GSEB Class 11 Hindi Rachana गद्यसमीक्षा

   

Gujarat Board GSEB Hindi Textbook Std 11 Solutions Rachana गद्यसमीक्षा Questions and Answers, Notes Pdf.

GSEB Std 11 Hindi Rachana गद्यसमीक्षा

निम्नलिखित प्रत्येक गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए :

1. हाथ की मजदूरी से ही सच्चे ऐश्वर्य की उन्नति होती है। जापान में मैंने कन्याओं और स्त्रियों को ऐसी कलावती देखा है कि वे रेशम के छोटे-छोटे टुकड़ों को अपनी दस्तकारी की बदौलत हजारों की कीमत का बना देती हैं, नाना प्रकार के प्राकृतिक पदार्थों और दृश्यों को अपनी सुई से कपड़े के ऊपर अंकित कर देती हैं। जापान-निवासी कागज, लकड़ी और पत्थर की बड़ी अच्छी मूर्तियाँ बनाते हैं।

करोड़ों रुपयों के हाथ के बने हुए जापानी खिलौने विदेशों में बिकते हैं। हाथ की बनी हुई जापानी चीजें मशीन से बनी हुई चीजों को मात करती हैं। संसार के सब बाजारों में उनकी बड़ी मांग रहती है। पश्चिमी देशों के लोग हाथ की बनी हुई जापान की अद्भुत वस्तुओं पर जान देते हैं। यदि भारत के तीस करोड़ नरनारियों की उँगलियाँ मिलाकर कारीगरी के काम करने लगें तो उनकी मजदूरी की बदौलत कुबेर का महल चरणों में आप-ही-आप आ गिरे।
– सरदार पूर्णसिंह

प्रश्न 1.

  1. जापान की स्त्रियाँ किस कला में निपुण हैं?
  2. जापान की हाथ-कारीमरी की कौन-सी चीजों की विदेशों में बड़ी माँग रहती है?
  3. इस परिच्छेद के लिए एक उचित शीर्षक दीजिए।

उत्तर :

  1. जापान की स्त्रियाँ दस्तकारी में निपुण हैं। वे अनेक प्रकार के प्राकृतिक दृश्यों और पदार्थों को सुई के सहारे रेशम के कपड़ों पर इस प्रकार प्रकट करती हैं कि जिससे एक-एक टुकड़ा हजारों रुपयों के मूल्य का बन जाता है।
  2. जापान की हाथ-कारीगरी की अनेक चीजों की विदेशों में बड़ी माँग रहती है, जिनमें कागज, लकड़ी और पत्थर से बनाई गई मूर्तियाँ और खिलौने मुख्य हैं।
  3. उचित शीर्षक: जापान की दस्तकारी

2. खुशामद की कला का अपना विज्ञान है। इसके अपने सिद्धांत हैं। किसकी खुशामद करना, कब खुशामद करना, कैसे खुशामद करना – इसका ज्ञान तो होना ही चाहिए। महिलाओं से मतलब निकालना हो, तो उनके रूप-सौंदर्य और वेशभूषा की प्रशंसा कर दीजिए। पुरुषों से काम निकालना हो, तो उनकी बुद्धि, पराक्रम का बखान कर दीजिए। दाता और दानवीर कहने से कंजूस सेठ के दिल में भी उदारता उमड़ पड़ती है।

चापलूसी करते समय सामनेवाले पक्ष की ही प्रशंसा करनी चाहिए। भूलकर भी अपनी बड़ाई नहीं करनी चाहिए। सामनेवाले के किसी शत्रु या द्वेषी की निंदा चापलूसी को और भी असरकारक बना देती है। आदर्श चापलूसी वही है, जिससे सामनेवाला फूलकर कुप्पा हो जाए और चापलूस की मुराद पूरी कर दे।

प्रश्न 1.

  1. महिलाओं से मतलब निकालने के लिए क्या करना चाहिए?
  2. आदर्श चापलूसी कब सिद्ध होगी?
  3. पुरुषों से काम निकालने के लिए क्या करना चाहिए?

उत्तर :

  1. महिलाओं से मतलब निकालने के लिए उनके रूप-सौंदर्य तथा वेशभूषा की प्रशंसा करनी चाहिए।
  2. आदर्श चापलूसी तब सिद्ध होगी, जब सुननेवाला अपनी प्रशंसा सुनकर खूब फूल उठे और चापलूस की मुराद पूरी कर दे।
  3. पुरुषों से काम निकालने के लिए उनकी बुद्धि और पराक्रम की प्रशंसा करनी चाहिए।

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3. इस धरती पर प्रभु की सर्वोत्तम रचना मानव है, परन्तु यह सर्वश्रेष्ठ क्यों? सम्भवतः कम लोग ही इसका रहस्य जानते हैं। इस धरती के सभी जीवजन्तुओं एवं प्राणधारियों में सोना, खाना, पीना, बच्चे पैदा करना आदि अधिकांश बातें समान हैं। विशेषता है तो केवल मानव के धर्म की, जीवन में कर्तव्य और ज्ञान की।

यह कैसी विडम्बना है कि मानव इस धरती पर सर्वश्रेष्ठ होने के बावजूद यह नहीं सोच पाता है कि वह इस संसार में क्यों आया है? उसे क्या करना है, कहाँ जाना है? तथा उसके जीवन का ध्येय क्या है? उद्देश क्या है? इन बातों पर विचार करने के बजाय वह अपने शरीर को सुख देनेवाले कार्यों में लिप्त रहता है। किन्तु वह भूल जाता है कि यह शरीर कितना गन्दा है, इससे निकलनेवाली प्रत्येक वस्तु कितनी दुर्गन्धयुक्त और अपवित्र है।

आँख, कान, नाक और गुदा द्वारा गन्दा मल निकलता है, जिन्हें एक क्षण के लिए भी हम अपने पास नहीं रख सकते हैं। किन्तु वही मल जब तक शरीर के अन्दर होता है तब तक इसमें किसी भी प्रकार की गन्ध नहीं आती, क्योंकि उसे शुद्ध करनेवाली आत्मा शरीर में होती है। इस आत्मारूपी शक्ति को जानने की तथा उसे उद्ग्रीव करने के लिए कभी सोचा? कभी प्रयत्न किया? योगसाधना इसका मार्ग है। योगसाधना ही मनुष्य को सर्वोत्तम प्राणी सिद्ध कर सकती है।

प्रश्न 1.

  1. प्रभु की सर्वोत्तम रचना कौन-सी है?
  2. कौनकौन सी बातें जीवजन्तु तथा प्राणधारियों में समान हैं?
  3. योगसाधना किसका मार्ग है?

उत्तर :

  1. प्रभु की सर्वोत्तम रचना मनुष्य है।
  2. सोना, खाना, पीना और बच्चे पैदा करना आदि बातें सभी जीव-जन्तुओं और प्राणधारियों में समान हैं।
  3. योगसाधना अपनी आत्मशक्ति को जानने तथा उसे बढ़ाने का मार्ग है।

4. हंसने का एक सामाजिक पक्ष भी होता है। हँसकर हम लोगों को अपने निकट ला सकते हैं और व्यंग्य करके उन्हें दूरस्थ बना देते हैं। जिसको भगाना हो उसकी थोड़ी देर हँसी-खिल्ली उड़ाइए, वह तुरंत बोरिया-बिस्तर गोलकर पलायन करेगा। जितनी मुक्त हँसी होगी, उतना समीप व्यक्ति खिचेगा। इसीलिए तो श्रोताओं की सहानुभूति अपनी ओर घसीटने के लिए चतुर वक्ता अपना भाषण किसी रोचक कहानी या घटना से आरंभ करते हैं।

जनता यदि हँसी, तो चंगुल में फैसी। सामाजिक नियमों और मूल्यों को मान्यता दिलाने और रूढ़ियों को निष्कासित करने में पुलिस या कानून सहायता नहीं करता, किंतु वहाँ हास्य का चाबुक अचूक बैठता है। हास्य के कोडे, उपहास-डंक और व्यंग्य-बाण मारकर आदमी को रास्ते पर लाया जा सकता है। इस प्रकार गुमराह बने हुए समाज की रक्षा की जा सकती है।

प्रश्न 1.

  1. समाज में हंसी और व्यंग्य का क्या उपयोग होता है?
  2. हास्य का चाबुक कौन-सा विशेष कार्य करता है?
  3. इस परिच्छेद के लिए एक उचित शीर्षक दीजिए।

उत्तर :

  1. समाज, में हंसी का उपयोग लोगों की निकटता पाने के लिए और व्यंग्य का उपयोग उन्हें दूर करने के लिए होता है।
  2. हास्य का चाबुक सामाजिक नियमों और मूल्यों को मान्यता दिलाने तथा रूढ़ियों को दूर करने का विशेष कार्य करता है। .
  3. उचित शीर्षक: हास्य-व्यंग्य का प्रभाव

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5. जीवन एक अनमोल निधि है। यदि आप किसी कारणवश उसका समुचित लाभ अथवा आनंद नहीं उठा पाते, तो आपका पहला कर्तव्य है कि आप अपनी वर्तमान परिस्थिति का अच्छी तरह विश्लेषण करें। आपकी समस्या क्या है, इसे भली-भाँति समझें और अपनी मुश्किलों को दूर करने का उपाय सोचें। इसके विपरीत यदि आप परिस्थितियों को अपने ऊपर हावी होने देते हैं और अपने वास्तविक एवं कल्पित कष्टों से मन को दुःखी बनाए रहते हैं, तो आप अपने जीवन का रस नहीं ले सकते।

बहुत संभव है, आपका कष्ट आर्थिक हो। परिवार के कई लोगों के भरणपोषण के लिए आपको अप्रिय अथवा अरुचिकर कार्य भी करने पड़ते हों, आपको काफी वेतन न मिलता हो अथवा किसी गंभीर कष्ट से आप दबे हों, लेकिन घबराने से क्या इन सबका निराकरण हो जाएगा? अतः समस्या से डरिए मत, उसकी शिकायत मत कीजिए, बल्कि जूझने के लिए तैयार हो जाइए।

प्रश्न 1.

  1. हम जीवन को रसमय कैसे बना सकते हैं?
  2. जीवन का सच्चा आनंद कैसे लिया जा सकता है?
  3. मनुष्य अरुचिकर कार्य करने के लिए कब तैयार होता है?

उत्तर :

  1. हम परिस्थितियों का सामना करें और अपने वास्तविक तथा कल्पित कष्टों से मन को दुःखी न होने दें। इस प्रकार हम अपने जीवन को रसमय बना
  2. अपनी परिस्थिति और वर्तमान समस्या को भली-भाँति समझकर मुश्किलों को दूर करने का उपाय सोचने व करने पर जीवन का सच्चा आनंद लिया जा सकता है।
  3. जब मनुष्य को बड़े परिवार के निर्वाह की जिम्मेदारी खूब व्यथित कर रही हो, उसे काफी वेतन न मिलता हो, किसी गंभीर संकट में फंसा हो तभी मनुष्य अरुचिकर कार्य करने के लिए तैयार हो जाता है।

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6. मनुष्य सुख के पीछे लगा रहता है। सुख पाने की, खुश बनने की वह जीवनभर कोशिश करता रहता है। जीवन में आवश्यकताओं की पूर्ति के बाद उसे सुख मिलता है। उत्सव के दिनों में भी उसे सुख मिलता है। जीवन में आवश्यकताओं का तांता लगा रहता है। एक की पूर्ति के बाद दूसरी सामने आती है। इसलिए पूर्ति के बाद मिलनेवाला सुख अधिक समय तक नहीं रहता। उत्सव में हम किसी आवश्यकता का अनुभव नहीं करते। हम सारे कामकाज छोड़ बैठते हैं। खुशियाँ मनाते – हैं। मेहमानों से मिलते हैं। खाते हैं। खिलाते हैं।

अपनी चिंताएं भूल जाते हैं। केवल अपने मनुष्यपन को ख्याल में रखते हैं। स्वार्थ को मन में नहीं लाते। दो दिनों के लिए एक अलग दुनिया बसाते हैं और उसी में खो जाते हैं। बिना कारण घूमते हैं। व्यर्थ में खर्च करते हैं। फिर भी हम खुश रहते हैं! ये दिन हमें सांसारिक बंधन और चिंताओं से दूर खुशी की दुनिया में ले जाते हैं। उत्सव का सुख-टॉनिक जैसा है।

प्रश्न 1.

  1. मनुष्य जीवनभर किस बात को पाने का प्रयत्न करता है?
  2. आवश्यक चीजें मिलने के बाद उनके मिलने का सुख अधिक समय तक क्यों नहीं रहता?
  3. इस परिच्छेद के लिए एक उचित शीर्षक दीजिए।

उत्तर :

  1. मनुष्य जीवनभर सुख और खुशियाँ पाने की कोशिश में लगा रहता है। उन्हें पाने के लिए वह अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने का प्रयत्न करता रहता है।
  2. जीवन में आवश्यकताओं का अंत नहीं है। इसलिए आवश्यक चीजें मिलने के बाद भी उनके मिलने का सुख अधिक समय तक नहीं रहता।
  3. उचित शीर्षक: उत्सव का सुख अथवा उत्सवों का महत्त्व

7. एक युवक का दूसरे युवक को राह दिखाना वैसा ही है, जैसे कि एक अंधा दूसरे अंधे को राह बताए; वे दोनों गड्ढे में गिरेंगे। वही एक विश्वासु मार्गदर्शक बन सकता है; जो कई बार वह रास्ता तय कर चुका है, जिस पर तुम चलना चाहते हो। मैं वैसा ही मार्गदर्शक बनना चाहता हूँ, जो समस्त रास्तों पर चल चुका है और जो अंत में तुम्हें सर्वश्रेष्ठ मार्ग बता सकता है।

यदि तुम मुझसे पूछो कि मैं स्वयं बुरे रास्ते की ओर क्यों गया, तो मैं सत्य कहूँगा कि उसका कारण था, किसी अच्छे गुरु का न मिलना। बुरे लोगों के कामों ने मुझे एक ओर खींच लिया और उस समय अच्छे मार्ग बतानेवाले योग्य गुरु उपलब्ध न थे। लेकिन यदि कोई योग्य उपदेशक मेरे कष्टों में सहभागी बनकर मुझे कुछ बताता, तो मैं बहुत-से असुविधापूर्ण और मूर्खताभरे कार्यों से बच जाता, जिनको अनुभवहीन यौवन ने मुझसे करवाया था।

प्रश्न 1.

  1. विश्वासु मार्गदर्शक कौन बन सकता है?
  2. लेखक बुरे मार्गों में क्यों भटक गया?
  3. गुरु की आवश्यकता के बारे में लेखक क्या कहता है?

उत्तर :

  1. जो जीवन के विषय में बहुत कुछ जान चुका हो, जो जीवन के सभी रास्तों पर चल चुका हो और जिसमें भले-बुरे का विवेक हो वही व्यक्ति किसी का विश्वासु मार्गदर्शक बन सकता है।
  2. लेखक को बुरे मार्गों से हटाकर सन्मार्ग पर ले जाने की योग्यता रखनेवाले अनुभवी गुरु नहीं मिले, इसलिए लेखक बुरे मार्गों में भटक गया।
  3. लेखक की राय है कि युवक के जीवन में एक ऐसे अनुभवी गुरु की आवश्यकता है, जो उसे गुमराह होने से बचाए और सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे।

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8. संपूर्ण स्वस्थ मनुष्य लम्बा आयुष्य भोगता है और बीमार व्यक्ति कम, ऐसा नहीं है। हम जानते हैं कि मृत्यु अचानक हो जाती है। मनुष्य को अपना कार्य मन लगाकर, ध्यान लगाकर, जी जान से करना चाहिए। काम करने से दीर्घायु भोग सकते हैं। दुःखी और रोगी व्यक्ति भी जीवन में महान कार्य कर सकते हैं।

हम निवृत्त व्यक्तियों से सुनते आए हैं कि मुझे काम तो करना ही पड़ेगा। जीवन की प्रवृत्ति काम है। अगर काम में मन नहीं लगता तो जीवन निकम्मा बन जाता है। कितने साठ-पैंसठ की आयु के लोग उत्साह से काम करते हैं। जीवन को सरल, अर्थपूर्ण और उपयोगी बनाना है तो समझ लो कि प्रवृत्ति ही जीवन है, निवृत्ति मृत्यु समान है।

प्रश्न 1.

  1. प्रवृत्ति के बारे में लेखक क्या समझते हैं?
  2. निवृत्ति के बारे में लेखक के क्या विचार हैं?
  3. निवृत्त व्यक्ति क्या कहते हुए सुने गए हैं?

उत्तर :

  1. लेखक समझते हैं कि प्रवृत्तिमय जीवन ही सच्चा जीवन है। इसलिए व्यक्ति को हमेशा काम में लगे रहना चाहिए। प्रवृत्त रहने से ही जीवन सरस, सार्थक एवं उपयोगी बन सकता है।
  2. लेखक निवृत्ति को मृत्यु के समान मानते हैं। निवृत्त या निष्क्रिय रहने से जीवन निकम्मा बन जाता है।
  3. निवृत्त व्यक्ति यह कहते हुए सुने गए हैं कि अवकाश मिलने के बाद भी उन्हें काम तो करना ही पड़ेगा।

9. स्त्रियों की शिक्षा का स्वरूप पुरुषों की शिक्षा के स्वरूप से अलग रहना चाहिए। कताई, बुनाई, सिलाई, कटाई आदि की शिक्षा तो उन्हें दी ही जाए, किंतु इसी के साथ उन्हें कुटीर उद्योगों में भी निपुण बनाया जाना चाहिए, जिससे कि बुरा समय आने पर वे किसी की मोहताज न रहें।

स्त्रियों को शिक्षित करने से हमारा घर स्वर्ग बन सकता है। नासमझ और फूहड़ औरतों से परिवार के परिवार तबाह हो जाते हैं। जिस घर की स्त्रियाँ सुशिक्षित और सुसंस्कृत होती हैं, वे घर जिंदा विश्वविद्यालय होते हैं। शिक्षा का अर्थ किताबी ज्ञान ही नहीं है और न ही अक्षरज्ञान है, वह तो जीने की कला है।

प्रश्न 1.

  1. शिक्षा का अर्थ क्या है?
  2. बुरे समय में स्त्रियाँ स्वावलम्बी कैसे रह सकती हैं?
  3. इस परिच्छेद के लिए एक उचित शीर्षक दीजिए।

उत्तर :

  1. शिक्षा का सही अर्थ है सुंदरता से जीवनयापन करने की कला। केवल किताबी ज्ञान या अक्षरज्ञान ही शिक्षा नहीं है।
  2. कताई, बुनाई, सिलाई आदि काम सीखकर तथा कुटीर उद्योगों में निपुणता पाकर इनके सहारे बुरे समय में भी स्त्रियाँ स्वावलम्बी रह सकती हैं।
  3. उचित शीर्षक: स्त्री-शिक्षा का महत्त्व अथवा शिक्षा और स्त्रियाँ

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10. मैं पहाड़ की बेटी हूँ। मेरे पिता इतने ऊँचे हैं कि आकाश को छूते हैं। जब मैं छोटी थी तब बहुत चंचल थी। जब मैं कुछ बड़ी हुई तब दूर तक दौड़ लगाने लगी। अब मुझे नयी-नयी दुनिया देखने की चाह होने लगी। पिता की गोद छोड़कर चलती बनी। मेरा मार्ग वन-प्रान्तरों से गुजर रहा था। मैं बहुत ही प्रसन्न थी। किनारों पर खड़े पेड़ों ने झुक- झुककर मेरा स्वागत किया। बादलों ने पानी बरसाकर मेरी शक्ति बढ़ा दी।

अपने को सुखद वातावरण में पाकर मेरे हृदय में उदारता के भाव जाग्रत हुए। प्यासे पक्षियों को तथा पथिकों को जल पिलाने में मुझे बहुत सुकून मिलता था। खेतों की सिंचाई करने के लिए मुझसे नहरें और नालियाँ निकाली गई। खेतों को हरे-भरे होते हुए देख मेरा हृदय बाँसों उछलने लगा। मेरे जल से विद्युत शक्ति उत्पन्न होने लगी। कल-कारखाने चलने लगे। लेकिन इन कारखानों का कचरा वे लोग मुझमें डालने लगे। मेरा निर्मल जल धीरे-धीरे गन्दा हो गया। मेरे उपकार का यह बदला? मनुष्य कितना स्वार्थी है? भगवान, इसे सन्मति देना।

प्रश्न 1.

  1. नदी के पिता कौन है?
  2. बचपन में नदी का स्वभाव कैसा था?
  3. नदी को किस बात का दुःख है?

उत्तर :

  1. नदी के पिता एक बहुत ऊँचे पर्वत हैं।
  2. बचपन में नदी का स्वभाव बहुत चंचल था।
  3. नदी को इस बात का दुःख है कि लोगों ने कारखानों का कचरा डालकर उसके निर्मल जल को गन्दा कर दिया है।

11. तक्षशिला, नालन्दा आदि विद्या केन्द्र हमारी संस्कृति, सभ्यता और कला के गढ़ थे। ज्ञान के क्षेत्र में देश और जाति का भेद लुप्त हो जाता है। विद्यालयों में पढ़ने के लिए यूरोप तथा रशिया के सुदूर देशों से भी विद्यार्थी आते थे। यहाँ की शिक्षा प्रणाली प्राचीन गुरुकुलों के ढंग की थी। छात्रों और अध्यापकों में परस्पर बड़ा प्रेम था।

नालन्दा के करीब 700 वर्ष के जीवन में एक भी ऐसा उदाहरण नहीं मिलता, जिसमें किसी विद्यार्थी ने बुरा आचरण करके इसे कलंकित किया हो। नालन्दा की शिक्षा सर्वांगीण थी। बौद्ध धर्म के अतिरिक्त वेद, व्याकरण, धर्मशास्त्र, आयुर्वेद, दर्शन, साहित्य, कलाएँ तथा खगोल, ज्योतिष आदि शास्त्रों की भी शिक्षा दी जाती थी।

यहाँ व्याकरण, तर्कशास्त्र, आयुर्वेद और शिल्पकला की शिक्षा अनिवार्य थी। विद्यार्थी पर व्यक्तिगत रूप से ध्यान दिया जाता था। यहाँ करीब 1500 अध्यापक पढ़ाते थे। अध्यापक अपने-अपने विषय के पूर्ण ज्ञाता थे। बारहवीं शताब्दी में मुहम्मद बखत्यार खिलजी ने नालन्दा पर अचानक आक्रमण कर उसको तहस-नहस कर दिया। आज तो उसके केवल खंडहर रह गये हैं, जिनके दर्शनकर हम अब भी प्रेरणा ले सकते हैं।

प्रश्न 1.

  1. तक्षशिला, नालन्दा किसके गढ़ थे?
  2. इन विद्यालयों में कहाँ-कहाँ से विद्यार्थी आते थे?
  3. 700 वर्षों के इतिहास में नालन्दा में कौन-सा उदाहरण नहीं मिलता?

उत्तर :

  1. तक्षशिला और नालन्दा भारतीय संस्कृति, सभ्यता और कला के गढ़ थे।
  2. इन विद्यालयों में भारत के भिन्न-भिन्न भागों तथा रशिया और यूरोप के सुदूर देशों से विद्यार्थी आते थे।
  3. 700 वर्षों के इतिहास में एक भी उदाहरण ऐसा नहीं मिलता जिसमें किसी विद्यार्थी ने बुरा आचरण करके नालन्दा को कलंकित किया हो।

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12. हमारे पूर्वजों ने स्त्री का बड़ा महत्त्व माना है। उन्होंने स्त्री को धार्मिक कार्यों में अग्रस्थान दिया है और उसकी बड़ी प्रशंसा की है। वे मानते थे कि जिस घर में विदुषी नारी होती है, वहाँ के नरनारी सद्गुणों से विभूषित हो जाते हैं। इसीलिए तो मनु ने कहा है कि “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः” अर्थात् जहाँ नारियों की पूजा होती है, वहाँ देवता निवास करते हैं।

स्त्री तो घर की रानी है। उसका प्रभाव बच्चों पर सबसे ज्यादा होता है। बचपन में बालकों पर जो गहरे संस्कार पड़ते हैं, वे हमेशा के लिए रहते हैं। इस प्रकार स्त्री के कारण ही मानवसमाज ने उन्नति की है। स्त्री ही दुनिया में बड़े-बड़े महापुरुष : पैदा करती है। मानवसमाज की उन्नति में उसका जितना हाथ है उतना किसी और का नहीं है। उसकी प्रेरणा से संसार में मनुष्य-रत्न पैदा होते हैं और मानवसमाज को उन्नति के पथ पर ले जाते हैं।

प्रश्न 1.

  1. हमारे पूर्वजों ने स्त्री को क्या महत्त्व दिया है?
  2. बालकों के जीवन-निर्माण में स्त्री का क्या योगदान होता है?
  3. इस परिच्छेद के लिए एक उचित शीर्षक दीजिए।

उत्तर :

  1. हमारे पूर्वजों ने स्त्री की महत्ता स्वीकार करते हुए उसे धार्मिक आदि कार्यों में अग्रस्थान दिया है।
  2. स्त्री घर की रानी है, बच्चों पर उसका प्रभाव सबसे अधिक होता है। अतएव बालकों के जीवन-निर्माण में स्त्री का योगदान अधिक है।
  3. उचित शीर्षक: नारी की महत्ता

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