.
रंगीन पताकाएँ कब और क्यों फहराई जाती हैं ?
उत्तर :
बुद्धिस्ट लोग जब किसी नए कार्य की शुरुआत करते हैं तो उस कार्य की शुरुआत के लिए रंगीन पताकाएँ फहराते हैं ।

प्रश्न 4.
‘गाइड’ फिल्म की शूटिंग कहाँ हुई थी ? उस स्थल की क्या विशेषता है ?
उत्तर :
‘गाइड’ फिल्म की शूटिंग ‘कयी-लोंग स्टॉक’ में हुई थी । इस स्थल की यह विशेषता है कि तिब्बत के चीस-खे-बम्सन ने लेपचाओ के शोमेन से कुंजतेक के साथ संधि पत्र पर इस जगह हस्ताक्षर कर शांतिवार्ता की शुरुआत की थी ।

3. जीवन की अनंनता का प्रतीक वह इरना… उन अद्भुत-अनूठे क्षणों में मुझमें जीवन की शक्ति का अहसास हो रहा था । इस कदर प्रतीत हुआ कि जैसे में स्वयं भी देश और काल की सरहदों से दूर बहती धारा बन बहने लगी हूँ । भीतर की सारी तामसिकताएँ और दुष्ट वासनाएँ इस निर्मल धारा में बह गई । मन हुआ कि अनंत समय तक ऐसे ही बहती र सुनती रहूँ इस हारने की पुकार को ।

पर जितेन मुझे ठेलने लगा… आगे इससे भी सुंदर नजारे मिलेंगे । अनमनी-सी मैं उठी । थोड़ी देर बाद ही फिर वही नजारे-आँखों और आत्मा को सुख देने वाले । कहीं चटक हरे का मोटा कालीन ओढे तो कहीं हलका पीलापन लिए, तो कहीं पलस्तर उखड़ी दीवार की तरह पथरीला और देख्न ही देखते परिदृश्य से सब छू-मंतर… जैसे किसी ने जादू की छडी घुमा दी हो ।

सब पर बादलों की एक मोटी चादर । सब कुछ बादलमय । चित्रलिखित-सी मैं ‘माया’ और ‘छाया’ के इस अनूठे खेल को भर-भर आँखों से देखती जा रही थी । प्रकृति जैसे मुद्दा सयानी बनाने के लिए जीवन रहस्यों का उद्घाटन करने पर तुली थी ।

प्रश्न 1.
झरने को देखकर लेखिका ने क्या महसूस किया ?
उत्तर :
झरने को देखकर लेखिका ने महसूस किया कि जैसे वे स्वयं देश और काल की सरहदों से दूर बहती धारा बनने लगी है । भीतर की सारी कुटिलता इस निर्मल धारा में बह गई । उनका मन हुआ कि वे अनंत तक ऐसे ही निर्मल धारा की तरह बहती रहें ।

प्रश्न 2.
लेखिका क्यों अनमनी हो उठी ?
उत्तर :
लेखिका झरने के सौंदर्य में खोई थी । उसकी ध्वनि को सुन रही थीं । तभी जितेन ने उन्हें आगे बढ़ने के लिए कहा । वे उसी दृश्य में खोए रहना चाहती थी, इसलिए ये अनमनी हो उठी ।

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प्रश्न 3.
सुन्दर नजारे कैसे छू-मंतर हो गए ?
उत्तर :
लेखिका सुन्दर नजारों को देखने में लीन थी । देखते-ही देखते उन नजारों पर बादलों की एक मोटी चादर बिछ गई और सारे नजारे छू-मंतर हो गए । अर्थात् बादलों ने उन नजारों को ढंक दिया और सारे नजारे बादलमय बन गए ।

प्रश्न 4.
प्रकृति के खेल का लेखिका पर क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर :
लेखिका प्रकृति के इस परिवर्तन को निहारती रही । ये ‘माया’ और ‘छाया’ के इस खेल को देखती रहीं तथा प्रकृति द्वारा जीवन रहस्यों का उदघाटन देख्य ये अपने आप को और भी सयानी समझने लगीं। यूमथांग पहुँचने के लिए हमें रात भर लागुंग में पड़ाव लेना था । गगनचुंबी पहाड़ों के तल में साँस लेती एक नन्ही-सी शांत बस्ती लायुंग ।

सारी दौड़-धूप से दूर जिंदगी जहाँ निश्चित सो रही थी । उसी लायुंग में हम ठहरे थे । तिस्ता नदी के तीर पर बसे लकड़ी के एक छोटे-से घर में । मुँह-हाथ धोकर मैं तुरंत ही तिस्ता नदी के किनारे बिखरे पत्थरों पर बैठ गई थी । सामने बहुत ऊपर से बहता झरना नीचे कल-कल बहती तिस्ता में मिल रहा था । मद्धिम-मद्धिम हया बह रही थी ।

पेड़-पौधे झूम रहे थे । गहरे बादलों की परत ने चाँद को ढक रखा था… बाहर परिंदे और लोग अपने घरों को लौट रहे थे । वातावरण में अद्भुत शांति थी । मंदिर की घंटियों-सी…धुंघरुओं की रूनझुनाहटसी । आँखें अनायास भर आई । ज्ञान का नन्हा-सा बोधिसत्व जैसे भीतर उगने लगा… वहीं सुख शांति और सुकून है जहाँ अखंडित संपूर्णता है-पेड़, पौधे, पशु और आदमी-सब अपनी-अपनी लय, ताल और गति में हैं ।

हमारी पीढ़ी ने प्रकृति की इस लय, ताल और गति से खिलवाड़ कर अक्षम्य अपराध किया है । हिमालय अब मेरे लिए कविता ही नहीं, दर्शन बन गया था ।

प्रश्न 1.
लेखिका कहाँ ठहरी थीं ? उस जगह की विशेषता बताइए ।।
उत्तर :
लेखिका लायुग में तिस्ता नदी के किनारे ठहरी थी । वे तिस्ता नदी के किनारे बसे लकड़ी के एक छोटे-से घर में सकी थी।

प्रश्न 2.
तिस्ता नदी के आसपास का वातावरण कैसा था ?
उत्तर :
तिस्ता नदी के आस-पास खुशनुमा वातावरण था । हवा धीरे-धीरे बह रही थी । पेड़-पौधे झूम रहे थे । गहरे बादलों की परत ने चाँद को टैंक लिया था । बाहर परिंदे और लोग अपने घरों को लौट रहे थे । वातावरण में अद्भुत शांति थी ।

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प्रश्न 3.
हमारी पीढ़ी ने कौन-सा अपराध किया है ?
उत्तर :
हमारी पीढ़ी ने प्रकृति से खिलवाड़ किया है । प्रकृति की इस लय, ताल और गति में हस्तक्षेप कर उसके सौन्दर्य को नष्ट करने का अपराध किया है ।

प्रश्न 4.
लायुंग की क्या विशेषता है ?
उत्तर :
लायुंग गगनचुंबी पहाड़ों के तल में साँस लेती एक नन्हीं सी शांत बस्ती है । यहाँ के लोग जिन्दगी की भाग-दीड़ से परे । प्रकृति की गोद में शांतिपूर्वक जीवन बिताते हैं ।

5. लायुंग की सुबह ! बेहद शांत और सुरम्य । तिस्ता नदी की शांत धारा के समान ही कल-कल करती बहती हुई । अधिकतर लोगों की जीविका का साधन पहाड़ी आलू, धान की खेती और दारू का व्यापार । सुबह मैं अकेले ही टहलने निकल गई थी । मैंने उम्मीद की थी कि यहाँ मुझे बर्फ मिलेगी पर अप्रैल के शुरुआती महीने में यहाँ बर्फ का एक कतरा भी नहीं था । यद्यपि हम सी लेवल से 14000 फीट की ऊँचाई पर थे ।

मैं बर्फ देखने के लिए बैचेन थी… हम मैदानों से आए लोगों के लिए बर्फ से ढके पहाड किसी जन्नत से कम नहीं होते । वहीं पर घूमते हुए एक सिक्कीमी नवयुवक ने मुझे बताया कि प्रदूषण के चलते स्नो-फॉल लगातार कम होती जा रही है पर यदि मैं ‘कटाओ’ चली जाऊँ तो मुझे वहाँ शर्तिया बर्फ मिल जाएगी… कटाओ यानी भारत का स्विट्जरलैंड ! कटाओं जो कि अभी तक टूरिस्ट स्पॉट नहीं बनने के कारण सुर्खियों में नहीं आया था और अपने प्राकृतिक स्वरूप में था । कटाओ जो लायुंग से 500 फीट ऊँचाई पर था और करीब दो घंटे का सफर था ।

प्रश्न 1.
लायुंग की सुबह कैसी थी?
उत्तर :
लायुग की सुबह बेहद शांत और सुरम्य थी । तिस्ता नदी की धारा के समान कल-कल बहती हुई ।

प्रश्न 2.
लायुग के लोगों की जीविका का आधार क्या है ?
उत्तर :
लायुंग के अधिकतर लोग पहाड़ी आलू बोकर, धान की खेती करके और दारू का व्यापार करके आय प्राप्त होती है, उसी पर वे अपने जीवन का निर्वाह करते है । वही जीविका का आधार है ।

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प्रश्न 3.
लेखिका क्यों बैचेन थीं ?
उत्तर :
लायुंग आने पर लेखिका को लगा कि उन्हें यहाँ बर्फ देखने को मिलेगी । किन्तु अप्रैल के शुरूआती महीने में यहाँ बर्फ का एक कतरा भी नहीं देखने को मिला । जब वे सी लेवल से 14000 फीट की ऊँचाई पर आई तो वे बर्फ देखने के लिए बैचेन हो उठी थीं।

प्रश्न 4.
सिक्कीमी युवक ने लेखिका को क्या बताया ?
उत्तर :
सिक्कीमी युवक ने लेखिका को बताया कि प्रदूषण के चलते स्नो-फॉल लगातार कम होती जा रही है, पर यदि वे ‘कटाओ’ चली जाएँ तो उन्हें शर्तिया बर्फ मिल जाएगी । कटाओ यानी भारत का स्विट्जरलैंड । यह स्थल टूरिस्ट स्पॉट न बनने के कारण सुर्खियों में नहीं आया था और अपने प्राकृतिक स्वरूप में था ।

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