GSEB Class 11 Sanskrit व्याकरण संस्कृत साहित्य का परिचय

Gujarat Board GSEB Solutions Class 11 Sanskrit व्याकरण संस्कृत साहित्य का परिचय Questions and Answers, Notes Pdf.

GSEB Std 11 Sanskrit Vyakaran संस्कृत साहित्य का परिचय

प्रस्तावना :
संस्कृत साहित्य के दो मुख्य विभाग हैं :

  • वैदिक साहित्य और
  • प्रशिष्ट साहित्य।

वैदिक साहित्य के आद्यग्रंथ ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद – ये चार वेद हैं। इन्हें संहिता ग्रंथ के रुप में पहचाना जाता है। इसके बाद दूसरे क्रम पर वेद की इन संहिताओं की विशेष स्पष्टता के लिए रचित शतपथ इत्यादि ब्राह्मणग्रंथ आते हैं। तत्पश्चात् ऐतरेय आदि आरण्यक ग्रंथ, ईशावास्य आदि उपनिषद तथा वेदों के संरक्षण के लिए रचे गए शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद एवं ज्योतिष – इन छः वेदांगों का क्रम है।

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अंत में सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, पूर्व मीमांसा और उत्तर मीमांसा (वेदांत) ये छः वेद के उपांग हैं, इन्हें भी वैदिक साहित्य में समाविष्ट किया गया है।

जैसा कि हमने ऊपर देखा कि वैदिक साहित्य का आरंभ वेद की संहिताओं से होता है। वेद की इन संहिताओं की संख्या चार है – ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद, भारतीय परंपरा के अनुसार ये वेद संहिताएँ अपौरुषेय हैं अर्थात् ये किसी व्यक्ति विशेष की रचना नहीं हैं। ईश्वर ने स्वयम् ही तप से पवित्र हुए ऋषियों के हृदय में वेदों को प्रकाशित किया है। जिस तरह ईश्वर अनादि, अनंत और अविनाशी है, वैसे ही ईश्वर के ज्ञान से ये वेद भी अनादि, अनंत और अविनाशी हैं। जिनके हृदय में वेदों का प्रकाश हुआ वे ऋषि मंत्रद्रष्टा या वेद के द्रष्टा कहलाते हैं।

ऋषयः मन्त्रदृष्टारः। ऐसे ऋषियों के नामों का आज भी तत्संबंधी मंत्र के साथ उल्लेख होता है।

भारतीय परंपरा में ऐसा माना जाता है कि वेदों के आविर्भाव का समय सृष्टि का प्रारंभकाल है। विश्वभर के विद्वानों के मतानुसार ऋग्वेद विश्व का प्राचीनतम ग्रंथ है। इससे स्पष्ट है कि वेद साहित्य सर्वाधिक प्राचीन है।

वेद शब्द का अर्थ

वेद शब्द विद् धातु से निष्पन्न है। विद धातु के अनेक अर्थ हैं; जैसे जानना, पाना और होना इत्यादि। इन सभी धात्वर्थों को देखने से पता चलता है कि वेद शब्द विविध अर्थों का वाचक है। जैसे – जिससे सभी मनुष्य सत्य या ईश्वर को जान सकें, प्राप्त कर सकें, विचार कर सकें और विद्वान बन सकें। उन्हें ‘वेद’ कहते हैं।

वेद के पर्याय पद

भिन्न-भिन्न कारणों से वेदों के नामांतर भी हुए हैं। जैसे – विविध शास्त्रों का मूलस्रोत इन वेदों में होने के कारण इन्हें आम्नाय या आगम कहा जाता है। एक ऋषि के पास से दूसरे ऋषि द्वारा कंठस्थ करके संरक्षित किए जाने से वेद श्रुति कहलाते हैं। आरंभ में ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद ये तीन ही वेद मुख्य थे। इसलिए वे ‘त्रयी’ अथवा ‘वेदत्रयी’ के रूप में जाने जाते हैं। इस तरह इन वेदों का अलग-अलग संदर्भ में भिन्न-भिन्न नाम से उल्लेख होता है।

1. ऋग्वेद

ऋग्वेद – विषय :
चारों वेद संहिताओं में ऋग्वेद का क्रम प्रथम है। ऋग्वेद प्राचीनतम वेद है। ऋच् धातु से ऋक् या ऋचा शब्द बना है। वैदिक परम्परा के अनुसार जिसमें स्तुति की गई हो, ऐसे मंत्र को ऋक या ऋचा कहते हैं। ऋग्वेद के मंत्रों में अग्नि, इन्द्र, वरुण, पर्जन्य, उषा आदि देवों की स्तुति की गई है।।

ऋग्वेद का आकार :
ऋग्वेद में दस हजार से अधिक मंत्र है और मंत्र दस मंडलों में विभाजित हैं। प्रत्येक मंडल में अनेक सूक्त हैं। ऋग्वेद के सूक्तों की कुल संख्या 1028 है। इसके अंतर्गत मंत्रों की कुल संख्या 10552 है। प्रत्येक सूत्र में एकाधिक मंत्र हैं। ऋग्वेद की पाँच शाखाएँ थीं। आज उनमें से दो शाखाएँ ही उपलब्ध हैं – शाकल और बाष्कल।

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ऋग्वेद महिमा :
ऋग्वेद में आए पुरुषसूक्त, नासदीय सूक्त, हिरण्यगर्भसूक्त जैसे दार्शनिक सूक्त: संज्ञान सूक्त, दानस्तुतिसूक्त, विवाहसृक्त जैसे पारिवारिक सामाजिक सूक्त तथा पुरुरवा-उर्वशी संवाद-सूक्त, सरमापणि संवादसूक्त जैसे संवाद सूक्त अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं और वे अति प्रसिद्ध हुए हैं। विद्वान मानते हैं कि ऋग्वेद के संवाद सूक्तों से संस्कृत नाटकों का विकास हुआ।

ऋग्वेद की सूक्तियाँ

एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति। – ऋग्वेद (ऋ.), मण्डल 1, सूक्त 168, ऋचा 46
एक सत्य – ईश्वर को विद्वान अनेक रीति से कहते हैं।
सा मा सत्योक्तिः परि पातु विश्चतः। ऋ. 10. 37. 2
वे सत्यवचन – सत्यज्ञान मेरी सब तरफ से रक्षा करें।
संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्। ऋ. 10. 191.2
साथ चलो, साथ में बोलो, आप सबके मन में एकसमान विचार जन्में।

2. यजुर्वेद

यजुर्वेद विषय :
देवपूजा, संगतिकरण और दान – ऐसे तीन अर्थ रखनेवाली यज् धातु से यजुस् शब्द बना है। इससे देवपूजन या यजन् करनेवाले मंत्रों को यजुस् कहते हैं। इस तरह इस वेद में आनेवाले यजुस् – मंत्रों का अनेक प्रकार के यज्ञ-याज्ञादि विधिविधान के साथ संबंध होने से इस संहिताग्रंथ को यजुर्वेद कहा जाता है।

यजुर्वेद आकार :
यजुर्वेद में 1975 मंत्र हैं। ये सभी मंत्र चालीस अध्यायों में विभाजित हैं। प्रत्येक अध्याय में मंत्रों की संख्या अलग-अलग है। कतिपय मंत्र पद्यात्मक हैं, तो कुछ मंत्र गद्यात्मक भी हैं।

यजुर्वेद की मुख्यतः दो शाखाएँ हैं :

  • शुक्ल यजुर्वेद और
  • कृष्ण यजुर्वेद।

याज्ञवलक्य ने सूर्य की उपासना करके उनकी कृपा से यजुर्वेद का ज्ञान प्राप्त किया था, उसे शुक्ल यजुर्वेद कहा जाता है। शुक्ल यजुर्वेद की दो शाखाएँ प्रचलित हैं :

  • काण्व और
  • माध्यंदिन।

जबकि कृष्ण यजुर्वेद की चार शाखाएँ प्रचलित हैं :

  • तैत्तिरीय
  • मैत्रायणी
  • काठक और
  • कपिष्ठल कठ।

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यजुर्वेद सूक्तियाँ

अनृतात्सत्यमुपैमि। – यजुर्वेद, अध्याय 1. मन्त्र 4
मैं असत्य से दूर होकर सत्य को प्राप्त होऊँ।
मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे। – यजु. 16. 18
मैं सभी प्राणियों को मित्र की दृष्टि से देखू।

3. सामवेद :

सामवेद विषय : ‘साम’ का अर्थ है गीति-गान। इसलिए सामवेद गान-मंत्रों का संग्रह है। यज्ञ के अवसर पर उद्गाता ऋत्विज इन मंत्रों से देवताओं का स्तुतिगान करते हैं। वेदानां सामवेदोऽस्मि। (वेदों में सामवेद हूँ।) ऐसा कहकर श्रीकृष्ण ने भगवद् गीता में सामवेद की महिमा बताई है।

सामवेद आकार : सामवेद में कुल 1875 मंत्र हैं। ये सभी पूर्वार्चिक तथा उत्तरार्चिक, इस तरह के दो भागों में विभक्त हैं। पूर्वार्चिक में अग्नि, इंद्र, सोम इत्यादि देवों का स्तुतिगान हैं और उसमें कुल 650 मंत्र हैं, जबकि उत्तरार्चिक में 1225 मंत्र हैं, जिनमें जशराज, संवत्सर, एकाह इत्यादि वैदिक अनुष्ठान के मंत्रगीत हैं।

सामवेद की असंख्य शाखाएँ होने का उल्लेख मिलता है। आज तो मात्र तीन ही शाखाएँ उपलब्ध है :

  • कौथुमीय,
  • राणायणीय और
  • जैमिनीय।

सामवेद की विशेषता : संगीतशास्त्र का उद्गम सामवेद को माना गया है। साम के चार प्रकार के गान प्रसिद्ध हैं – ग्राम गान, अरण्य गान, उद्गान तथा उह्यगान।

4. अथर्ववेद :

अथर्ववेद का परिचय : अथर्व शब्द यह गति या चेष्टा का अर्थ रखनेवाली धातु पर्व से निष्पन्न है। इसीलिए गति या चेष्टा के अभाववाली स्थिति (न = अ) को अथर्व कहते हैं। इसका आशय इस तरह लिया जाता है कि स्थिरता या चित्तवृत्तियों के निरोधरूप योग इत्यादि का उपदेश होने से इसे अथर्ववेद कहा जाता है। कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि अथर्व यह ऋषि का नाम है। अथर्व नामक ऋषि द्वारा इन मंत्रों का दर्शन किए जाने से इस वेद को ‘अथर्वाङ्गिरस’ भी कहते हैं। हालांकि आरंभ में ‘वेदत्रयी’ में उसे स्थान नहीं मिला था, परन्तु उसकी महत्ता तथा उपयोगिता का पता चलने पर उसे अन्य तीन वेदों की तरह ही गौरव प्राप्त हुआ।

अथर्ववेद का आकार :
अथर्ववेद में बीस कांड हैं। प्रत्येक कांड में सूक्तों की संख्या कम-अधिक है। इन सूक्तों की कुल संख्या 736 है। कुल मिलाकर लगभग 6000 मंत्र इस वेद में समाहित है। अथर्ववेद की नौ शाखाएँ थीं। आज तो मात्र दो ही शाखाएँ।

उपलब्ध हैं :

  • शौनक और
  • पिप्पलाद।

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अथर्ववेद – विषय :
अथर्ववेद में विविध रोगों से निवृत्ति उपाय, कृषि एवं पशुपालन, राज्यशासन, ब्रह्मविद्या, मातृभूमि गौरव, पितृमेघ तथा यज्ञादि के विधान की बातें मुख्य हैं। इस वेद में पृथ्वीसूक्त, कालसूक्त, ब्रह्मचर्यसूक्त, विवाहसूक्त, मधुविद्यासूक्त इत्यादि महत्त्वपूर्ण सूक्त हैं। अथर्ववेद के विषयों का सामान्य जनजीवन के साथ प्रगाढ़ संबंध है, इसीलिए इस वेद को ‘सामान्य जनता का वेद’ के रूप में भी जाना जाता है।

अथर्ववेद की सूक्तियाँ

अनुव्रतः पितुः पुत्रो मात्रा भवतु संमनाः। अथर्ववेद, काण्ड 3, सूक्त 30, मन्त्र 2
पुत्र वह है जो पिता के व्रतों का पालन करे और माता के मनोनुकूल बने।
शतहस्त समाहर सहस्रहस्त सं किर। अथर्व. 3. 24.4
हे मनुष्य सैकड़ों हाथों से एकत्र कर और हजारों हाथ से बाँट।
माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्याः। अथर्व. 12. 1. 12
पृथ्वी मेरी माता है और मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ।

उपनिषद

उपनिषद् (स्त्रीलिंग) शब्द उप + नि + सद् धातु से बना है। इसलिए उसका अर्थ ‘गुरु के आसपास निष्ठापूर्वक बैठकर प्राप्त किया जानेवाला परमतत्त्व का ज्ञान’ होता है। वैदिक साहित्य में सबसे अंत में आने के कारण उपनिषद साहित्य ‘वेदांत’ के रूप में भी पहचाना जाता है। उपनिषदों का चिंतन मुख्यतः जीव, जगत और जगदीश (ईश्वर) या ब्रह्म के विषय में है। इसी कारण उपनिषदों को ‘ब्रह्मविद्या’ भी कहते हैं।

उपनिषदों की संख्या 200 से भी अधिक है। फिर भी इनमें से 108 उपनिषदों को सारभूत उपनिषद माना जाता है। इन सारभूत उपनिषदों में भी महत्त्वपूर्ण और अतिप्रसिद्ध उपनिषद तो मात्र दस ही हैं, जो निम्नानुसार हैं :

ईश-केन-कठ-प्रश्न-मुण्ड-माण्डूक्य-तित्तिरिः।
ऐतरेयं च छान्दोग्यं बृहदारण्यकं दश।।

अर्थात् ईशावस्य, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेयः, छान्दोग्य और बृहदारण्यक – ये दस उपनिषद (मुख्य)

कुछ विद्वान इन मुख्य उपनिषदों में एक अन्य – श्वेताश्वतर उपनिषद का भी समावेश करते हैं। इस तरह मुख्य उपनिषदों की संख्या ग्यारह हो जाती है। आदि शंकराचार्य सहित अनेक आचार्यों ने उन पर सुंदर भाष्य लिखे हैं।

अति प्राचीन गिने जानेवाले इन उपनिषदों का रचनाकाल ई.स.पूर्व 1500 से आरंभ करके भगवान बुद्ध के जन्म के पूर्व यानी कि ई.स. पूर्व 700 तक माना जाता है।।

यम-नचिकेता, याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी, उद्दालक-आरुणि-श्वेतकेतु आदि के संवादों के माध्यम से उपनिषद गहनतम सत्यों को सरलतम रीति से प्रस्तुत करते हैं। उपनिषदों में परमात्मा, जीवात्मा, जगत का स्वरूप, मोक्ष की स्थिति तथा उसकी प्राप्ति के साधन, सृष्टि की उत्पत्ति आदि विषयों का समावेश होता है। उपनिषदों का केन्द्रीय सिद्धांत है ‘एकेन विज्ञातेन सर्वमिदं विज्ञातं भवति। (अर्थात् एक ब्रह्म को जान लेने से यह सब कुछ ही जान लिया जाता है।)

विश्व में तत्त्वचिंतन की दृष्टि से उपनिषद श्रेष्ठ हैं। यह साहित्य समस्त विश्व को शांति के मार्ग पर खींच ले जानेवाला है। विश्व की सभी समस्याओं के वास्तविक समाधान उपनिषदों के तत्त्वज्ञान में हैं।

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कठोपनिषद

इस उपनिषद में कृष्ण यजुर्वेद की कठ शाखा का ही समावेश होता है। नचिकेता तथा यमराज के बीच संवाद के द्वारा ब्रह्मविद्या का उपदेश इस उपनिषद की विषयवस्तु है। यमराज नचिकेता को तीन वरदान माँगने के लिए कहते हैं। नचिकेता बालक है तथापि महाज्ञानी है। बूढ़ी गायों को दान में देकर पुण्य कमाने की कामना करनेवाला उसका पिता ‘संसारी जीवात्मा’ का प्रतीक है। जब कि नचिकेता मोह से मुक्त है। पिता के क्रोध से यमराज के पास गया नचिकेता यमराज को प्रसन्न करके ब्रह्मज्ञान प्राप्त करता है।

कठोपनिषद की यह कथा अत्यंत प्रभावशाली है। इसके मंत्रों में भी बालक जैसी मुग्धता, सरलता और तरलता है।

महाकवि भास

प्रस्तावना

कवि कुलगुरु कालिदास ने अपने प्रथम नाटक ‘मालविकाग्निमित्रम्’ में ‘प्रथितयशसां भास-कविपुत्र- सौमिल्लकादीनाम्….।’ कहकर प्रथितयश नाटककार के रूप में भास का उल्लेख किया है। उसके बाद ई.स. की लगभग चौदहवीं सदी तक संस्कृत साहित्य के अनेक ग्रंथों में भास तथा उनके द्वारा रचित ‘स्वप्नवासवदत्तम्’ का उल्लेख होता है। परन्तु किसी कारणवश उनकी यह संपूर्ण कृति प्रचलन से बाहर निकल गई थी।

परिणामस्वरुप लोगों का भास के रूपकों के नाम से तो परिचय था, परन्तु उनके ग्रंथों का परिचय संस्कृत जगत को न था। ई.स. 1912 से प्रो. टी. गणपतिशास्त्री को मलयालम लिपि में ताड़पत्र पर भास के (हस्तलिखित) रूपकों की पांडुलिपि मिली। उस पर से देवनागरी में संपादित करके उन्होंने उन ग्रंथों को भास नाटकचक्र नाम से प्रकाशित कराया, तब से लुप्त हो चुके … भास के ये तेरह रूपक संस्कृत जगत में पुनः प्रचलित हुए हैं।

भास अत्यंत प्राचीन नाटककार हैं। उनका जीवनकाल ई.स. पूर्व चौथी या तीसरी शताब्दी मानी जाती है। नाटकों के आंतरिक मूल्यांकन से लगता है कि वह विष्णुभक्त रहे होंगे, वेद, इतिहास, पुराणों तथा शासन के ज्ञाता रहे होंगे, प्रकृति के सूक्ष्म निरीक्षक तथा मानव स्वभाव के अध्येता रहे होंगे। भास की कृतियाँ नीचे दिए गए 13 रूपकों को भास की कृतियों के रूप में स्वीकृत किया गया है। इन सभी कृतियों को विषयवस्तु के आधार पर पाँच विभागों में वर्गीकृत किया गया है, जो निम्नानुसार हैं :

(क) महाभारत के कथानक पर आधारित रूपक

  • दूतवाक्यम्
  • दूत घटोत्कचम्
  • उरुभंगम्
  • पंचरात्रम्
  • कर्णभारम् और
  • मध्यमव्यायोग

(ख) रामायण के कथानक पर आधारित रूपक

  • प्रतिमा नाटकम् और
  • अभिषेक नाटकम्

(ग) उदयन कथा पर आधारित रूपक

  • प्रतिज्ञायौगन्धरायणम् तथा
  • स्वप्नवासवदत्तम्

(घ) लोककथा पर आधारित रूपक

  • अविमारक
  • चारुदत्तम्

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(च) कृष्णचरित पर आधारित रूपक

  • बालचरितम् अब, हम इन तेरह रचनाओं का संक्षिप्त परिचय प्राप्त करेंगे।

1. दूतवाक्यम्

यह महाभारत के कथानक पर आधारित एकांकी है। इसमें श्रीकृष्ण स्वयं पांडवों के दूत के रूप में कौरवों के पास जाते हैं। दूत की सलाह के वचनों-वाक्यों पर से इस नाटक को दूतवाक्यम् नाम मिला है।

पांडवों का दूत बनकर श्रीकृष्ण दुर्योधन के पास पहुँचते हैं। कंचुकी श्रीकृष्ण का पुरुषोत्तम नारायण के रूप में परिचय देता है। इससे कुपित होकर दुर्योधन सभी को सभा में खड़ा न होकर कृष्ण का अपमान करने की सलाह देता है। कृष्ण के आगमन के साथ ही सभी राजा खड़े हो जाते हैं। दुर्योधन थोड़ा व्यग्र हो उठता है। श्रीकृष्ण पांडवों के लिए पैतृक अधिकार के अनुसार भाग देने का प्रस्ताव रखते हैं। श्रीकृष्ण और दुर्योधन के बीच उग्र वाग्युद्ध होता है। दुर्योधन को दंडित करने के लिए श्रीकृष्ण विराट स्वरूप धारण करके सुदर्शनचक्र धारण करते हैं। अंत में श्रीकृष्ण सभा त्याग करते हैं।

इस एकांकी में राजनीति की चर्चा है। इस नाटक में दुर्योधन का एकपात्रीय स्वरूप ध्यानाकर्षक है। द्रौपदी वस्त्राहरण का चित्रपट प्रस्तुत करने का प्रयोग मौलिक है। आकाशभासित वाणी का प्रयोग नाट्यकला की विशिष्टता दर्शाता है। कवि ने शस्त्रों को रंगमंच पर संदेह उपस्थित करके सुंदर चित्रात्मक दृश्य निर्मित किया है।

2. दूतघटोत्कचम्

कवि कल्पना के अनुसार इस एकांकी में भीम तथा हिडिम्बा का पुत्र, श्रीकृष्ण का दूत बनकर उनका संदेश कौरवों को देता है। इसलिए इस नाटक का नाम ‘दूतघटोत्कचम्’ है।

एकांकी के आरंभ में सैनिक प्रवेश करके धृतराष्ट्र को बताता है कि कौरवों द्वारा अभिमन्यु की निर्दय हत्या हुई है। धृतराष्ट्र को आघात लगता है और वह इसके लिए निमित्त बने जयद्रथ के अंत की भविष्यवाणी करते हैं। जयद्रथ की पत्नी दुःशला विलाप करती है।

अभिमन्यु की मृत्यु से आनंदित हुए दुर्योधन, दुःशासन और शकुनि धृतराष्ट्र को प्रणाम करने जाते हैं किन्तु धृतराष्ट्र आशीर्वचन नहीं देते। दुर्योधन पिता से विवाद करता है। इतने में यही सुनाई पड़ा कि अर्जुन ने जयद्रथ के वध की प्रतिज्ञा की है। दुर्योधन उसके विरुद्ध जयद्रथ की रक्षा करने का निर्णय करता है।

श्रीकृष्ण की तरफ से दूत के रूप में आया घटोत्कच अपने पितामह को उनका संदेश देता है कि अर्जुन अपने एक पुत्र की मृत्यु से विलाप कर रहे हैं तो सौ पुत्रों की मृत्यु से उनकी (धृतराष्ट्र की) क्या दशा होगी ? साथ ही घटोत्कच कहता है कि कल सूर्य के आगमन के साथ ही अर्जुन काल बनकर उन पर टूट पड़ेगा।

यह एकांकी स्वयंकल्पित नवसृजन है। यहाँ महाभारत के अल्प परिचित घटोत्कच के पात्र को उभारा गया है। घटोत्कच की वीरता के सामने दुर्योधन के अहंकार और एक राजा के रूप में उसकी खुमारी का प्रभावपूर्ण निरूपण हुआ है। यहाँ वीररस का वर्णन ऐसा है जो भावुक को स्पर्श कर जाए।

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3. ऊरुभङ्गम्

इस एकांकी में भीम गदा युद्ध में दुर्योधन की जंघा जोड़ते हैं। कथा वस्तु के रूप में यह प्रसंग केन्द्रीय होने से कृति का नाम ‘ऊरुभंगम्’ रखा गया है। कथा का मुख्यपात्र दुर्योधन है। महाभारत के प्रसंग पर आधारित यह दुःखांत एकांकी है। महाभारत का युद्ध अठारह दिन चला था, जिसमें 99 कौरवों का नाश हुआ था। एकमात्र दुर्योधन जीवित बचा था। दुर्योधन और भीम के बीच गदायुद्ध आरंभ होता है।

श्रीकृष्ण भीम को दुर्योधन की जंघा पर प्रहार करने का संकेत करते है। उसके अनुसार भीम गदा से दुर्योधन की जंघा पर मरणांतक प्रहार करता है, जिससे भीम गदायुद्ध के नियमों का उल्लंघन करता है। दुर्योधन का ऊरु (जंघा) भंग होता है और वह नीचे गिरता है। अंध राजा धृतराष्ट्र रणभूमि पर पहुँचते हैं। वे सभी विलाप करते हैं। वीर दुर्योधन की मृत्यु के साथ एकांकी करुणांतिका में परिणामित होता है।

ऊरुभंग का मुख्य रस करुण है जो वीररस के निरूपण से अधिक प्रगाढ़ बना है। रंगमंच पर नायक की मृत्यु दिखलाई गई है। यहाँ भरत के नाट्यशास्त्र के नियम का उल्लंघन हुआ है। यह नाटक संस्कृत साहित्य में ‘करुणांतिका’ (Tragedy) का विरल उदाहरण है। परिवार से मिलने का यहाँ हृदय विदारक वर्णन है। इस एकांकी में दुर्योधन के पात्र का उदात्तीकरण किया है।

4. पञ्चरात्रम्

महाभारत पर आधारित इस नाटक में दुर्योधन द्वारा द्रोण को पाँच रात्रियों की मुद्दत दी जाती है। कि यदि वे इस अवधि में पांडवों के बारे में समाचार लाएँगे तो दुर्योधन राज्य में से पांडवों का हिस्सा उनको सौंप देगा। इसी कारण नाटक को ‘पंचरात्र’ नाम मिला है। नाटक के आरंभ में दुर्योधन द्वारा किए गए भव्य यज्ञ की प्रशंसा है। द्रोण दक्षिणा के रूप में राज्य का आधा हिस्सा पांडवों को देने के लिए कहते हैं और दुर्योधन पाँच रात्रियों में पांडवों का समाचार लाने की शर्त के साथ उस बात को स्वीकार करता है।

पाँच रात में पांडवों की जानकारी मिलती है। दुर्योधन आधा राज्य पांडवों को देने की द्रोण की आज्ञा को स्वीकार करता है। यह बात मूल महाभारत की कथावस्तु में नहीं है। यहाँ नाटककार ने मूल कथावस्तु से विपरीत निरूपण किया है।

नाट्यकार ने अपनी कल्पना से नवीन प्रसंगों की उद्भावना करके प्रभावशाली कृति का सर्जन किया है। इस नाटक में भी दुर्योधन के पात्र का उदात्तीकरण किया गया है। मूल महाभारत में युद्ध के बिना सूई की नोक के बराबर भी जमीन नहीं देने की बात कहनेवाला दुर्योधन यहाँ गुरु की आज्ञा से आधा राज्य दे देता है। भास की यह रूपक रचना अत्यंत सुंदर है।

5. कर्णभारम्

यह एकांकी महाभारत के कथानक पर आधारित है। कर्ण को केन्द्र में रखकर उसकी दान वीरता को उभारनेवाली यह सुंदर एकांकी है। कर्णभार शीर्षक का भिन्न-भिन्न प्रकार से अर्थघटन किया जा सकता है। कुछ लोगों के मतानुसार कर्ण का कवच-कुंडल उसका भार बनते हैं, तो कुछ लोग कर्ण को सौंपी गई सेनापति की जवाबदारी को उसका भार मानते हैं।

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कृति के आरंभ में शल्यराज के साथ रथ में बैठकर कर्ण जब युद्धभूमि में प्रवेश करता है उस समय उसका मन निराशा से भरा हुआ है। स्वयं ब्राह्मण न होने पर भी ‘ब्राह्मण हूँ’ – कहकर उसने परशुराम से विद्या सीखी थी। उनके शाप के कारण उसकी शस्त्र विद्या निष्फल जानेवाली है इसका उसे स्मरण होता है। इतने में ब्राह्मण के वेश में इन्द्र आते हैं और बड़े दान की माँग करते हैं। कर्ण उन्हें गाय, घोड़ा, हाथी, सोना जैसे अनेक प्रकार के दान देने को तैयार होता है किन्तु ब्राह्मण के वेश में आए इंद्र उन्हें लेने से मना करते हैं। अंत में कर्ण अपने शरीर के साथ जुड़े कवच-कुंडल देने की बात करता है।

ब्राह्मण तुरंत स्वीकार कर लेता है। शल्य कर्ण को रोकता है। कर्ण भी यह समझता है कि यह इन्द्र की चाल है। फिर भी वह कवच-कुंडल का दान कर देता है। पश्चाताप दग्ध इन्द्र देवदूत द्वारा विमला नामक शक्ति भेजता है। इस शक्ति द्वारा पांडवों में से किसी एक पुरुष का वध कर्ण कर सकता है। इतना सब घटित होने के बाद भी कर्ण हार नहीं मानता और युद्ध के लिए तैयार होता है। नाटक में कर्ण के पात्र का खूब सुंदर आलेखन हुआ है। वह केवल शल्य की ही नहीं बल्कि हम सबकी सहानुभूति का अधिकारी बनता है।।

6. मध्यमव्यायोगः

महाभारत के कथानक पर आश्रित यह व्यायोग प्रकार की एकांकी है। भीम पांडवों में मध्यम है। यहाँ उनका हिडिम्बा के साथ संयोग होने से ‘मध्यम व्यायोग’ शीर्षक उचित है। अथवा भीम और ब्राह्मण के मझले पुत्र – ऐसे दो मझलों का मिलाप होने से यह शीर्षक दिया गया है।

नाटक के मुख्य दृश्य में घटोत्कच के त्रास से भयभीत हुए ब्राह्मण का वर्णन है। घटोत्कच थोड़ी द्विधा में है, एक और माता के भोजन के लिए एक व्यक्ति को ले जाने की माता की आज्ञा है और दूसरी तरफ ब्राह्मणों के प्रति उसका आदरभाव। अंत में माता की आज्ञा का पालन करने का निश्चय करता है। वह ब्राह्मण कुटुंब में से किसी एक को अपने साथ आने के लिए कहता है। चर्चा के बाद मध्यम पुत्र को भेजने का निश्चय होता है।

पानी पीने गए मझले ब्राह्मण को घटोत्कच जोर से पुकारता है। उसे सुनकर भीमसेन स्वयं मध्यम के रूप में उपस्थित होते हैं। कुटुंब को बचाने के लिए ब्राह्मण भीमसेन से विनती करता है। भीम घटोत्कच को अपने पुत्र के रूप में पहचानते हैं और बल प्रयोग द्वारा अपने को ले जाने के लिए उससे कहते हैं। बल तथा मायावी शक्ति के प्रयोग निष्फल होते हैं। अंत में भीमसेन स्वयं घटोत्कच की माता के पास जाते हैं। हिडिम्बा भीमसेन को पहचान लेती है। इस तरह, हिडिम्बाभीमसेन का मिलन होता है। ब्राह्मण परिवार खुशी से वहाँ से प्रस्थान करता है।

भीम और हिडिम्बा के मिलन की बात महाभारत में नहीं है। भास ने अपनी कवि प्रतिभा से इस मौलिक रूपक का सृजन किया है। यहाँ घटोत्कच के पात्र के माध्यम से मातृभक्ति की महिमा की गई है और राक्षसी होने पर भी हिडिम्बा में मानवीय गुणों का आलेखन किया है।

7. प्रतिमानाटकम्

यह रामायण की कथा पर आधारित सात अंकों का नायक है। ननिहाल से वापस आकर भरत नगर के बाहर प्रतिमागृह में स्वर्गीय पूर्वजों के साथ महाराज दशरथ की प्रतिमा देखते हैं, तब पिता के मरने का पता चलता है। इसी कारण नाटक का नाम ‘प्रतिमानाटक’ रखा गया है।

इस नाटक में राम के वनगमन से लेकर उनके राज्यभिषेक तक की घटनाओं का निरूपण है। राज्याभिषेक के बदले सीतालक्ष्मण के साथ राम वनगमन की तैयारी करते हैं और दशरथ की मृत्यु होती है। दशरथ अस्वस्थ है – ऐसा समाचार देकर भरत को ननिहाल से वापस बुलाया गया है। नगर के बाहर प्रतिमागृह में पूर्वजों के साथ पिता की प्रतिमा देखकर चिंतातुर भरत पिता की मृत्यु के लिए कारणभूत माता कैकेयी से मिलना टाल देते हैं। राम को उनकी गद्दी वापस सौंपने के लिए भरत वन में जाते हैं और राम – भरत का मिलन होता है। भरत राम की आज्ञा मानकर उनकी पादुका लेकर अयोध्या लौट आते हैं।

GSEB Class 11 Sanskrit व्याकरण संस्कृत साहित्य का परिचय

वन में रह रहे राम पिता के श्राद्ध के बारे में चिंतित हैं। ब्राह्मण वेशधारी रावण राम को यह समझाता है कि कांचनपार्श्वमृग से उत्तम श्राद्ध होता है। इतने में ही वहाँ उपस्थित हुए कांचन पार्श्वमृग को लेने हेतु राम उसका पीछा करते हैं। लक्ष्मण कुलपति को लेने के लिए बाहर गए हुए हैं, इससे अकेली पड़ गई सीता का रावण अपहरण करता है। अयोध्या में भरत को सीता के अपहरण का पता चलता है। इन सबके लिए कैकेयी को दोषित माननेवाले भरत से कैकेयी श्रवण के माता-पिता द्वारा दिए गए शाप की बात करती है। तदनुसार पुत्र वियोग से दशरथ की मृत्यु निश्चित ही थी। भरत तो दूर ही था।

राम के वियोग, राम की मृत्यु या लम्बे समय के लिए दूर जाने से भी हो, इसलिए दशरथ से राम के वनगमन की माँग की। घबराहट में चौदह दिन के बदले चौदह वर्ष बोला गया। कैकेयी के इस स्पष्टता से भरत उसे क्षमा कर देते हैं। दो तपस्वियों के संवाद द्वारा रावण-वध, विभीषण को लंका का राज्य देने, सीता की अग्नि परीक्षा आदि घटनाओं का निर्देश होता है। राम के राज्याभिषेक के साथ यह नाटक समाप्त होता है।

इस नाटक में प्रतिमागृह का प्रसंग भास की मौलिक कल्पना है। यहाँ कैकेयी के पात्र का उदात्तीकरण किया गया है। कैकेयी द्वारा वचन माँगे जाने के पीछे का रहस्य – यह भास की अपनी कल्पना है।

8. अभिषेकनाटकम्

रामायण पर आधारित इस नाटक में कुल छ: अंक हैं। यहाँ सुग्रीव, विभीषण और राम – इन तीन व्यक्तियों के राज्याभिषेक की बात होने से ‘अभिषेक नाटकम्’ शीर्षक दिया गया है।

नाटक की कथावस्तु के अनुसार सुग्रीव और राम परस्पर सहायता के लिए संधि करते हैं। सुग्रीव बाली को युद्ध के लिए ललकारता है। दरम्यान राम के बाण से बाली की मृत्यु होती है, सुग्रीव का राज्याभिषेक होता है।

सीता को खोजने के लिए हनुमान लंका की ओर प्रयाण करते हैं। वहाँ लंका के उपवन में रावण की बातों के आधार पर सीता को पहचान लेते हैं। सीता का रावण द्वारा अपमान होते देख हनुमान गुस्सा होते हैं। वह सीता से मिलते हैं और राम की अवस्था का निवेदन करते हैं। सीता भी अपनी अवस्था राम को बताने के लिए उनसे कहती हैं। राम तथा वानर लंका की ओर प्रयाण करते हैं। समुद्र विभाजित होकर उन्हें मार्ग देता है। युद्ध में इंद्रजीत सहित अनेक राक्षसों के विनाश के बाद अंत में रावण स्वयं युद्ध के लिए प्रयाण करता है। राम-रावण में भयंकर युद्ध होता है। राम रावण का वध करते हैं और विभीषण को राज्य सौंपते हैं।

रावण के वध के बाद सीता की अग्निशुद्धि और अंत में राज्यभिषेक होता है।

9. प्रतिज्ञायौगन्धरायणम्

उदयनकथा पर आधारित इस चार अंकी नाटक में वत्सराज उदयन का मंत्री यौगन्धरायण, उदयन को उज्जयिनी के कारागार से छुड़ाने की दो बार प्रतिज्ञा करता है।

उज्जयिनी का राजा प्रद्योत महासेन अपनी पुत्री वासवदत्ता का विवाह उदयन से करना चाहता था इसलिए उसे किसी भी तरह से पकड़कर नगर में लाना चाहता था। इसी बीच राजा उदयन का संदेश लेकर आया। उसका निजी सेवक बतलाता है कि उदयन हाथी के षडयंत्र में फँस गया है और उसे राजबंदी बनाया गया है। यौगन्धरायण प्रद्योत के छल का बदला लेने की प्रतिज्ञा करता है। – उदयन के पास से ले ली गई घोषवती वीणा वासवदत्ता को भेंट दी गई है। उदयन को छुड़ाने के बहाने जब उदयन को मुक्त किया जाएगा तब उसे भगा ले जाने की योजना यौगंधरायण ने बनाई थी।

राजा के साथ वासवदत्ता को भी ले जाने की योजना उसने सोच रखी थी। उदयन के भद्रवती हाथी पर भाग जाने का समाचार चारों ओर फैल जाता है। यौगंधरायण उदयन के पीछे पड़ी प्रद्योत की सेना को रोकता है। अंत में वह पकड़ा जाता है। प्रद्योत महासेन और अंगारवती उदयन तथा वासवदत्ता को गांधर्व विवाह की अनुमति देते हैं।

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10. स्वप्नवासवदत्तम्

इस’ नाटक के पाँचवे अंक में राजा उदयन को वासवदत्ता का स्वप्न आता है। इस दृश्य के आधार पर नाटक का शीर्षक ‘स्वप्नवासवदत्तम्’ रखा गया है।।

इस नाटक को भास की सर्वोत्तम कृति मानते हुए विद्वानों ने इस पर प्रशंसा के पुष्प बरसाये हैं।

वेशपरिवर्तन करके वासवदत्ता और यौगंधरायण तपोवन में से गुजर रहे थे तभी वहाँ पद्मावती आ जाती है। तपस्वी के वेश में रहा यौगंधरायण, वासवदत्ता का परिचय अपनी अवन्तिका नामक बहन के रूप में करवाकर उसे पद्मावती के पास अपनी अमानत के रूप में रखने की इच्छा व्यक्त करता है। पद्मावती उसे स्वीकार करती है। तपोवन में एक ब्रह्मचारी लावण्यक दहन के प्रसंग का वर्णन करता है।

वासवदत्ता के महल में जल जाने की बात से राजा दुःखी होता है। पद्मावती के विवाह की बात छिड़ती है और उदयन के साथ विवाह निश्चित होता है। पद्मावती के विवाह की माला गूंथने का काम भी वासवदत्ता के सिर आता है। चौथे अंक में राजा और विदूषक के बीच की बातचीत में वासवदत्ता के प्रति राजा का प्रेम व्यक्त होता है। छिपकर बातें सुन रही वासवदत्ता को अत्यंत आनंद होता है।

पाँच अंक में उदयन को वासवदत्ता का स्वप्न आता है, जिसमें उदयन वासवदत्ता को मनाने का प्रयत्न कर रहा है। उसी दरम्यान पलंग पर से नीचे लटक रहे राजा के हाथ को वासवदत्ता धीरे से पलंग पर रखकर चली जाती है.। उसके स्पर्श से राजा जाग जाता है, वासवदत्ता को पकड़ने दौड़ता है, पर उसका पुरुषार्थ व्यर्थ जाता है। राजा विदूषक के सम्मुख वासवदत्ता के जीवित होने की शंका व्यक्त करता है, परन्तु वह उसे मानने को तैयार नहीं है।

घोषवती वीणा का प्रसंग पुनः वासवदत्ता की याद को ताजा करता है। कंचुकी चित्रफलक लाती है, जिसमें वासवदत्ता है। उसे देखकर पद्मावती सुखद आश्चर्य अनुभव करती है। वह अंत:पुर में ऐसे ही चेहरेवाली एक स्त्री के होने की बात कहती है। वासवदत्ता राजदरबार में उपस्थित होती है।

यौगंधरायण पद्मावती से अपनी अमानत वापस माँगता है। अंत में यौगंधरायण अपना असली रूप प्रकट करके राजा को पूरी योजना समझाता है। वासवदत्ता का भी मूल स्वरूप प्रकट होता है और इस तरह नाटक सुखांत बन जाता है।

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11. अविमारकम्

लोककथा पर आधारित इस नाटक में विष्णुसेन और कुरंगी की प्रणय कथा है।।

इस नाटक में भेड़ (अवि) का रूप धारण करनेवाले एक राक्षस को विष्णुसेन नामक सौवीर राजकुमार मार डालता है। इस पर से नाटक का शीर्षक ‘अविमारकम्’ रखा गया है।

उद्यानविहार करते समय राजा कुन्तीभोज की पुत्री कुरंगी को एक युवक अंजनगिरि नामक हाथी के आक्रमण से बचाता है। ऐसे संयोगों में दोनों परस्पर आकर्षित होते हैं। इस परिणाम का समाचार राजा के पास पहुँचता है। वह अपनी वयस्क हो गई कन्या से विवाह के विषय में विचार करने लगता है। इस बीच अपनी धात्री की मदद से कुरंगी और युवक मिलते रहते हैं।

अविमारक तथा कुरंगी के बीच बढ़ रहा प्रेम राजा के ध्यान में आता है। पकड़े जाने के भय से अविमारक भाग जाता है और आत्महत्या करने का प्रयास करता है। तभी विद्याधर नामक व्यक्ति की मदद से चमत्कारी अँगूठी प्राप्त करके उसके प्रभाव से अंत:पुर में प्रवेश करने के लिए विश्वास प्राप्त करता है। वियोग से पीड़ित कुरंगी फाँसी का फंदा लगाकर अपना जीवन समाप्त कर देने का प्रयत्न कर रही है। उसी समय वहाँ अविमारक प्रकट होता है और कुरंगी को बचा लेता है। अंत में दोनों का मिलन होता है।

12. चारुदत्तम्

चार अंकोंवाला यह रूपक लोककथा पर आधारित है। इसमें वणिक चारुदत्त तथा गणिका वसंतसेना के प्रणय की कथा है। नायक के नाम पर से इस नाटक का शीर्षक चारुदत्त रखा गया है।

नाटक का मुख्य रस शृंगार है। नायक जन्म से ब्राह्मण किन्तु कर्म से वणिक है। पर धन का दान करते करते अब निर्धन हो गया है। नायिका वसंतसेना उज्जयिनी की प्रख्यात गणिका है। वह चारुदत्त को धन के कारण नहीं बल्कि उसके गुणों के कारण प्रेम करती है। यहाँ दरिद्रता के चित्रण में करुण रस की योजना की गई है। लोकरंजन में यह नाटक हर तरह से सफल हुआ है।

इसमें विदूषक के हास्यप्रेरक संवाद प्रेक्षकों को आनंद देते हैं, साथ ही कथानक को आगे बढ़ने में भी मदद करते हैं। संवाद मार्मिक हैं। इस नाटक की एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यहाँ नायिका स्वयं अपने प्रेम का एकरार करती है और नायक का प्रेम पाने के लिए वह स्वयं अग्रसर होती है।

13. बालचरितम्

हरिवंश तथा अन्य पुराणों में वर्णित श्रीकृष्ण लीला को आधार बनाकर इस नाटक की कथावस्तु रची गई है। यहाँ श्रीकृष्ण के जन्म से लेकर मथुरा में उनके द्वारा लिए गए कंस वध तक की कथा गूंथ ली गई है।

यहाँ नंद की पुत्री को मृत बताया गया है और कथानक को नाट्यात्मक मोड़ दिया गया है। नन्द तथा वासुदेव के संवाद भी कवि की अपनी निजी कल्पना के अंश हैं। कृष्ण को वसुदेव का सातवाँ पुत्र कहा गया है।

इस नाटक में वीररस प्रधान है। दूतवाक्यम् की तरह निर्जीव शस्त्र यहाँ भी रंगमंच पर आते हैं। इस नाटक में कुल मिलाकर 26 पुरुष तथा 10 से अधिक स्त्री पात्र हैं। यहाँ कृष्ण नायक तथा बलराम उपनायक हैं और कंस खलनायक के रूप में है। (प्रतिष्ठितम् इदानीं वृष्णिराज्यम्।) (अब वृष्णिराज्य प्रतिष्ठित बना है।) जैसे संवाद के साथ नाटक की पूर्णाहूति की गई है।

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महाकवि कालिदास

पुरा कवीनां गणनाप्रसङ्गे कनिष्ठिकाधिष्ठितकालिदासा।
अद्यापि तत्तुल्यकवेरभावात् अनामिका सार्थवती बभूव।।

अर्थात् प्राचीनकाल में कवियों की गणना करने के प्रसंग में कालिदास का नाम कनिष्ठा (हाथ की पाँचों उँगलियों में सबसे छोटी) पर रखा गया। उसके बाद आज तक कवि के जैसा अन्य कोई कवि न मिलने से अनामिका (दूसरे क्रम पर आई उँगली) का नाम (अ-नामिका अर्थात् बिना नाम की) सार्थक हुआ है।

अनेक काव्यरसिकों ने इस तरह जिसकी प्रशंसा की है वह महाकवि कालिदास संस्कृत साहित्य में ‘कविकुलगुरु’ के रूप में प्रसिद्ध हैं। उनकी कुल सात कृतियाँ हैं। जिनमें –

(क) दो खंडकाव्य या गीतिकाव्य :

  • ऋतुसंहारम्,
  • मेघदूतम्। तत्पश्चात्

(ख) दो महाकाव्य :

  • रघुवंशम् और
  • कुमारसंभवम्। तथा

(ग) तीन नाटक :

  • मालविकाग्निमित्रम्,
  • विक्रमोवीयम् और
  • अभिज्ञानशाकुन्तलम्।

(कक्षा 11 में इनमें से कालिदास की केवल नाट्यकृतियों का ही परिचय करवाना है। इसलिए उपर्युक्त तीन नाटकों का ही परिचय करवाया जा रहा है।)

कालिदास के नाटक

1. मालविकाग्निमित्रम्

महाकवि कालिदास का यह प्रथम नाटक है। इसकी मुख्य कथावस्तु अंत:पुर की दासी मालविका और शुंगवंश के राजा अग्निमित्र का प्रणय है।

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मालविका तथा अग्निमित्र का विवाह हो जाता है; परंतु युद्ध में मालविका के भाई के पराजित हो जाने से उसे भागना पड़ता है। उसके बाद वह अन्य वेश में अग्निमित्र की रानी धारिणी की दासी बनकर अंत:पुर में प्रवेश करती है। उतार-चढ़ाव के अनेक प्रसंगों के पश्चात् विदूषक दोनों प्रेमियों का मिलन कराने में सफल होता है। धारिणी मालविका को अपनी सखी के साथ कैद करती है।

सर्पदंश का बहाना बनाकर विदूषक मालविका और अग्निमित्र का पुनः मिलन करवाने में सफल होता है। नाटक के अंत में युद्ध में अग्निमित्र की विजय यवनों के विरुद्ध उसके पुत्र की विजय राजकन्या के रूप में मालविका की पहचान इत्यादि घटनाएँ आलेखित हैं। रानी धारिणी खुद अग्निमित्र और मालविका के विवाह की अनुकूलता कर देती है।

यहाँ मालविका और अग्निमित्र की प्रणयकथा विशिष्ट शैली में प्रस्तुत की गई है। कवि ने नाटक को अभिनव प्रसंगों, चुटीले संवादों तथा विनोद से सुशोभित किया है। प्रस्तुत नाटक में नृत्य, संगीत, अभिनय के उपरांत मनोरंजनकता का प्राचुर्य होने से दर्शकों को बाँधे रखने में सक्षम है। अलबत्त, प्रथम कृति होने के कारण कालिदास की परवर्ती कृतियों जैसी प्रौढ़ता और गंभीरता न हो, यह स्वाभाविक है।

2. विक्रमोर्वशीयम्

कालिदास का दूसरा नाटक विक्रमोर्वशीयम् है। उसमें राजा पुरुरवा नायक है तथा अप्सरा उर्वशी नायिका। पाँच अंकवाले इस नाटक में मिलन, वियोग तथा पुनर्मिलन का कथानक [था गया है।

दानव केशी द्वारा अपहृता उर्वशी और उसकी सखी चित्रलेखा को पराक्रमी पुरुरवा बचाकर वापस लाता है। पुरुरवा और उर्वशी परस्पर आकर्षित होते हैं। स्वर्ग में लौटी उर्वशी एक बार नाटक में लक्ष्मी का पात्र अभिनीत कर रही थी तब नाटक में ‘पुरुषोत्तम’ शब्द के बदले ‘पुरुरवा’ बोल जाती है। इससे क्रोधित भरत मुनि के शाप के कारण उर्वशी को पृथ्वी पर आना पड़ता है और पृथ्वी पर पुरुरवा-उर्वशी का मिलन होता है।

पुरुरवा की पत्नी महारानी औशीनरी दोनों के प्रेम को सहमति देती है और उनका विवाह संभव होता है। एक बार जब पुरुरवा और उर्वशी कुमारवन में विहार कर रहे थे उस समय गुस्से में उर्वशी पुरुरवा से रूठकर चली गई और लता में रूपांतरित हो गई। उर्वशी के वियोग में राजा उन्मत्त होकर उसकी खोज करते हैं। और अंत में संगमनीय मणि के प्रताप से वह उर्वशी को फिर से प्राप्त करते हैं।

उर्वशी पुरुरवा से प्राप्त आयु नामक पराक्रमी पुत्र की माता बनती है। अपने पति पुरुरवा के साथ आजीवन पृथ्वी पर रहने के लिए उसे इंद्र की कृपा प्राप्त होती है। अंत में उसके पुत्र आयु का युवराज के पद पर अभिषेक होता है।

महाकवि कालिदास का यह नाटक पौराणिक कथा पर आधारित है जिसमें संयोग तथा विप्रलंभ शृंगार का मार्मिक निरूपण है। चौथे अंक में कवि का प्रकृति – प्रेम सोलहों कलाओं के साथ खिल उठा है। यहाँ प्रकृति में मानवीय भावों का सुंदर चित्रण हुआ है। ऐसा कहा जाता है कि स्वर्ग और धरती के बीच झूलता यह नाटक मूल में त्रिअंकी रहा होगा, बाद में पुनर्मिलन कराने के लिए चौथा अंक जोड़ा गया होगा। और फिर किसी राजकुमार के पट्टाभिषेक के प्रसंग पर कवि ने पाँचवाँ अंक मिलाया होगा।

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3. अभिज्ञानशाकुन्तलम्

सात अंक में इस नाटक में दुष्यंत और शकुंतला का प्रणय निरुपित हुआ है। शिकार के लिए निकला दुष्यंत कण्व मुनि के आश्रम में पहुँचता है, जहाँ वह बालतरुओं को जलसिंचन करती आश्रम-कन्याओं को देखता है। दुष्यंत का आर्यमन कण्व कन्या शकुंतला की ओर आकर्षित होता है और वह उसकी स्पृहा करने लगता है। ऋषि कण्व की अनुपस्थिति में आश्रम के अतिथि सत्कार की जवाबदारी शकुंतला को सौंपी गई थी।

यज्ञ के रक्षार्थ दुष्यंत को आश्रम में रुकने का प्रसंग उपस्थित होता है। और दुष्यंत तथा शकुंतला के बीच प्रणय के विकास की भूमिका बनती है। उसके बाद दोनों प्रेमी गांधर्व विवाह करते हैं। जब दुष्यंत अपनी राजधानी में लौटता है तब दुष्यंत में एकाग्रचित बनी शकुंतला को दुर्वासा मुनि के शाप का भाजन बनना पड़ता है। शाप के परिणामस्वरूप दुष्यंत को शकुंतला का विस्मरण हो जाता है।

कण्व मुनि को दुष्यंत और शकुंतला के गांधर्व विवाह की जानकारी दिव्यवाणी द्वारा होने पर वह पुत्री को पति के घर भेजते हैं। शापग्रस्त शकुंतला को भूल गए होने के कारण दुष्यंत उसे पहचान ही नहीं सका और उसे अस्वीकार करता है। शकुंतला को उसकी माता मेनका मरीचि मुनि के आश्रम में ले आती है। शकुंतला की उँगली पर से सरक गई अँगूठी मछुआरे को मिली और रक्षकों द्वारा दुष्यंत के पास पहुंचाई जाती है।

अँगूठी देखते ही दुष्यंत को शकुंतला का स्मरण हो आता है और शकुंतला को अस्वीकार करने के लिए वह पश्चाताप अनुभव करता है। एक बार देवों को सहायता करके लौट रहा दुष्यंत मरीचि मुनि के आश्रम में पहुँचता है। यहाँ सिंहशावक के साथ खेल रहे, उसके दाँत गिन रहे बालक सर्वदमन से उसकी भेंट होती है। दुष्यंत को पता चलता है कि वह बालक सर्वदमन शकुंतला का पुत्र है। तत्पश्चात् दुष्यंत, शकुंतला और पुत्र सर्वदमन (भरत) का मिलन होता है। अंत में मुनि का आशीर्वाद प्राप्त करके दुष्यंत पत्नी शकुंतला और सुपुत्र भरत के साथ राजधानी लौट आता है।

संस्कृत साहित्य के इस लालित्य पूर्ण शीर्षस्थ नाटक की रचना की प्रेरणा महाभारत के शुष्क माने जाते संभवपर्व से मिली है। पर कालिदास के कवि ने उस ढाँचे पर जीवंत सुडौल और मनोहर रचना का सृजन किया है। इसीलिए कहा गया है कि ‘काव्येषु, नाटकं रम्यं तत्र रम्या शकुन्तला।’ अर्थात् ‘साहित्य में नाटक रम्य हैं और नाटकों में शकुंतला रम्य है।’ इस तरह जिस नाटक का गुणगान किया जाता है उसने केवल भारत ही नहीं अपितु समग्र विश्व के नाटकों में प्रथम पंक्ति में स्थान प्राप्त किया है। जर्मन महाकवि गेटे तो उसे पढ़कर इतना अधिक खुश हो गया था कि शाकुंतल पुस्तक को सिर पर रखकर नाच उठा था !

इस नाटक के चौथे अंक में कन्या विदाई का निरूपण हुआ है। शकुंतला की विदाई के प्रसंग पर समग्र तपोवन, कण्व मुनि, गौतमी, शकुंतला की सखियाँ, पशु-पक्षी, वृक्ष-लताएँ भी भावविभोर हो उठी हैं। प्रसंगों का गुंफन, महाभारत की मूल कथा का नवीनीकरण, वस्तुसंरचना और उत्तम पात्र-निरूपण आदि विशेषताओं के कारण यह नाटक साद्यंत प्रेक्षणीय बना है।

पंचतंत्र

संस्कृत साहित्य की अनेक विशिष्टताओं में से एक विशेषता है – प्राणियों की कथा या नीति कथाएँ। ये कहानियाँ अत्यंत प्राचीन काल से रची तथा सुनाई जाती रही है। इनके मूल वेदों तथा उपनिषदों में मिलते हैं। उसी परंपरा में प्राणी-कथाओं का भी समावेश होता है। पशु-पक्षियों के स्वभाव और उनकी खासियतों – कमियों के आधार पर इन कथाओं की रचना की जाती है। उनमें मानव के दैनिक जीवन में उपयोगी हो सकें, ऐसे उपदेश भी दिए गए हैं। पंचतंत्र तथा हितोपदेश इन कथाओं के मुख्य संग्रह हैं।

पंचतंत्र के रचयिता पंडित विष्णु शर्मा हैं। ग्रंथ के आरंभ में उसकी रचना की पृष्ठभूमि इस प्रकार दी गई है : दक्षिण भारत के महिलारोप्य नामक नगर में अमरशक्ति नामक राजा था। उसके तीन मूर्ख पुत्र थे। राजा को इन तीनों पुत्रों को राजनीति में पारंगत बनाने की चिंता लगी रहती थी। उन्हें शिक्षित करने के लिए उसने अनेक प्रयत्न किए परन्तु उसे सफलता न मिली। राजा ने अपने पुत्रों को राजनीति-कुशल बनाने के लिए विद्वानों के समक्ष निवेदन किया तब विष्णुशर्मा ने यह काम स्वीकार किया। ‘छः महीने में आपके पुत्रों को राजनीति में पारंगत बना दूँगा।’ ऐसी प्रतिज्ञा के साथ विष्णुशर्मा ने उन बालकों को शिक्षा देना आरंभ किया। विष्णु शर्मा ने उन राजकुमारों को अनेक नीतिपूर्ण रोचक कहानियाँ सुनाई, जो पंचतंत्र के नाम से प्रसिद्ध हुईं।

‘पंचतंत्र’ शीर्षक से पता चलता है कि इस ग्रंथ में पाँच तंत्र हैं। तंत्र यानी विभाग।

GSEB Class 11 Sanskrit व्याकरण संस्कृत साहित्य का परिचय

पंचतंत्र पाँच विभागों में विभक्त हैं :

  1. मित्रभेद,
  2. मित्र प्राप्ति,
  3. संधि-विग्रह,
  4. लब्धप्रणाश और
  5. अपरीक्षित कारक

1. मित्रभेद :

इस विभाग में मित्रों में फूट डालकर अपना स्वार्थ सिद्ध करनेवाले तत्त्वों से सदैव सतर्क रहने के उपदेश दिए गए हैं। इनमें मुख्य कथा वृषभ और सिंह की है। वन में रहनेवाले दो सियार उन दोनों का परिचय करवाते हैं। सिंह और वृषभ के बीच प्रगाढ़ मित्रता हो जाती है। दोनों सियारों में से एक सियार इस मित्रता से ईर्ष्या करता है और दोनों घनिष्ठ मित्रों – सिंह और वृषभ को अनेक युक्ति-प्रयुक्ति से आपस में लड़ाकर मारता है। अंत में वृषभ मारा जाता है और सियार सिंह के समक्ष उच्च स्थान प्राप्त करता है।

2. मित्र प्राप्ति :

इस विभाग में अच्छे मित्र बनाने से होनेवाले लाभों से जुड़ी कहानियाँ दी गई हैं। यहाँ कछुआ-हरिण, चूहा और कौआ – इन चार प्राणियों की मित्रता और उनके पराक्रम की बातें हैं। विचारपूर्वक सज्जनों के साथ की गई मित्रता के कारण ये चारों अत्यंत बड़े संकटों से उबरते हैं और परस्पर सहायक बनते हैं।

3. संधि-विग्रह :

इस तंत्र में कौआ और उल्लू के बीच की लड़ाई की बात है। इस कारण इस तंत्र का एक अन्य नाम ‘काकोलूकीयम्’ भी है। पहले जो शत्रु रह चुका हो उसके साथ की गई मित्रता कितनी जोखिम भरी हो सकती है, वह इस तंत्र की कथा में दर्शाया गया है।

4. लब्धप्रणाश :

लब्ध यानी प्राप्त किया हुआ, प्रणाश यानी विनाश। जो प्राप्त किया है उसका विनाश इस तंत्र का मुख्य विषय है। यहाँ मुख्य कथा एक बंदर और मगर की है। खुशामद करके मूरों के पास की वस्तुओं को किस तरह ले ली जाती है, यह इस तंत्र की कथाओं में दर्शाया गया है।

5. अपरीक्षित कारक :

बिना विचार किए कोई काम करने से कैसा फल मिलता है, इससे जुड़ी हुई कहानियाँ इस तंत्र में है। यहाँ बिना विचारे काम करने से एक हज्जाम को हुए अनुभवों का वर्णन है। वस्तुस्थिति का पूर्णस्वरूप से विचार करने के बाद ही कोई काम करना चाहिए, ऐसा बोध इस तंत्र से मिलता है।

पंचतंत्र में छोटी-बड़ी कहानियाँ सादी, सरल और तुरंत समझ में आनेवाली भाषा में लिखी गई हैं। कहानियाँ संक्षिप्त होने पर भी प्रभावक हैं। एक कहानी में से दूसरी कहानी निकलती है। इन कहानियों में गद्य के साथ – साथ पद्य का एक विशिष्ट समन्वय दिखाई देता है। कहानी के पात्र अपने मंतव्य के समर्थन में सुंदर श्लोक प्रस्तुत करते जाते हैं। मनुष्य के स्वभाव में निहित दंभ और लोभवृत्ति, दरबारियों का खटपट करने का स्वभाव, स्त्रियों के स्वभाव की विशेषताएँ आदि के विषय में पुष्कल हास्य रस के साथ कठोर निंदा की गई है। अतिशयोक्ति किए बिना जीवन के विषय में अधिक गंभीर और सुखदायी विचार इस ग्रंथ में प्रकट होते दिखाई देते हैं।

GSEB Class 11 Sanskrit व्याकरण संस्कृत साहित्य का परिचय

पंचतंत्र विश्व साहित्य को भारत की बड़ी देन है। विश्व की लगभग सभी भाषाओं में पंचतंत्र के अनुवाद तथा भाषांतर हुए हैं। अनेक विशेषताओं के कारण पंचतंत्र एक बेजोड़ ग्रंथ है।

संस्कृत की शास्त्रीय रचनाएँ

संस्कृत भारत तथा समग्र विश्व की प्राचीनतम भाषा है। इस भाषा में भारतीय संस्कृति का स्रोत संरक्षित है। एक तरफ संस्कृत भाषा में उत्तम साहित्यिक तथा तत्त्वचिंतन करनेवाली रचनाएँ हुई, संरक्षित रहीं और समग्र विश्व में प्रख्यात बनी हैं तो दूसरी ओर कतिपय उत्तम शास्त्रीय कृतियाँ भी रची गई हैं। ज्ञान-विज्ञान की ढेर सारी शाखाओं में इस भाषा में जितने ग्रंथ लिखे गए हैं उतने संसार की किसी अन्य भाषा में नहीं लिखे गए।

इन सभी शास्त्रीय ग्रंथों के मूल वेद हैं। इन वेदों तथा उनके बाद रचित वैदिक साहित्य में अत्र-तत्र प्रयोगात्मक विज्ञान के कितने ही अंश मिलते हैं। तत्पश्चात् महाभारत काल तक तो खगोलशास्त्र, गणितशास्त्र, रसायनशास्त्र, चिकित्साशास्त्र, वास्तुशास्त्र, भूगर्भशास्त्र, मानवशास्त्र, अर्थशास्त्र, वाणिज्यशास्त्र इत्यादि अनेक शास्त्रीय विद्याओं पर विचार-विमर्श करनेवाले स्वतंत्र ग्रंथ अस्तित्व में आ चुके थे। वे व्यापक रूप से प्रसिद्ध भी थे।

वाराहमिहिर, आर्यभट्ट, भास्कराचार्य, चरक, माधव, सुश्रुत, कौटिल्य आदि शतश: विज्ञान-विषयों के विश्वविख्यात विद्वान थे। एक हजार वर्ष के संघर्ष तथा आपत्तिकाल में इनमें से बहुत कुछ लुप्त हो गया है, फिर भी आज भी जो शास्त्रीय धरोहर उपलब्ध है, वह भी अत्यंत मूल्यवान है और तत्कालीन वैज्ञानिकों की उपलब्धि की जानकारी प्रदान कर रही है।

यह बात सर्वस्वीकृत है कि अंकों का जन्म भारत में हुआ। शून्य की खोज भी भारत में हुई। इन अंकों में महत्त्वपूर्ण स्थान रखनेवाले अंकों से अंकगणित तथा उसी के बीजगणित, ज्यामिति, त्रिकोणमिति, केल्कुलस, वेक्टर तथा ऐसी अनेक गणित पद्धतियों का जन्म तथा विकास भी भारत में हुआ।

आज से लगभग तीन हजार वर्ष पूर्व शूल्ब सूत्रों की रचना हुई। कल्पशास्त्र के अंग माने जानेवाले इन ग्रंथों में अंकगणित, बीजगणित, रेखागणित के महत्त्वपूर्ण सिद्धांत भी दिखाई देते हैं। इन सूत्रों के रचयिता बौधायन, आपस्तम्ब कात्यायन, मानव, मैत्रायन, वराह तथा हिरण्यकेशी आदि आचार्य थे।

इस वैदिक काल से विकसित हो रहे गणित का उसके बाद आर्यभट्ट (प्रथम), भास्कराचार्य (प्रथम) ब्रह्मगुप्त, महावीर, आर्यभट्ट (द्वितीय), श्रीधराचार्य, श्रीपति, भास्कराचार्य (द्वितीय) तथा नारायण जैसे अन्य अनेक गणितज्ञों ने आगे विकास किया।

प्राचीनकाल में गणितशास्त्र सूत्रशैली में रचा गया बाद में विवरण सहित गद्य में रूपांतरित हुआ। आज आर्यभट्ट (प्रथम) का आर्यभट्टीयम् पुस्तक मिलती है। उससे पहले ब्राह्म, वसिष्ठ, पितामह आदि के पाँच सिद्धांत प्रचलित थे परन्तु परंपरा में उन्हें अपौरुषेय माना जाता है। परिणामस्वरूप, फिलहाल उपलब्ध पौरुषेय गणित ग्रंथों में आर्यभट्टीयम् सबसे प्राचीन है। इससे पुराना कोई अन्य ग्रंथ उपलब्ध नहीं है।

इस ग्रंथ में कुल चार प्रकरण हैं। कुल मिलाकर लगभग 120 श्लोक हैं। प्रथम दस श्लोक गीति छंद में हैं, इस कारण प्रथम विभाग को दशगीतिक कहा गया है। जब कि दूसरे विभाग में 108 श्लोक आर्या छंद में हैं, इसलिए उसे ‘आर्याष्टशत’ कहते हैं। एक श्लोक में मंगलाचरण तथा एक अन्य श्लोक में संख्या की परिभाषा दी गई है। इस तरह यह कुल 120 छंद का ग्रंथ है।

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ऐसा कहा जाता है कि गणितशास्त्री आर्यभट्ट ने 23 वर्ष की उम्र में यह ग्रंथ लिखा था।

आर्यभट्ट के इस ग्रंथ में, प्रारंभ में ज्योतिष विद्या के लिए उपयोगी गणितगान बनाए गए हैं। तत्पश्चात् तीन चरण हैं, जिनमें क्रमश: गणित, कालक्रिया और गोले का समावेश हुआ है। गणितपाद में शुद्ध गणित के अंकगणित, बीजगणित, भूमिति, त्रिकोणमिति जैसे विषय हैं, जब कि शेष ज्योतिषशास्त्र के विषय हैं।

गणितशास्त्र के दूसरे प्राचीन ग्रंथों में रचित ब्रह्मगुप्त रचित ब्रह्मस्फुट सिद्धांत नामक ग्रंथ है। ब्रह्मगुप्त भीनमाल के निवासी गूर्जर श्रीमाली ब्राह्मण थे।

तत्पश्चात् भास्कराचार्य (द्वितीय) का सिद्धांत शिरोमणि नामक ग्रंथ आता है। इस अति प्रसिद्ध ग्रंथ के चार भाग है : लीलावती, बीजगणित, गोलाध्याय और ग्रहगणित। लीलावती में पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत का निर्देश मिलता है।।

वेद का अंग माना जानेवाला ज्योतिषशास्त्र के प्रवाह के रूप में एक ओर गणित आदि शास्त्रों के ग्रंथ लिखे गए, तो दूसरी तरफ मानवजीवन के चार पुरुषार्थों में से एक ‘अर्थ’ का विमर्श करनेवाले अर्थशास्त्र के ग्रंथ में भी लिखे गए।

हालांकि आज जिस अर्थ में ‘अर्थशास्त्र’ शब्द का प्रयोग हो रहा है, वह अर्थ उस अर्थशास्त्र का नहीं है। संस्कृत का अर्थशास्त्र तो कृषि, पशुपालन, वाणिज्य, (यानि कि आज जिस अर्थ में अर्थशास्त्र प्रसिद्ध है।) आदि विषयों को समाहित करनेवाला शास्त्र है। साथ ही इसी शास्त्र में राजनीति विषय भी समाविष्ट होता है।

संस्कृत के अर्थशास्त्र का प्रसिद्ध और सीमाचिह्न रूप ग्रंथ है – आचार्य कौटिल्य का कौटिल्य – अर्थशास्त्र। आचार्य कौटिल्य के अन्य प्रसिद्ध नाम चाणक्य, विष्णुगुप्त आदि हैं। संस्कृत में उपलब्ध अर्थशास्त्र में यह सर्वोपरि सर्वप्रसिद्ध ग्रंथ है।

इस प्रसिद्ध ग्रंथ में पंद्रह अधिकरण हैं। ये सभी अधिकरण तीन भागों में बँटे हुए हैं। प्रथम भाग में दो अधिकरण है – विनयाधिकारिक और अध्यक्ष प्रचार। इस भाग में मुख्यतः राज्य के कर्ता-धर्ता अधिकारियों पर विचार किया गया है।

दूसरे भाग में तीसरे से सातवें तक कुल पाँच अधिकरण हैं। इन सभी राज्य के प्रशासन हेतु उपयोगी विषयों पर विचार किया गया है।

तीसरे भाग में बाकी के आठ अधिकरण हैं। इसमें राज्यस्तर तथा शत्रु-विनय के लिए युक्ति-प्रयुक्तियों पर विचार किया गया आचार्य कौटिल्य के इस अर्थशास्त्र के पहले मनु, बृहस्पति, शुक्र, इंद्र, विशालाक्ष, पराशर, नारद, भीष्म, उद्धव आदि आचार्यों के अर्थशास्त्र विषयक ग्रंथ रचे गए थे।

Sanskrit Literature

Introduction :

Sanskrit literature is divided into two sections

  • Vedic literature and
  • Cultured literature.

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Primary-works of vedic literature are Rigveda, Yajurveda, Samveda and Atharwveda – these four are vedas. They are also called ‘Samhitas’. Next to those are ‘Shatpath’ and ‘Brahmans’ composed for giving detailed explanation of those Samhitas. After that works like Aitarey, Aranyokas, Ishavsya were composed. These are all known as Upanishadas and then were composed six Vedangas – Shiksha, Kalp, Vyakaran, Nirukta, Chhanda and Jyotish to precerve Vedas. Lastly Sankhya yoga, Nyaya Vaisheshik and Purva mimams and Uttarmimamsa – the six branches of vedas are also included in Vedic literature.

Vedic literature, as we saw above begins with vedic samhitas. There are four samhitas of Veda. Those are Rigveda, Yajurvaveda, Samveda and Atharvaveda. According to the Indian tradition these Vedic samhitas are not the works of any human being. God himself revealed the Vedic Samhitas to the sages and seers who had become holy with penance. As God has no beginning and no end these Vedas, which are the source of knowledge of God are also endless and eternal i.e. immortal. Those who were blessed with the light of the vedas are called visionories of mantras i.e. mantradrashta or the visionarie of Vedas. Names of rishis and seers are attached to the respective ‘mantra’.

According to Indian tradition the period of manifestation of Vedas is the period of inception of the universe. Scholars, world over, are of the opinion that Rigveda is the most ancient book. This gives a testimony to the fact that Vedic literature is the most ancient literature.

Meaning of Veda :

The root form of the word veda is ‘Vid’ which has many meanings like – to know, to receive, to think and to be Considering, all the above meanings it seems the word veda has different meanings. e.g. by which everyone can know, can obtain, can think, and can become the truth-the God and become a scholar. And he is called ‘Veda’.

Synonyms of Veda :
Different names are given to Veda for different reasons e.g. Vedas are called Amnay or Agam as it is believed that the Veda is the original source of different scriptures – religious books. Veda is called ‘Shruti’, ‘Shrutis’ are considered to have been heard and transmitted by sages and are preserved by hearing.

They are called shrutis. In the beginning principally there were only three Vedas – Rigveda, Yajurveda and Samveda, so they are called ‘Tray’ or ‘Vedatra’. Thus, these Vedas are referred by different names on different occsions.

1. Rigveda :

Subject of Rigveda it is considered to be the first among four vedsamhitas. If is the oldest veda. The word ऋच् or ऋचा is the root word of ऋक्. The shloka which prays to God according to vedic tradition is called tech ऋच् or ऋचा Rigvedic mantras contain prayers for Gods like Agni, Indra, Varun, Parjanya.

Structure of Rigveda :

There are more than 10,000 ‘mantras’ in Rigveda and those are organised in ten books known as ‘mandalas’. There are many hymns in each mandal. The total number of (‘Suktas”) hymns in Rigveda is 1028 and the total number of verses in Rigveda is 10,552. In every ‘sukta’ there are more than one verse. There are ten branches say sections of Rigveda out of which only two are available – Shakal and Bashkal.

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Glory of Rigveda :

Out of 1028 suktas some philosophical suktas like Pururava sukta, Nasadiya Sukta, Hiranya-garbha sukta and social or family centred Suktas like Pururava. Urvashisamvad Sukta, Saramapani Samvad Sukta are of great value and have become very famous. Scholars believe that ‘Sanskrit drama’ developed on the basic of the above noted Samved suktas.

Some Suktis from Rigveda :

Scholars talk about one Truth – God in various ways Let that Truth-true knowledge protect me from all sides. Walk together, speak together and let the same thought spring into the minds of you all.

2. Yajurveda:

The subject of Yajurveda :

The root word of ‘yajur’ is यज् which has three meanings – worshiping god, transforming into music and alms/donation. So, mantras chanted for worshiping or sacrifice are called ‘yajus’. Thus Yajus that we find in this Veda are the mantras related to various kinds of ‘yagna’ sacrificial fire and sacrificied texts and procedure. So this ‘Samhita’ is called Yajurveda.

Structure of Yajurveda :

There are 1975 mantras in Yajurveda. These mantras are spread over 40 chapters. In every chapter the number of mantras varies. Some mantras are in prose and some are in poetry.

There are two special branches of Yajurveda –

  • Shukla Yajurveda and
  • Krishna Yajurveda.

Yagnvalkya worshiped the Sun God and the knowledge that he aquired from the sun by his blessings is called Shukla yajurveda. There are two branches of Shukla Yajurveda prevalent today :

  • Kanva and
  • Madhyandin.

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But there are four branches of Krishna Yajurveda prevalent today

  • Taiteriya
  • Maitrayani
  • Kathak and
  • Kapishthal Kath

Some Suktas from Yajurveda :

Let me attain truth remaining away from that which is not truth.
Let me look at all animals in a friendly way.

3. Samveda :

Theme of Samveda : The word ‘sam’ means singing-song. Thus, Samveda is the collection of recitable, chantable mantras say, chants. On the occasion of sacrifical rites उद्गाता Rutwij chanted the eulogies of Gods in the beginning. Lord krishna has glorified samveda in Bhagvadgeeta saying ‘I am Samveda among Vedas’.

Structure of Samveda :

There are totally 1975 mantras (verses) in Samveda. They are divided into two parts namely पूर्वचिक and उतरचीक. In ‘Purvarchik’ there are eulogies of Gods like ‘Agni’, ‘Indra’, ‘Soma’ and it consists 650 ‘Mantras’. There are 1225 ‘Mantras’- in ‘Uttararchik’ wherein there are chentable Mantras of vedic Anusthan of Gods like Dasharaj, Samvatsar Ekah.

We find references pointing out that there were innumerable branches of Samaveda. Today only three branches

  • ‘Kauthumiya’
  • Ranayaniya and
  • Jaiminiya are available.

Peculiarity of Samveda :

It is believed that science of music come came into existence from Sameveda Four types of songs namely, gramgan, Aranyagan, Udgan and Uhyagan are quite famous.

Atharvaveda :

Introduction:
The root word of Atharva is Tharva which means motion or gesture. So a situation that lacks motion or gesture is called ‘Atharva’. In this i.e. Atharvaveda, sermons suggesting steadiness, motionlessness or yoga restricting chittavritti – ‘Chitta’ means mind and ‘Vritti’ means waves which can affect mind thoughts some believe that ‘Atharva’ is the name of a Rishi.

A rishi named Atharva envisaged these mantras. This Veda is also called ‘Atharvangiras’. However, it did not have a position i.e. it was not included in ‘Vedtray’, but realising its importance and usefulness, it is glorified like other three vedas.

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Structure of Atharvaveda :

There are twenty (Kands) books/sections in Atharvaveda. In every kand there are different number of suktas. The total number of suktas is 736. In this Veda there are 6,000 mantras. There were nine (branches) sections of Atharvaveda, but today only two are available

  • Shaunik and
  • Pippalad.

Theme of Atharvaveda :

The Atharvaveda mainly includes remedies for recovering from illness, agriculture and husbandary, administration, spiritual knowledge, pride for mother-land, and mode and manner of sacrificial rites. There Suktas are like ‘Prithvisukta’, ‘Kalsukta’, ‘Brahmacharyasukta’, ‘Vivasukta’, Madhuvidya sukta in this Veda.

Hymns (Suktis) from Atharvaveda : The son is he who always implements say, observes the moral of his father and always adjusts with the (feeling and) thinking of his mother.

Oh ‘Manav’, you amass money as much you can and distribute that lavishly.

The earth is my mother and I am the son of earth.

Upanishad :

The word Upanishad is made up of three words उप + नि + शद् The word therefore means knowledge of the supreme spirit gained sitting at the feet of guru. The upnishad are also called vedanta as it is found in the last chapters of the veda. The Upnishads concentrate mainly on self, say soul, world and supreme being. out of these the concepts of ‘Brahman’ Ultimate reality and soul /self are at the centre. Hence, Upanishads are also called ‘Brahmvidya.’

There are more than 200 Upanishads out of which 108 Upanishadas are believed to be the best. Out of these excellent 108 Upanishads only ten are of great importance/value and are well-known. They are as under Ish – ken – kath – Prasna – Mund – Mandukya Tittarihi-Aitareya, chhandogya and Bruhadaranyakam.

Some Scholars include Swetaswar Upanishada also in the list of important Upnishadas. Thus, the total number of important Upanishadas is eleven. Adi Shankaracharya and many other acharyas have written beautiful commentry on it.

These Upanishads which are believed to be very ancient are supposed to have been composed between 1500 B.C. and the peried before the birth of Buddha i.e. 700 B.C.

Upnishadas present very mysterious, very deep philosophy of truth in a very simpleway through the conversations between Yagnvalkya – Maitreyi; Yam Nachiketa, Udalak Aruni Swetketu Supreme-being, soulself, form of the world, stage of salvation and the means of attaining it, evolution of the ‘srushti’i.e. universe are the topics delineated in Upanishads. The central theme of upanishdas is (knowing the supreme being everything can be known, say everything is known if the supreme being is known).

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Upanishadas are said to be the best works among the philosophical works of the world at large. This is the literature that leads the world to the path of peace. Practical solution of all the problems of the world are there in the philosophy of Upanishadas.

Kathopanishad :

This Upanishad is included in ‘Kath’ branch of Krishna Yajurveda. The subject of this Upanishad preaches. ‘Brahmvidya’ knowledge of supreme element through the conversation between Nachiketa and Yamraj. Yamraja offers three wishes to Nachiketa. Nachiketa is a child, but is very learned. His father who tries to earn ‘Punya’ i.e. the fruits of religious deed by giving old cows in donation, is a symbol of ‘worldly soul’, while Nachiketa is free from fascination. Nachieketa goes to Yamraja as a result of his father’s fury. There he pleases. Yamraja and acquires knowledge of supreme element.

This story of Kathopanishad is very awc-inspiring. The ‘Mantras’- hyms of Kathopanishad, like a child are also infactuating, sweet and simple.

Mahakavi Bhasa – Great Poet Bhasa

The great poet Kalidasa in the introduction to his first play ‘Malvikagnimitram’ writes ‘प्रथितयाशसं भास-कविपुत्र-सवमिललकदिनम।’ and with these words he introduces poet Bhasa as very famous one. After that, till the fourteenth centry in Sanskrit literature we find the mention of Bhasa and his composition swapnavasavdatta but for some reasons his this complete work (did not remain prevalent) was lost from prevalence.

Comsequently through there was acquiantance of dramas of Bhasa, the world of Sanskrit literature (Sanskrit literature) was not familiar with his works. In the year 1912 Professor T. Ganpat Shastri somehow put his hand on obtaining the manusecripts of plays written on Talpatri in Malayalayam script. He them edited those works in Devnagari script and published with a title ‘Bhasanatakchakra’. From that time thrteen plays of Bhasa which were lost became popular again.

Bhasa is a very ancient playwright. It is believed that he lived in the third or fourth century B.C. Critical analysis of his plays gives an idea that he was a worshipper of Loard Vishnu; must be a scholar of Veda, History, Puranas and religious books i.e. scriptures, must also be a minute observer of Nature and a student of Human nature.

Works of Bhasa

Following 13 dramas are accepted as the works of Bhasa These works are divided into five categories according to their content. They are as under:

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(a) Plays based on the Mahabharat

  • Dootvakya
  • Dootghatotkach
  • Urubhang
  • Karnabharam
  • Panchratra and
  • Madhyamvyayog

(b) Plays based on of Ramayana

  • Pratimanatakam and
  • Abhisheknatak.

(c) Plays based on Udyan story

  • Pratigyanyoungandharayam and
  • Swapnavasavdattam

(d) Plays based on folk stories

  • Avimarak
  • Charudattam

(e) Plays based on the life story of Krishna

  • Balcharitam

Let us be familiar in brief with these thirteen works.

1. Dootvakyam:

This is a one-act play based on the story of a Mahabharat. In it Krishna himself goes to Kauravas as the messanger of Pandavas. This play holds the title Dootvakya on the basis of the sentences of advice by the messanger.

Shri Krishna goes to Duryodhana as the messanger of Pandavas, an attendent, Shri Krishna as Purushottam. Hence Duryodhan gets angry and advises the congomoration to insult Krishna by not standing up to show respect. All the Kings stand up as soon as krishna comes. Duryodhan gets little disturbed.

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Shri Krishna proposes to give Pandavas their share as their right to inheritance. Shree Krishna and Duryodhan had a very hot discussion. Shri Krishna assumes his huge form and holds Sudarshan Chakra to punish Duryodhana. At last Shri Krishna quit the assembly.

There is a discussion of polities in this play. In this play lone character acting of Duryodhan draws our attention picturesque presentation of the scence of Vastraharan. An experiment of divine speech – oracle swows speciality of dramatic art. Presenting weapons on the stage the poet has created a beautiful picture.

2. दूतधटोत्कचम्:

In this, it is the imagination of the poet that as messangers Bhim and the son of Hidimba-Ghatotkacha give a message of Krishna to Duryodhana.

In the beginning of the one-act play, a soldier comes to Dhritrashtra and tells him that Abhimanyu was killed in a very heartless manner. Dhrutrashtra gets shocked and forecasts the death of Jaydrath who was responsible for the killing of Abhimanyu. Dulshala, the wife of Jaydrath laments.

Duryodhana, Dushasan and Shakuni feeling very happy at the death of Abhimanyu go to bow down to Dhrutrashtra but he does not bless them. Duryodhan enters into a discussion with his father. In the meantime they learn about the vow taken by Arjun to kill Jayadratha. Duryodhan decides to protect Jayadrath’s Chariot.

The messanger Ghatotkach tells the message to the grandfather Dhrutashtra asking him what would be his condition if his hundred sons would die. Moreover, Ghatotkach says that with the rising of the sun Arujun would attack them fiecely.

This one-act play is his own imaginary creation. Ghatotkacha a very little known character of Mahabharat is highlighted here. Duryodhan’s pride and his vanity i.e. false pride against valour of Ghatotkacha is depicted in an unfailing manner. Here the poetic sentiment of bravery is so well expressed that it undoubtedly touches emotions.

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3. अरुभड्गम:

In this one-act play Bhim breaks Duryodhan’s thigh in a club-fight. As this is the plot the play is given the title ‘Urubhangam’. Main character of the story is Duruodhana. This one-act play based on an incident in Mahabharat is a tragedy. Mahabharata war continued for eighteen days and in it 99 Kauravas were destroyed. Only Duryodhana was alive.

Aclub-fight between Bhim and Duryodhana begins. Shri Krishna pointing at his thigh gives a sign to Bhima. Bhim hits Duryodhana with his club on his thigh in almost fatal manner. Bhim violates the principle of club-fight. Duryodhana’s thigh breaks and falls on the ground. Blind king Dhritrashtra, Gandhari with a bandage on her eyes, wives of Duryodhana and son Durjay come to the battle field. They all moan the death of Duryodhana. With the death of Duryodhana the play becomes a tragedy.

Main poetic sentiment of ‘Urubhanagam’ is tragedy and it becomes very deep and sound. Death is shown on the stage and there the principle of drama is violated. This play in Sanskrit literature is a very rare example of a tragedy. Depiction of meeting with the family is quite heart-touching The character of Duryodhana in this play is well uplifted.

4. पश्ररात्रम्:

This three-act play is based on Mahabharat and in it Drona is given the fixed period of three days to bring news about Pandavas. And if it is done Duryodhana will give the Pandavas their share of Kingdom. For this the title is given ‘Panchratra’. In the beginning of the play the grand sacrificial fire held by Duryodhana is eulogised. Drona as the gift, asks Duryodhana to give half of the Kingdom to Pandavas. Duryodhana accepts Drona’s demand with a condition that he brings information about pandavas in five nights.

Information is gathered within five nights and Duryodhana accepts Drona’s demand to give half of the kingdom to Pandavas. This is not there in the original story of Mahabharat. The playwright has presented here something quite contradictory to the original story.

The plawright adding imaginery incidents has created quite an awe-inspiring play. In this play the character of Duryodhan is highlighted. Here Duryodhana who refuses to give even an inch of the land without war in the original Mahabharata story, gives away half of the kingdom obeying his guru. This play by Bhasa is very pleasing very beautiful.

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5. कर्णभारम्:

This one-act play is based on the story of Mahabharat Analysis of the burden/responsibility of Karna is the plot of this play. This fine one-act play glorifies Karna’s nature of giving alms. The title Karnabhar can also be interpreted in a different way. According to some an armour and Carrings become the burdan for Karna. Moreover responsibility assigned to him of becoming the commander in-chief is also believed to be his burden.

When Karma enters (comes to) the battlefield sitting in a chariot with Shalyaraj, in the beginning of the play, he is objected. He remembers that Parshuram had cursed him because, telling lies that he was a brahmine had learnt the art of using weapons from him, and he remembered that his art of using weapons would definitaly fail him.

In the meantime Indra in the glise of a brahmin came to him and asks for big donation/alm. Karna offers him cows, horses, elephants gold as alm, but the brahmin refuses to accept all that. At last Karna offers his armour and ear-rings attached to his body though karna understands that it was the intrigue of Indra. The brahmin immediately accepts that.

Indra much grived with repenence sends (goddess) Vimala through a messanger of God and Karna will be able to kill any one of the Pandavas with the help of that prowess. Karna, even after this does not accept defeat and gets ready for battle. The character of Karna is very nicely delineated in this play and he very well commands sympathy of all of us and not only Shalya.

6. मध्यमव्यायोग:

This one-act play is based on the story of Mahabharat. This play is of the ‘Vyayoga’ type. Bhim is the third among the Pandavas. In this play Bhima comes in contact with Hidamba and hence, the title Madhyamvyayoga is quite apt. This title is also appropriate as in it Bhim and the middle son of a Brahmin meet.

In the main scene of the play there is a description of the Brahmin who is very much frightened by the terror of Ghatotkach. Ghatotkach is in two minds. On one hand his responsibility is to carry out his mother’s order to take one man for her meal and on the other is his respect for a brahmin. Ultimately, he decides to execute the order of his mother. He tells the family of the brahmin that any one of them should go with him. The family decides to send the middle son with Ghatotkach.

Ghatotkach shouts loudly aksing the middle son to go with him. Hearing that Bhimsen presents himself as the middle son. The brahmin requests Bhimsen to save his family. Bhim recognises Ghatotkach as his son. He asks Ghatotkach to take him with physical force. the use of strength (physical force) and fraudulent power fails. In the end, Bhimsen himself goes to Ghatotkach’s mother. Hidamba recognises Bhim sen. Thus, Hidimba and Bhimsen meet. The Brahmin family departs happily.

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There is no mention of the meeting between Bhim and Hidamba in the original story of Mahabharata. But Bhasa has with his extraordinary poetic faculty created the character of Ghatotkach Poet bhase has glorified reverance for mother and though Hidimba is devilish human qualities are attributed to her.

7. प्रतिमानाटकम्:

This seven-act play is based on the story of Ramayana. Bharat on his way back from his maternal uncle’s house sees the statue of king Dasharath along with the statues of his forefathers and there he learns about the death of his father. So the play is given the title Pratimanatakam.

In this play there is the presentation of events from Rama’s going to forest to Rama’s coronation. Rama, sita and Laxman prepare for going to forest in place Rama’s coronation and Dasharath dies. Bharat is called back from his maternal uncle’s place with a message that his father, Dasharath is restless, sick. Bharat seeing the statue of Dasharath along with the statues of his forefather’s learns about Dasharath’s death and then about Kaikeyi being responsible for Dasharath’s death, grieved.

Bharat avoids meeting his mother Kaikeyi. Bharat goes to forest to return the seat of the king to Rama. Bharat, obeying Rama’s order returns to Ayodhya with the wooden slippers of Rama.

Rama, staying in forest, worries about the act of making ceremonial offering to his dead father. Ravan in the guise of Brahmin explains Rama that the act of ceremoniel offering to the dead can best be performed by Kanchanpasvamruga. In the meantime Rama chases Kanchanparswamrug. Laxman had gone out to bring back the head of the family, so Ravan kidnapped sita who was all alone. Bharat who was in Ayodhya learns about Sita’s kidnapping.

For all these happenings Bharat considers Kaikeyi guilty and she reminds Bharat of the curse of Shravana’s parents and says that Dashrath’s death, due to the separation from his sons, was certain Bharat was far away. Separation from Rama could have been due to his death or his going far from here. Only for that had asked for Rama’s going to forest.

I spoke out fourteen years instead of days out of fright. Bharat pardoned Kaikeyi for her this explanation. Through the conversation of two sages the happenings like killing of Ravan, entrusting Lanka (kingdom of Lanke) to Vibhishan, Sita’s ordeal of fire -‘Agnipariksha’ are mentioned – suggested. The play ends with the coronation of Rama.

The event of Pratimagruh is the original creation of Bhasa. Here the character of Kaikeyi is extalted. The secret of Kaikeyi’s promise is the imagination of Bhasa.

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8. अभिषेकनाटकरम्:

There are six acts of this play based on Ramayana – here the coronations of Sugriva, Vibhishan and Rama are narrated and therefore the title given to the play is Abhisheknatakam. According to the plot of play Surgriva and Rama make a treaty to help each other. Sugriva challenges Vali for a battle. They both fight with club and Vali dies because of the arrow aimed by Rama. Then the coronation of sugriv takes place.

Hanuman sets out for Lanka in search of Sita. He introduces himself to Sita in the garden of Ravan. Hanuman gets annoyed seeing the inswting behaviour of Ravan with Sita. He meets Sita and makes a statement of her condition. Sita also asks him to inform Rama about her pains-afflication. Then Rama and monkeys march towards Lanka.

The sea devides itself into two parts and gives way to them Ravan himself starts going to war after the killing of Indrajit and other demons. Rama and Ravan had a very fierce bettle. Rama kills Ravan and entrusts the Kingdom to Vibhishan.

After the killing of Ravan Sita’s ordeal of fire and in the end coronation of Rama take palce.

9. प्रतिज्ञायोगन्धरायणम्:

This four-act play is based on the story of Udayan. In this play Vatsraj Udayan’s minister Yasigandhrayan takes a vow twice to get Udayan released from the jail of Ujjayani.

The king Pradyot of Ujjayani had intended to give his daughter Vasavdatta in marriage to Udayan and for that he desired to bring Udayan to his kingdom in any way. Meanwhile, Udayan’s personal servant comes with a message that he was entrapped in the elephant fraud and is made a royal captive. Yaugandhrayan takes a vow to take a revenge on Pradyut for this fraud. The (vina-a musical instrument) taken away from Udayan is presented to Vasavadatta.

To set Udayan free Yaugendhrayan comes to Ujjaini. He maddens an elephent and for controlling the elephant when Udayan comes out of the fetters Yaungdharayan plans to help him to run away. He had also planned to take away Vasudatta with the king. Then the news of Udayan’s fleeing away on a female elephant named Bhadravati spreads. Yogendrayan hinders Pradyot’s army chasing Udayan. In the end he is caught. Pradyot Mahasen and Angarwati consent the secret love marriage of Udayan and Vasavdatta.

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10. स्वपनवासवदत्तम्:

In the fifth act of the drama Swapna king Udayan dreams of Vasavdatta. The title of the play is based on this.

This play is said to be the best creation of Bhasa and hence the scholors have showered flowers of praises on it.

Padmavati comes when Vasavdatta and Yougandhrayan were passing through a forest. He, in the guise of a saint, introduces Vasavdatta as his sister and expresses a desire to leave her as his deposit. Padmavati accepts the offer. A celibete in a forest nerrates the happening of Lavanakdahan. The king feels sad hearing about the burning of vasavdatta in a palace. A talk of marriage of Padmavati comes up and it is fixed up with Udayan. The responsibility of weaving a garland rests with Vasavdatta. In the fourth act the king’s love for vasuvdatta is expressed by the king while talking to a jester.

Vasavdatta has it secretly and feels very happy. In the fifth act Udayan dreams of Vasavdatta and in dream he tries to convince her. Meanwhile Vasavdatta taking the hanging hand of Udayan who was on the cot puts it on the cot. The king wakes up with her touch, runs to chase her but he fails. The king expresses his doubt before a jester about Vasavdatta being alive.

11. अविमारकम्:

In this seven-act play based on a folktale there is a love-story of Vishnusen and Kurangi.

In this play a prince named Vishnusen kills a demon who takes the form of a sheep. The title of the play is based on this.

A young man named Anjangiri saves Kurangi the daughter of the king Kuntibhoj, from the attack of an elephant when she was taking a leisurely strall in her garden. In this situation both get attracted towards each other. The king receives the news of rescue He starts thinking about his daughter who has come to the marraiagable age.

Kurangi and that young man keeps on meeting with the help of her wet-nurse not ready to believe. The event of Ghoshwati refreshes the memory of Vasavdatta, ‘Kanchuki’ servent of a herem brings a picture of Vasavdatta. Padmavati feels much surprised seeing it. She talks about a woman of very similar face being in harem.

Then Vasavdatta presents herself in the kingly court. Youngdharayan asks Padmavati to return his deposit. At last Yougandhrayan asks Padmavati to return his deposit. At last Yougandrayan reveling his true self explains his plan to the king. Vasavdatta also presents herself in her true form and the play ends with a happy note.

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The king realises the love growing fast between Kurangi and Avimarak. He runs away with a feaer of being caught and attempts to commit suicide. He then getting a mysterious ring from a learned person tries to enter the harem (अन्तःपुर) developing confidence of others in him with the effects of the ring Kurangi suffering from separation tries to end her life committing suicide but Avimarak comes there at that time and saves Kuranji. Both unite in the end.

12. चारुदतम्:

This four-act play is based on a folk-tale. There is a love story of Vanik (bania) Charudatta and a prostitute Vasantsena. The title of the place is based on the name of the hero of the play.

The main poetic sentiment of the play is ‘Shrinagar’-romance The hero of the play is brahmin by birth but bania by deeds he was very rich, but giving money in donations he has became poor. The heroine Vasantsena is a famous prostitute of Ujjayini. He loves Charudatta not for his riches but for his qualities. In the play in the depiction of poverty romantic sentiment is planned-weaved. This play remained very successful in entertaining people.

The jester’s conversations prompting laughter please the spectars and also have proved very helpful in furthering the story. Dialogues in the play are quite pleasing, heart touching. An important point in this play is that the heroine makes confession of her love and takes a lead to gain the love of the hero.

13. बालचरितम्:

The story weaved in this play is based on Lord Krishna’s childhood events described in Harivansh and Puranas. Here the plot covers the story from the birth of Krishna to the killing of Kans in Mathura.

Here the daughter of Nand is shown dead and through this the story is given the dramatic touch. The dialogue between Nand and Vasudev is also the poet’s own imagination, Krishna is said to be the seventh son of Vasudev.

In this play the heroic mood – the poetic sentiment of bravery is at the centre. Non-living weapons are brought on the stage as it is found in Dootvakya. In this play there are totally 26 male characters and more than 10 female characters. In this play Krishna is the hero, Balram is the subordinate hero Kans is the villain. With the dialogue ‘Now Vrushthiraj is established – has become famous, the play ends.’

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Mahakavi Kalidas

पुरा कवीनां गणनाप्रसङ्गे कनिष्ठिकाधिष्ठितकालिदासा।
अद्यापि तत्तुल्यकवेरभावात् अनामिका सार्थवती बभूव॥

Whenever in the ancient times estimate of poets was put the name of Kalidas was always put on the last finger out of five fingers on hand. Since then no other poet like the poet Kalidas is traced. The name of the third finger the ring finger is rightly called a nameless finger.

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Plays of Kalidas

1. मालविकागिनमित्रम्:

This play is Kalidas’s first play. There are five acts in it. The main story (plot) is of the love affair of Malvika and the king Agnimitra of Shrung dynastry.

Malvika and Agnimitra get bethrothed. But as a result of the defeat of her brother she had to flee away. After that, she, in disguise enters the harem of Dharini, the queen of Agnimitra. After many ups and downs the Jester succeeds in bringing about their union. Dharini captures Malvika with her friend. The jester comes out successful in helping Malvika and Agnimitra to reunite, under the pretext of a snake bite. In the end the happenings like victory of Agnimitra in a battle, his son’s victory over Greeks (Yavanas) and introduction of Malvika as a princess are described. Queen Dharini (helps) creates facility for the marriage of Agnimitra and Malvika.

In this play the love story of Malvika and Agnimitra is presented in a very peculiar style. The poet has made the play very beautiful, attracted towards each other. Urvashi who has returned to heaven performing a role of Lakmi in one play once speaks Pururava instead of Purushottam in a dialogue. This annoys Bharatmuni and he cures Urvashi.

As a result of the curse Urvashi had to come to the earth and on the earth Pururava and Urvashi meet. [Pururava’s wife queen Aushinari gives consent to their love.] Once when Pururava and Urvashi where taking a strall in Kumarvan Urvashi gets angry with Parurava and walks away and she turns into the form of a creeper.

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The king becomes impolite-almost mad as a result of his separation from Urvashi and searches her, inquires about her. After his many strides he gets her back in the form of a precious stone called Sangamaniya. Urvashi becomes the mother of a brave son Aayu through Pururava. She gets favour of Lord Indra to stay with her husband Pururava throughout life. In the end ceremonial sprinking of water ceremony is performed on their son Aayu as the crown prince.

This play of Mahakavi Kalidas is based on a mythological story and in it there is very subtle presentation of sanyog and separation viprarambh shringar (Romance). In the fourth act of the play the poets love for nature gets reflected at its best. Here human feelings are penpictured very beautifully in nature.

It is said that this play must be originally a three-act play oscilating/swinging between the earth and heaven. The fourth act must have been added to hring about the reunion. And then the poet must have added the fifth act on the occasion of the ceremony of sprinkling ceremonial water on the crown price.

3. अभिज्ञानशाकुनतलम्:

In this seven-act play, love of Dushyant and Shakuntala is described (while returning from a deer hunt) King Dushyanta happens to stop by the hermit Kanva’s ashram, There he sees girls of ashram watering tender plants. There he sees ‘Kanvkanya’ Shakuntala and starts longing for her. Shakuntala was assigned the responsibility of receiving guests.

And then it so happened that he had to stay at the asharma to protect the ceremonial performance of a sacrifice. And the foundation got laid for the growth/development/progress of love between Shakuntala and Dushyant. Then both of them marry in the ceremony of ‘Gandharva vivah’. Dushyant returns to his kingdom.

And the sage Durvasa gives a curse to Shakuntala lost in the ideas of Dushyanta and as a result Dushyanta forgets her.

Sage Kanve learns about the ‘Gandharva Vivah’ through celetial voice and he sees Shakuntala off for her husband’s house. Cursed Dushyanta forgets Shakuntala, does not recognise her and does not accept her, Shakuntala’s mother Menaka takes her to the sage Maricha’s ashram. The ring that had slipped from Shakuntala’s finger was found by a fisherman and that ring is sent to Dushyanta by his guards.

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He recollects Shakuntala as soon as he sees the ring and he feels much remorse for deserting Shakuntala Assisting Gods he goes to the ashram of sage Marichi, Here he meets a child Sarvadaman playing with a baby lion and counting the teeth of a lion he relises that servadaman is the son of Shakuntala. After Dushyanta, Shakuntala and Sarvadaman (Bharat) meet. In the end Dushyant being blessed by the sage returns with his wife and son.

Kavi Kalidas had an inspiration for this extraordinary play from ‘Shushka Sambhavparva’ of Mahabharat. But Kalidas created a charming fascinating work out of the skeleton he found in Mahabharat. For this only it is said, “There are plays in literature and the play Shakuntala is the most beautiful of all the plays.” Such a well praised play is not the among the plays of India only but of the whole world. German poet gete had become so happy reading it that he keeping the book Shakuntal on his heand, danced.

In the fourth act of this play there is the delineation of sending a girl. At the time of sending off shakuntala Tapovan, sage kanva, Gautami friends of shakuntala. Birds and animals, trees and creepers-All become sentimental, emotional. This play is worth enjoying from begining to end because of its excellent innovation of the original story of Mahabharata knitting of contend and presentation delineation of characters.

Panchtantra

One of the many peculiarities of the Sanskrit literature is its animal stories, fables or ethical stories. These stories were composed – orally told in the ancient age. Its roots are found in vedas and Upanishadas and in their traditions only these animal stories (tables) are included. These stories are based on nature of birds and animals and their characterstics say peculiar habits and limitations. There we find sermons which are useful to the human society in their day-to-day life Panchtantra and Hitopadesh are the main collections of animal fables.

Pandit Vishnusharma is the author of Panchtantra. We find the background of its construction runs like this (Pandit Sharma actually compiled the stories) Aking named Amarshakti lived in Mahilarophy city in south. He had three foolish sons. The king was much worried about educating the sons and making them experts in political science.

He tried to educate them in many ways but he did not suceed. When the king requested the pandits to make his sons clever in political science, Pandit Vishnu Sharma accepted the responsibility. He accepted the responsibility with a view to make those three sons expert in political science He told them very interesting stories which becamse well-known as Panchtantra.

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The title ‘Panchtantra’ gives us to understand that there are five sections say parts. These five sections parts are –

  1. Mitrabhed
  2. Mitraprapti
  3. Sandhivigrah
  4. Labdhapranesh and
  5. Aparikshitkarak.

1. Mitrabheda –

The separation of friends :- In this section strories advising to on guard against those who developing discard among friends, try to accomplish their selfish ends. Main story in this section is of an and a lion. Two jackals introduce them (a bull and a lion) to each other and they become good friends. One of those twojakals envies that friendship and playing very cunningly lead to breaking up the friendship between the two near friends. Ultimately the bull dies and the jackal holds a high status in the eyes of the lion.

2. Mitraprapti –

The gaining of friends In this section the stories of friendship are given. Here we find the stories of four friends tortoise, a dear, a mouse and a crow and their chivalry and bravery. Due to the friendship developed between virtuous persons after good thinking all the four friends overcome difficulties very successfully and remain helpful to one another.

3. Sandivigrah –

War and peace. We find in this section stories of war between owls and crows. So its another title is ‘Kakolukiyam’. It is shown here how risky it is to cultivate friendship with one who was an enemy earlier.

4. Labtha Pranash –

Loss of gains. ‘Labdh’ means ‘gains’ and ‘pranash’ means ruins. Loss of gains is the theme of all the stories in this section. Main story in this section is of a monkey and a crocodile. It is shown here how things are grabbed from foolish perosns.

5. अपरिक्षितकारक –

In this section we have the stories which tell us about the consequences of tasty actions Here the experience of a barber, as a result of his actions done without proper thought, are described. We get a lesson from the stories in this section that without considering the situation properly nothing must be done. In Panchtantra we find short and long stories written in simple and easy to understand language. The stories though short are very effective. One story grows from another story.

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We find peculiar blending of prose and poetry in these stories. The characters in the story narrate (slokas) hymns in support of their opinion. Egoistic and hypocratic nature, intriguing nature of courtiers, peculiarities of women’s nature are much critised in a very humorous manner. We find in those stories concrete and pleasing/joyous thoughts about the human life presented. Panchtantra is the greatest gifts of India to the world literature and it is translated into almost all languages of the world. It is said to be a unique work because of its many peculiarities.

Scientific works of Sanskrit literature

Sanskrit is the oldest language of India and the whole world. Source of Indian culture is preserved in this language. In Sanskrit language on one hand best literary and philosophical works are constructed/written, preserved and those became well-known worldwide and on the other hand some best scientific works here are also written. In no other ancient language of the world are written books as many branches of sciences as are written in Sanskrit.

Veda is the root of all these scientific work. In Vedas and the vedic literature written after vedas some elements of experimental science are found. Before the period of Mahabharata original scientific works discussing the sciences like astrology, mathematics, chemistry, medicine , vastushstra, geology, physiology, arthashastra, commerce were already prepared and were quite well-known. Varahmihir, Aryabhatt Bhaskarcharya Charak, Madhav, Sushruti, Kautilya etc. were world renowned scholars. Much of it is lost during one thousand years of conflict and serious calamities. Still however, whatever is available to us is of great value and that gives us information about the achievements of those scientists.

It is very well-known that the concept of zero and numbers was conceived first in India and this is accepted world-wide. Zero holds a very important place in counting and using of numbers i.e. in arithmetic and with it grew in India algebrical, geometrical, Jayamiti, trigonometry, calcullus, ‘vector’ maths and such many other methods of counting and calculating.

‘Shalyasutra’ was composed about three thousand years ago. We find many imporant principles of arithmatic, algebra, trigonometry, linear measurement in the books which are considered to be the parts of “Kalpshastra’. The constructor/those who devised these ‘sutras’ formulas were acharyas like Bodhayan, Aapastamb, Katyayan, Manav, Maitrayan, Varah, Hiranyaksh.

Thus, mathematics growing from the time of Vedas was developed further by many mathematicians like Aryabhatt (first), Bhaskaracharya (first), Brahmgupta, Mahavir, Arya Bhatt (second), Shridharacharya, Shripati, Bhaskaracharya (second) and Narayan.

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In the ancient times mathematics was composed in the style of writing ‘Sutras’. It developed later in the analytical prose style. Out of such books we find today the book Aryabhattiyam by Aryabhatt (first) Earlier than this five principles of Brahm, Vaishstha, pitamah etc. were popular. But traditionally it is believed that those are not the works of any human. Consequently the book Aryabhattiyam is believed to be the oldest among those which are prepared by humans. No other book more ancient than it is available.

There are four chapters in Aryabhatiyam. There in there are totally one hundred twenty ‘Shlokas’ verses. First tweny are in ‘Gati’ metre so the first section of it is called ‘Dashgitik’. In the other section lone handred and eight slokas are in ‘Arya’ metre.

So this section is called ‘Aryeshtashata’. In one shloka there is ‘mangalacharan’ i.e. a prayer sung atan inaugural of an auspicious event or a book. and in the other shloka is given the terminiology of numbers. Thus, there are one hundred and twenty shlokas in this book.

It is said that the great mathematician Aryobhatt had composed this book at the age of 23.

In this book of Aryabhatta in the beginning astrology is said to be very useful mathematical calculation. After that those are three ‘padas’ chapters which are Gonitpada, Kalkriyapada and Golapada. It is said that in Gonitpada we find the subjects of pure mathematics like arithmatic, algebra, geometry and trigonometry. In other ‘podas’ i.e. chapters there are subjects of astronomy.

Another ancient book of mathematics is ‘Brahmsfutsiddhanta’ by Brahma gupta. He was shrimali brahmin and a resident of Bhinmal in Rajasthan.

Then comes in rank ‘Siddhant Shrimani’ book of mathematics by four parts of this very famous book those are Lilavati, algebra, grahgita and goladhyaya. We find the mention of the principle of gravitation of earth in the Lilavati part of the book.

On one hend the books of methamatics as the part of astronomy which is considered to be the part of Veda were prepared-composed and on the other hand book of the mainly four strivings of a human being namely wealth, were also written during the ancient time.

Still the word ‘Arthashastra’ used here has not the same connotation that it has today. ‘Arthashastra’ in Sanskrit is the ‘Shastra’ (science) covering husbandry, agriculture, trade and commerce stories (ie. the meaning that ‘Arthshastra’ hold today etc. Moreover, in this ‘Shastra’ only the science of politics is also inlcuded.

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A very famous book of Arthshastra in Sanskrit is Kautilya’s Arthshastra and the work is the last word in that subjects. This Acharya Kautilya’s other famous names are Chanakya, Vishnugupta etc. This is the most famous and supreme work available in Arthashastra.

The book Arthshastra is divided into fifrteen titles and all those are divided into three sections. In the first section there are two titles ‘Vinayadhikarik’ and ‘Adhyakshaprachar’. In this section there is mainly the discussion of the officials of the kingdom.

In the second section, five titles are is very useful in discussion of state administration. In the third section there are eight titles discussing techniques and strategies of victory over enemies.

Books on Arthashastra were written by Manu, Bruhashpati, Shukla Vishalaksha, Parashara, Narada, Bhishma, Uddhav and Indra before the Arthashastra by Chanakya-Kautilya.

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