GSEB Class 12 Hindi Rachana निबंध-लेखन

   

Gujarat Board GSEB Hindi Textbook Std 12 Solutions Rachana निबंध-लेखन Questions and Answers, Notes Pdf.

GSEB Std 12 Hindi Rachana निबंध-लेखन

निबंध लिखते समय ध्यान में रखने योग्य बातें :

विषय का चुनाव : निबंध के दिए गए विषयों में से किसी एक विषय को सावधानी से चुन लीजिए। कुछ विद्यार्थी जल्दी में किसी भी विषय पर निबंध लिखना प्रारंभ कर देते हैं, किंतु 10-12 पंक्तियाँ लिखने के बाद वे आगे लिख नहीं पाते और उस निबंध को अधूरा छोड़कर दूसरे विषय पर लिखना शुरू कर देते हैं। परीक्षा की दृष्टि से ऐसा करना हानिकारक सिद्ध होता है। इसलिए विद्यार्थियों को भलीभांति विचार करके उसी विषय पर अपनी कलम उठानी चाहिए, जिस पर लिखने के लिए उनके पास पर्याप्त सामग्री हो।

रूपरेखा : निबंध का विषय चुनने के बाद उस पर विचार करके कच्ची रूपरेखा अवश्य तैयार करनी चाहिए। रूपरेखा से निबंध की लंबाई का अंदाज लग जाएगा। यदि वह अधिक लंबी जान पड़े तो कम महत्त्व के मुद्दों (Points) को छोड़ देना चाहिए।

रूपरेखा का विस्तार : रूपरेखा भलीभाँति तैयार करने के बाद ही उसके मुद्दों का क्रमशः उचित विस्तार करना चाहिए।

(अ) प्रारंभ या भूमिका : निबंध का प्रारंभ आकर्षक, स्वाभाविक और संक्षिप्त होना चाहिए। अच्छा प्रारंभ आधी सफलता का द्योतक है। (Well begun is half-done.) प्रारंभ निबंध के विषय से संबंधित होना चाहिए।

प्रारंभ या भूमिका के कुछ तरीके :

  1. विषय की व्याख्या देकर
  2. विषय का महत्त्व स्पष्ट करते हुए
  3. वर्तमान परिस्थिति की चर्चा से ।
  4. किसी संबंधित प्रसंग के उल्लेख से
  5. किसी कहानी या संवाद से
  6. किसी कहावत या लोकोक्ति से
  7. किसी अवतरण से
  8. किसी काव्यपंक्ति से

(ब) मध्यभाग : निबंध का यह भाग बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। इस भाग में विषय-संबंधी महत्त्वपूर्ण बातों की चर्चा करनी चाहिए।

(क) उपसंहार या अंत : अच्छे निबंध का अंत भी प्रारंभ की तरह अत्यंत स्वाभाविक हो – संक्षिप्त और स्पष्ट, आकर्षक और भावपूर्ण । इसमें पूरे निबंध का निचोड़ आ जाना चाहिए।

GSEB Class 12 Hindi Rachana निबंध-लेखन

निम्नलिखित प्रत्येक विषय पर 150 शब्दों में निबंध लिखिए :

मेरा प्रिय हिन्दी लेखक

[परिचय – साहित्य का रूप – कहानियाँ और उपन्यास – विशेषताएं – अन्य बातें – प्रिय होने का कारण]
हिन्दी में अनेक महान लेखक हैं। सबकी अपनी अपनी विशेषताएं हैं। उन्होंने उत्तम कोटि के साहित्य का निर्माण कर सारे संसार में नाम कमाया है, किंतु इन सबमें मुझे सबसे अधिक प्रिय हैं हिन्दी कथा-साहित्य के अमर सम्राट मुंशी प्रेमचंदजी।

प्रेमचंदजी लोकजीवन के कथाकार हैं। किसानों, हरिजनों और अन्य दलितों के जीवन पर उन्होंने अपनी कलम चलाई। किसानों के दुःख, उनके जीवन-संघर्ष, उन पर जमीनदारों द्वारा होनेवाले जुल्म आदि को उन्होंने स्वाभाविक ढंग से पढ़े-लिखे समाज के सामने रखा। इसके साथ ही उन्होंने भारतीय किसानों के अंधविश्वास, अशिक्षा, करुणा, प्रेम और सहानुभूति के भी वास्तविक चित्र प्रस्तुत किए। इस प्रकार प्रेमचंदजी का साहित्य भारत के ग्रामीण जीवन का दर्पण है।

प्रेमचंदजी की कहानियाँ बड़ी सरल, सरस और मार्मिक हैं। ‘कफन’, ‘बोध’, ‘ईदगाह’, ‘सुजान भगत’, ‘नमक का दारोगा’, ‘शतरंज के खिलाड़ी’, ‘बड़े घर की बेटी’, ‘दूध का दाम’, ‘पूस की रात’ आदि अनेक कहानियों में प्रेमचंदजी की स्वाभाविक और रोचक शैली के दर्शन होते हैं। उनके उपन्यास भी बेजोड़ हैं। ‘गोदान’ तो किसानों के जीवन का महाकाव्य ही है। ‘गबन’ में मध्यम वर्ग के समाज का मार्मिक चित्र अंकित हुआ है।

‘रंगभूमि’, ‘सेवासदन’, ‘निर्मला’ आदि उपन्यासों ने प्रेमचंदजी और उनकी कला को अमर बना दिया है। सचमुच, प्रेमचंदजी के साहित्य को पढ़ने से सदगुणों और अच्छे संस्कारों का विकास होता है। प्रेमचंदजी का चरित्र-चित्रण अनूठा है। कथोपकथन भी बहुत स्वाभाविक और सुंदर हैं। चलती-फिरती मुहावरेदार भाषा उनकी सबसे बड़ी विशेषता है। गांधीजी के विचारों का प्रेमचंदजी पर बड़ा भारी असर पड़ा है।

सत्याग्रह और असहयोग आंदोलन ने उनकी रचनाओं को काफी प्रभावित किया है। प्रेमचंदजी के साहित्य में राष्ट्रीय जागरण का महान संदेश है, हमारे सामाजिक जीवन के आदर्शों का निरूपण है। देशप्रेम के आदर्शों की झलक है। गुलामी का विरोध और राष्ट्र को उन्नत बनाने की प्रेरणा है। उनकी कलम जाति-पाति या ऊंच-नीच के भेदभाव तथा प्रांतीयता आदि सामाजिक बुराइयों को दूर करने की सदा कोशिश करती रही।

साहित्य-सृजन द्वारा वे हिन्दू-मुस्लिम की एकता के लिए हमेशा प्रयत्न करते रहे। इस प्रकार साहित्यकार के साथ ही साथ वे बहुत बड़े समाजसुधारक भी थे। स्वतंत्रता-आंदोलन के दिनों में उनकी कलम ने तलवार का काम किया। लोकजीवन के ऐसे महान कथाकार और सच्चे साहित्यकार प्रेमचंदजी यदि मेरे प्रिय लेखक हों तो इसमें आश्चर्य ही क्या!

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देश के प्रति युवकों का कर्तव्य

[प्रस्तावना – युवक ही देश के रक्षक -देश की प्रगति के आधार – राष्ट्र-निर्माण के अन्य कार्य – उपसंहार]
युवक देश के प्राण होते हैं। देश को अपने युवकों से बड़ी-बड़ी आशाएं होती हैं। इसलिए युवकों को देश के प्रति अपने कर्तव्यों का ज्ञान अवश्य होना चाहिए।

मातृभूमि की रक्षा की जिम्मेदारी युवकों पर होती है। इसलिए युवकों का कर्तव्य है कि वे अपनी रुचि के अनुसार जल, स्थल या वायुसेना में भर्ती हों। वे युद्ध कौशल में निपुण बनें। स्वतंत्रता की लड़ाई में अनेक युवकों ने अपना बलिदान दिया था। भगतसिंह, राजगुरु, चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां आदि शहीदों ने अपने साहस और देशप्रेम से भारतवासियों में आज़ादी की दीवानगी भर दी थी।

अब देश के स्वाभिमान और गौरव की रक्षा के लिए भी युवकों को ही आगे आना होगा। देश की प्रगति युवकों पर निर्भर है। विज्ञान, कला, शिक्षा आदि क्षेत्रों में युवकों को ही देश की आवश्यकताएं पूरी करनी पड़ेंगी। आज हमारे देश में खाद्यान्न की कमी है। देश के अनेक भागों में पेय जल की समस्या है। सड़कों की जरूरत है। विद्युत उत्पादन बढ़ाना है। इन सबके लिए आधुनिक टेक्नोलॉजी का ज्ञान आवश्यक है।

यह ज्ञान पाकर हमारे युवक इस पिछड़े हुए देश को विकास की नई दिशाएं दिखा सकते हैं। कृषि, उद्योग, व्यापार में आधुनिक तौर-तरीके अपनाकर वे देश में प्रगति का नया उजाला ला सकते हैं। आज के जीवन में राजनीति बहुत महत्त्वपूर्ण बन गई है। देश के युवकों को राजनीति में भाग लेकर उसे साफ-सुथरा रूप देना चाहिए।

आज हमारे यहाँ राजनीति और आर्थिक क्षेत्र में बहुत भ्रष्टाचार फैला हुआ है। प्रशासन में भ्रष्ट तत्त्व घुस गए हैं। चुनावों में भी धांधली होती है। देश से ये सारे अनिष्ट युवक ही दूर कर सकते हैं।  शासन को कल्याणकारी रूप देना यवकों के ही बस की बात है। समाज भी अपनी समस्याओं के हल के लिए युवकों का ही मुंह ताकता है।

आज जरूरत है ऐसे प्रबुद्ध युवाओं की जो समाज को संकीर्णताओं से मुक्त करके उसे विशाल और व्यावहारिक दृष्टि दें। वे जातिप्रथा को समाप्त करें। समाज में ऊंच-नीच का भेदभाव दूर करें। वे बिना दहेज लिए विवाह करने का व्रत लें और इस प्रकार देश को दहेज के दानव से मुक्त करें। वे सिनेमा और दूरदर्शन के माध्यम से समाज को नई दृष्टि दें। वे देहातों में शिविरों का आयोजन करें और उनके द्वारा सामाजिक समस्याओं का निराकरण करें।

इस प्रकार युवक चाहें तो अनेक तरह से देश की सेवा कर सकते हैं। वे जुआ, शराब, चोरी, बेईमानी से बचें और अपनी शक्तियों का देश के उत्कर्ष में सदुपयोग करें। वे राम, कृष्ण, अर्जुन के समान वीर बनकर देश के दुष्ट तत्त्वों का नाश करें। वे बुद्ध और महावीर के समान देश को सन्मार्ग पर ले चलें और गांधी के समान आत्मशक्ति से संपन्न बनें। वे अच्छे नेता, सेनापति, शिक्षक, डॉक्टर, इंजीनियर और कलाकार बनकर देश के विकास में अपना योगदान करें।

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अब्दुल कलाम

[प्रस्तावना – अब्दुल कलाम – बचपन – पढ़ाई के लिए संघर्ष – वैज्ञानिक के रूप में – इन्सानियत और कलाम साहब – राष्ट्रपति – कार्यक्षेत्र]

भारतरत्न डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का पूरा नाम डॉ. अबुल पकिर जैनुलाबदीन अब्दुल कलाम था। उनको मिसाइल मैन के नाम से पहचाना जाता है। वे भारत के ग्यारहवें राष्ट्रपति थे। उनका जन्म 15 अक्तूबर 1931 को, तमिलनाडु के रामेश्वर में हुआ था। उनके पिता का नाम जैनुलाबद्दीन और माता का नाम आशियाअम्मा था। कलामजी के पिता एक नाविक थे और माता गृहिणी।

कलाम साहब के परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी इसलिए इन्हे छोटी-सी उम्र में ही काम करना शुरू कर दिया था। कलाम साहब बचपन में समाचारपत्र बेचने का काम करते थे। बचपन में अखबार बेचने का काम आसान नहीं था, क्योंकि गाँव के रेल्वे स्टेशन पर ट्रेन रुकती नहीं थी। ट्रेन अगले स्टेशन पर रुकती थी, जो 3-4 किलोमीटर दूर था। ट्रेन से अखबार की पेटी उस स्टेशन पर फेंक दी जाती थी।

हम चार किलोमीटर दूर चलकर जाते थे। स्कूल के दिनों में कलाम साहब सामान्य विद्यार्थी थे लेकिन नयी चीज सीखने के लिए हमेशा तत्पर रहते थे।  उनके अन्दर जिज्ञासा भरपूर थी और पढ़ाई पर घंटों ध्यान देते थे। मद्रास इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद कलाम ने रक्षा अनुसन्धान और विकास संगठन (डीआरडीओ) में वैज्ञानिक के तौर पर भर्ती हुए। यहाँ रहकर ही उनके नेतृत्व में वैज्ञानिकों की टीम ने प्रोटोटाइप होवर क्राफ्ट तैयार किया।

डॉ. कलाम रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन 1962 में छोड़ भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम से जुड़ गए। डॉ. कलाम ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन में 1963 से 1982 तक विभिन्न पदों पर कार्य किया। इसके बाद वे एरोडायनमिक्स से जड़े, फिर वे थम्बा में सैटेलाइट प्रक्षेपण यान टीम के सदस्य बने, तत्पश्चात, एस. एल. वी के बतौर निर्देशक कार्य किया।

इस योजना के तीन डिजाइन विकास और परीक्षण में जी जान से कार्य किया। इस योजना के तहत 1980 में सफलतापूर्वक रोहिणी सैटेलाइट का प्रक्षेपण कर पाइ। इसकी सफलता की कद्र करते हुए 1981 में डॉ. कलाम को पद्मभूषण अवार्ड से सम्मानित किया गया। 1982 में वे फिर रक्षा अनुसंधान से जुड़ने के पश्चात् इन्ट्रीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेन्ट प्रोग्राम को आगे बढ़ाते हुए, देश का सबसे सफल सैन्य अनुसंधान किया।

इसके अंतर्गत दस वर्षों में पांच महत्त्वाकांक्षी कार्यों को क्रियान्वित करने का ध्येय रखा गया। जिसमें नाग, आकाश, पृथ्वी, त्रिशूल, अग्नि जैसे प्रक्षेपास्त्रों का उत्कर्ष शामिल था। डॉ. कलाम को भारतीय रक्षा और विज्ञान के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान के कारण देश का सर्वोच्च सम्मान ‘भारतरत्न’ 25 नवम्बर, 1997 को दिया गया।

डॉ. कलाम की माताजी बड़े दयालु और आध्यात्मिक वृत्ति वाले थे। उनसे डॉ. कलाम प्रेरित थे। डॉ. कलाम साहब नेक-दयालु और अनुशासन का पालन करनेवाले थे। वे कुरान और भगवद्गीता दोनों का अध्ययन करते थे। उनकी आंतरराष्ट्रीय ख्याति थी। वे आंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश को आगे बढ़ाकर महाशक्ति बनाना चाहते थे। वे एक उमदा इन्सान तो थे ही साथ में अच्छे लेखक भी थे।

उन्होंने कई प्रेरणादायक किताबें भी लिखी है। बच्चों और युवाओं में डॉ. कलाम अत्याधिक लोकप्रिय थे। वे ‘भारतीय अन्तरिक्ष विज्ञान और प्रौद्योगिकी संस्थान’ के कुलपति भी थे। ‘मिसाइल मैन’ कहे जानेवाले डॉ. कलाम भारत के सर्वोच्च पद राष्ट्रपति पद पर 25 जुलाई 2002 से 25 जुलाई 2007 तक रहे। 83 वर्ष की आयु में 27 जुलाई 2015 को उनका स्वर्गवास हुआ। आज भी डॉ. कलाम को देश बड़े सम्मान से याद करता है।

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मेरी प्रिय ऋतु

[भारत में ऋतुओं का क्रमिक आगमन – प्रिय ऋतु का परिचय -प्रिय होने का कारण -अन्य ऋतुओं से तुलना – मेरी प्रिय ऋतु और मेरा जीवन – उपसंहार]
भारत ऋतुओं का देश है। वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत और शिशिर इन छ: ऋतुओं का जो सुंदर कम हमारे देश में है, वह दूसरी जगह दुर्लभ है। प्रत्येक ऋतु की अपनी छटा है, अपना आकर्षण है। पर इन सभी ऋतु-सुंदरियों में मुझे वसंत ऋतु सबसे अधिक प्रिय है।

सचमुच, वसंत की वासंती दुनिया सबसे निराली है। शिशिर का अंत होते ही वसंत की सवारी सज-धज के साथ आ पहुंचती है। बागों में, वाटिकाओं में, वनों में प्रकृति वसंत के स्वागत की तैयारियां करने लगती है। कलियाँ अपने घूघट खोल देती हैं, फूल अपनी सुगंध बिखेर देते हैं, भौरे गूंज उठते हैं और तितलियां अपने चटकीले-चमकीले रंगों से ऋतुराज का स्वागत करने के लिए तैयार हो जाती हैं।

पृथ्वी के कण कण में नया आनंद, नया उत्साह, नया संगीत, नया जीवन नजर आता है। जब सारी प्रकृति वसंत में झूम उठती है, तब मेरा मन क्यों न झूमे? सचमुच, वसंत की शोभा मेरे हृदय में उतर आती है। एक ओर शीतल, मंद, सगंधित पवन के मधर झोंके मन को मतवाला करते हैं. तो दूसरी ओर फुलवारियों का यौवन बूढों को भी जवान बना देता है। खिलती कलियाँ देखकर मेरे जी की कली भी खिल उठती है।

न तो यहाँ गरमी की बेचैनी है, न जाड़े की ठिठुरन । एक ओर प्रकृति के रंग और ऊपर से रंगभरी होली! अबीर-गुलाल के रूप में मानो हृदय का प्रेम ही फूट पड़ता है। ऐसा मनभावन फागुन का वसंत मुझे प्रिय क्यों न हो? कुछ लोग वर्षा को वसंत से अच्छा मानते हैं। पर कहाँ वर्षा का किच-पिच मौसम और कहाँ वसंत की बहार! वह वर्षा, जो घरों को धराशायी करती है, फसलों पर पानी फेरती है, नदियों को पागल बनाकर गाँव के गाँव साफ कर देती है, सुखकर कैसे हो सकती है?

इसी प्रकार शरद की शोभा भी वसंतश्री के सामने फीकी पड़ जाती है। वसंत, सचमुच, ऋतुराज है। अन्य ऋतुएं उसकी रानियाँ या सेविकाएँ ही हो सकती हैं। मैं तो वसंत को जीवन की ऋतु मानता हूँ। उसका आगमन होते ही मेरा मन इंद्रधनुष-सा रंग-बिरंगा बन जाता है और मेरी कल्पना रेशमी बन जाती है। बागों में सैर करते मन नहीं भरता।

मेरी आँखों पर प्रकृति के आकर्षण का चश्मा लग जाता है और मेरे दिल में उमंगों का सूर्योदय होता है। कोयल के गीत मुझे कविता लिखने की प्रेरणा देते हैं। फूल मन को खिलना और होठों को हंसना सिखाते हैं। तितली फूलों को प्यार करना और भौरे गुनगुनाना सिखाते हैं। ऐसी अनोखी और मनभावनी है मेरी प्रिय वसंत ऋतु ! मैं सालभर इसकी प्रतीक्षा करता रहता हूँ।

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बाढ़ के दृश्य अथवा नदी का रौद्र रूप

[बाढ़ का कारण – बाढ़ आने पर – बाड़ के समय – बाढ़ का पानी उतर जाने के बाद -हमारा कर्तव्य]

सचमुच, बाढ़ लोकमाता नदी का रौद्र रूप है। जोरों की वर्षा से और ऊंचे पहाड़ों पर जमी बर्फ पिघलकर बहने से तट-प्रदेश में बाढ़ का प्रलयंकारी तांडव नृत्य प्रारंभ हो जाता है। कभी-कभी भारी वर्षा के कारण नदी के बांध टूट जाते हैं और नदी में भयंकर बाढ़ आ जाती है।

बाढ़ का जल प्रचंड वेग से हहराता हुआ आगे बढ़ता है। उसकी कूर लपेट में जो कुछ आता है, वह बरबस खिंचा चला जाता है। जानवर रस्सी तोड़कर भागने की कोशिश करते हैं। वे दर्दभरी पुकार करते हुए भागते हैं। ऐसे समय मनुष्य की दुर्दशा की कोई सीमा नहीं रहती। कोई घर के छप्पर या पेड़ पर चढ़ जाता है, तो कोई गाँव के पास यदि टीला अथवा ऊँची भूमि हो तो उसकी शरण लेने दौड़ता है।

बाद के भयंकर वेग से नदी-किनारे पर खड़े बड़े-बड़े पेड़ पलभर में मूल से उखड़कर गिर पड़ते हैं और प्रवाह में बहने लगते हैं। नदी किनारे बसी हुई बस्तियों के छोटे-छोटे मकान पानी में डूब जाते हैं और झोंपड़ियों का तो नामोनिशान भी नहीं रहता! पानी का वेग और स्तर बढ़ते ही मिट्टी के कच्चे घर एकदम गिरने लगते हैं।

‘धड़ाम धड़ाम’ की आवाज़ों, करुण पुकारों और हाहाकार से सारा वातावरण शोकाकुल हो उठता है। खेतों में खड़ी हुई फसलें नष्ट हो जाती हैं। दबते हा मनष्य अपनी जान बचाने के लिए तिनके का सहारा ढंढते हैं। कभी-कभी कोई साहसी उन्हें बचा लेता है, तो कभी-कभी लोग बेबस होकर देखते ही रह जाते हैं।

बहुत-से लोग ऊंचे और पक्के मकानों में आशरा लेने की कोशिश करते हैं। पानी की धारा में पशुओं के शव तथा सांप, बिच्छू, आदि विषैले जीवजंतु भी बहते हुए नजर आते हैं। आसपास के गांवों के लोग सहायता के लिए आ पहुंचते हैं। सरकारी तौर पर भी सहायताकार्य शुरू होता है। लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया जाता है। हैलिकोप्टरों के जरिए बाढ़पीड़ित लोगों को मदद पहुंचाई जाती है। सामाजिक संस्थाएं भी सहायता के लिए आगे आती हैं।

बाढ़ के परिणामस्वरूप सैकड़ों-हजारों मनुष्य और पशु-पक्षी मौत के घाट उतर जाते हैं। स्त्रियाँ और बच्चे बेसहारा हो जाते हैं। बेघर लोगों का कोई शुमार नहीं रहता। उनके पास पहनने के लिए कपड़े नहीं होते, खुराक और पीने का पानी भी दुर्लभ हो जाता है। गड्ढों में जमा पानी और कीचड़ को दूर करना मुश्किल हो जाता है।

रास्ते और पुल टूट जाते हैं। संचार-व्यवस्था ठप हो जाती है। बाढ़ के कारण संपूर्ण जनजीवन चौपट हो जाता है और लाखों की संपत्ति मिट्टी में मिल जाती है। जानलेवा बीमारियां फैलने लगती हैं। हमारे देश में गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र, गोदावरी, नर्मदा आदि नदियों में वर्षाऋतु में अकसर भीषण बाढ़ आती है। तब आसपास विनाश, हाहाकार और दुःखभरे दृश्य दिखाई पड़ते हैं। इस परिस्थिति में बाढ़पीड़ितों की भरपूर सहायता करने के अतिरिक्त बाढ़ रोकने के लिए कारगर उपाय करना बहुत जरूरी है।

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कर्तव्यनिष्ठ सिपाही की आत्मकथा

[प्रस्तावना – जन्म – बचपन – शिक्षा – नौकरी-प्राप्ति धर्म-धन-घूस न लेना-ईमानदारी का फल-सुख]

मुझे गर्व है मेरे जीवन पर। मेरा जन्म सफल हो चुका है। मेरी आत्मकथा रंगीन नहीं, रोमांचक है, साहस से भरी है। मैं एक भूतपूर्व सिपाही! मैंने कई लड़ाइयों में हिस्सा लिया है। मेरे लिए मेरा देश ही ईश्वर है।

मेरा जन्म कांगड़ी के पहाड़ी प्रदेश में हुआ था। हमारे इलाके में खेतीबाड़ी के लायक जमीन बहुत कम है, इसलिए बहुत-से लोग सेना में भर्ती हो जाते हैं। इसीलिए हमें बचपन से ही व्यायाम की तालीम विशेष रूप से दी जाती थी। मेरे पिताजी भी एक सिपाही थे और वर्षों तक सेना में रहकर उन्होंने भारतमाता की सेवा की थी। मेरे मन में भी उनकी तरह एक सैनिक बनने की इच्छा थी। युवा होते-होते मैंने घुडसवारी, तैरना, पहाड़ पर चढ़ना आदि सीख लिया था।

आखिर एक दिन मैं देहरादून के सैनिक स्कूल में भर्ती हो गया। थोड़े दिनों में ही मैंने काफी अच्छी सैनिक-शिक्षा प्राप्त कर ली। राइफल, मशीनगन, तोप और टैंक आदि चलाने की मैंने पूरी तालीम ली। मोटरड्राइविंग में भी मैंने कई प्रमाणपत्र प्राप्त किए। युद्ध-स्थल की कार्यवाही, फायरिंग और गोलंदाजी का काफी अनभव प्राप्त किया।

आज़ादी के बाद मुझे सबसे पहले हैदराबाद की पुलिस कार्यवाही में निजाम की सेना का सामना करना पड़ा। इसके बाद कुछ वर्ष शांति से गुजरे। फिर चीन ने एकाएक हमारी उत्तरी सीमा पर हमला कर दिया। उसका मुकाबला करने के लिए हमारे डिवीजन को वहाँ भेजा गया। बर्फीले प्रदेशों में हमने चौकियां बना ली और पड़ाव डाले। हमें आधुनिक शस्त्रास्त्रों से सज्ज हजारों चीनी सैनिकों का सामना करना था।

एक बार हम कुछ सैनिक पहरा दे रहे थे, इतने में अचानक दुश्मन देश के सैनिक आ धमके। हमें प्यार से समझाकर सोने के सिक्कों से भरी थैली देना चाह रहे थे। मैंने उस दिन अपने प्राण हथेली पर रखकर उन सबका काम तमाम कर दिया। उनकी रिश्वत को ठोकर मार उनके एक सैनिक को जख्मी कर सारा धन लेकर वापिस उनकी सीमा में फेंक दिया।

युद्धविराम पश्चात् अपने घर वापस लौटा। माँ खुशी से पागल हो गई। पत्नी और मुन्ना बहुत खुश हुए। गाँव के लोगों ने बड़े चाव से अनुभव सुने। मुझे अपनी इस वीरता के बदले भारत सरकार ने ‘वीरचक्र’ से सम्मानीत किया। इसके बाद सन् 1971 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध में मुझे भेजा गया। उस युद्ध में मैंने बहुत वीरता दिखाई, पर मैं बुरी तरह घायल हो गया। मुझे महीनों अस्पताल में रहना पड़ा।

अब मैंने अवकाश पा लिया है। मैं अपने गांव में रहकर लोगों की छोटी-मोटी सेवा करता हूँ। आज भी देश के लिए प्राण न्यौछावर करने की तमन्ना रखता हूं। यह थी मेरी कहानी। अच्छा, तो अब मैं चलता हूँ। जय हिंद! जय भारत!

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एक देशप्रेमी की आत्मकथा
अथवा
एक देशभक्त की आत्मकथा

[बचपन – स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेना -जेलयात्रा – स्वतंत्रता-प्राप्ति पर हर्ष – पुरस्कार और पेंशन -अंतिम इच्छा]
जी हाँ, मैं एक देशभक्त हूँ, मैंने देश से प्रेम किया है। देशप्रेम के मार्ग के काँटों को भी फूल मानकर चमा है। आज अस्सी वर्ष की जर्जर आयु में भी देश ही मेरा देवता है। दरअसल देशप्रेम मुझे विरासत में मिला है। मेरे परदादा स्वतंत्रता की देवी रानी लक्ष्मीबाई की सेना में रहकर शहीद हुए थे। मेरे पिता लोकमान्य तिलक के कट्टर अनुयायी थे।

बचपन से ही मुझे उनके विचारों और संस्कारों ने प्रभावित किया था। मेरी पाठ्यपुस्तक में एक कविता थी, जिसकी निम्नलिखित पंक्तियाँ हमेशा मेरे ओठों पर रहती थीं “जननी का मान बढ़ाए जो, होता सपूत वह सच्चा है; जिसको स्वदेश से प्यार नहीं, उस नर से तो पशु अच्छा है!” इन्ही पंक्तियों को गुनगुनाते जब मैं हाईस्कूल से कॉलेज में पहुंचा तो देश की पराधीनता मुझे काटे की तरह खटकने लगी।

तिलक, गोखले, रानड़े आदि नेता जनता को स्वतंत्रता की प्रेरणा दे रहे थे। देश के लोग गुलामी की बेडियाँ तोड़ने के लिए बेचैन थे। गांधीजी के नेतृत्व ने स्वतंत्रता आंदोलन में नई जान फूंक दी थी। उनके सत्याग्रह के मंत्र से मुग्ध होकर मैं भी अपने कई साथियों के साथ स्वतंत्रता आंदोलन में कद पड़ा। सविनय अवज्ञा आंदोलन नमक सत्यागह और ‘भारत छोडो’ आंदोलन में मैंने दिल खोलकर भाग लिया। उनकी यादें आज भी मेरे हृदय को पुलकित कर देती हैं।

स्वतंत्रता के उस संघर्ष में जेल की यात्रा ही हम लोगों की तीर्थयात्रा बन गई थी। मैंने भी कई बार कारावास का स्वाद चखा। अंग्रेजों की जेले मानवीय यातनाओं की कूर क्रीड़ास्थली थीं ! मुझे और मेरे साथियों को घंटों तक बर्फ पर सुलाया जाता था। रात-रातभर सोने नहीं दिया जाता था। रहस्यों को उगलवाने के लिए हंटरों और चाबूकों से हमारी धुलाई की जाती थी। जो खाना हमें दिया जाता था, उसमें अनाज कम, कंकड़ ज्यादा होते थे। फिर भी सन् 1942 में जेलें सिनेमाघरों की तरह ‘हाउसफूल’ हो गई थीं!

हम लोगों के इसी त्याग-तप का यह परिणाम था कि 15 अगस्त, 1947 को देश स्वतंत्र हुआ। उस दिन सचमुच मैं खुशी से झूम उठा था। उस दिन को मैंने उसी तरह मनाया था जैसे लोग होली-दीवाली मनाते हैं। उस दिन के आनंद-उल्लासभरे दृश्य आज भी मेरी आँखों में बसे हुए हैं।

मैंने कभी किसी पद की कामना नहीं की। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् मैं आदिवासियों के उद्धार में लग गया। सन् 1973 में दिल्ली बुलाकर मुझे स्वातंत्र्य-सैनिक का पुरस्कार दिया गया। तबसे मुझे सरकार की ओर से पेंशन भी मिलनी शुरू हुई।

अब तो मैं तन-मन से पूरी तरह थक गया हूँ। एक ओर स्वतंत्र भारत पर हृदय गर्व और स्वाभिमान अनुभव करता है, तो दूसरी ओर देश में फैली गरीबी, अशिक्षा, शोषण, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, आतंकवाद आदि बुराइयों के कारण दिल टूक टूक हो जाता है। अब तो बस एक ही इच्छा है कि हमारा ‘स्वराज’ किसी तरह ‘सुराज’ में बदले और मरने के पहले मैं उन सपनों को सच में बदलते हुए देख लूं जो हमारे महान शहीदों ने देखे थे।

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एक बाढ़पीड़ित की आत्मकथा

[परिचय -सुखमय जीवन – बाढ़ से उथल-पुथल -दर-दर की ठोकरें -अंतिम अभिलाषा]
जी हाँ, मैं एक बाढ़पीड़ित हूँ। नदी की वे राक्षसी लहरें, उसका बढ़ता हुआ पानी आज भी इन आँखों के आगे घूम रहा है। कौन जानता था कि जो नदी हमारे गाँव को अपने जल से जीवन देती थी, वही एक दिन गाँव का जीवन छीन लेगी!

गाँव में मेरा परिवार सबसे अधिक सुखी था। माता-पिता की इकलौती संतान होने के कारण मेरा लालन-पालन बड़े लाड़-प्यार से हुआ था। मेरी पाँचों उँगलियां घी में थीं। मैंने सपने में भी दु:ख नहीं देखा था। समय होने पर मेरा विवाह भी हो गया और रूप-गुण से संपन्न पत्नी ने मेरे घर और जीवन में और भी रोशनी बिखेर दी। फिर वह प्यारी प्यारी भोली सूरत का चाँद-सा शिशु ! खुशियों से भरा पासपड़ोस और मेरा वह सुखी गाँव! किसी अनिष्ट की कल्पना भी कैसे हो सकती थी?

किंतु प्रकृति हमारे इस सुखी जीवन को देख न सकी। भयंकर गर्मी के बाद वर्षा की शीतल बूंदें पड़ने लगीं। आषाढ़ बरसा, सावन बरसा। गाँव की नदी पागल हो गई। आज तक उसने सारे गाँव को अपना मधुर जल पिलाया था, पर आज वह स्वयं सारे गाँव को मानो निगल जाना चाहती थी। सारा गांव नींद की बेखबर दुनिया में डूबा हआ था। पूनम की रात थी, फिर भी बाहर भयंकर अंधेरा छा रहा था! भयंकर गर्जना के साथ मुसलाधार पानी बरस रहा था।

एकाएक हहर हहर का घनघोर शोर गूंज उठा। लोग उठ बैठे। मैंने बाहर आकर देखा तो नदी दरवाजे की मेहमान बनी हुई थी और घर में आने की तैयारी कर रही थी। पासपड़ोस का भी यही हाल था। अपनी जान लेकर हम सबने भागने की कोशिश की, पर भागकर जाते कहाँ ? आखिर, छत पर चढ़ गए। मैं ऊपर से नदी की विनाशलीला देख रहा था, इतने में छत का एक हिस्सा गिरने लगा। देखते ही देखते कौन जाने क्या हो गया। इसके बाद जब मेरी आँखें खुली तो मैंने खुद को नगर के एक अस्पताल में पाया।

मैं तो बच गया, लेकिन नदी सबको हड़प कर गई। अस्पताल से निकलकर मैं बाहर भटकने लगा। आँखों में माँ-बाप, पत्नी तथा पुत्र के चेहरे बसे हुए थे। मैंने उनकी बड़ी तलाश की, लेकिन कुछ पता न चला। पेट के लिए मैंने दर-दर की ठोकरें खानी शुरू कीं। तभी एक दिन अखबार में पढ़ा की सरकार बाढ़पीड़ितों को काम देने का प्रबंध कर रही है। इसी सिलसिले में मुझे एक फैक्टरी में काम मिल गया।

एक शाम को फैक्टरी से लौटते समय मेरी दृष्टि एक स्त्री पर पड़ी। पास पहुंचा तो देखा कि वह लक्ष्मी है – मेरी पत्नी लक्ष्मी! हम दोनों मिलकर बड़े प्रसन्न हुए। बाद में उसने भी अपनी दुःखभरी आपबीती सुनाई। हम दोनों की आँखें आंसुओं से छलक उठी। आज हम दोनों एक छोटे-से घर में रहते हैं और किसी तरह अपनी जिंदगी बिता रहे हैं। पर गुजरे दिनों की याद अब भी हमारे दिल को रुला देती है।

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नर्मदा नदी बोलती है…

[प्रस्तावना – जन्म और बचपन – प्रपातों में मेरी छबि -गुजरात की भाग्यरेखा – महिमा -अभिलाषा]
जी हाँ, आपने मुझे सही पहचाना। मैं ही नर्मदा नदी हूँ। भारत की जो सात प्रमुख नदियाँ हैं, उनमें एक मैं भी हूँ। मेरी धारा में आज भी पौराणिक काल के पावन स्वर सुने जा सकते हैं।

मेरा जन्म मेकल पर्वतश्रेणी के अमरकण्टक पर्वत पर के एक कुण्ड से हुआ। वहाँ से मैं उछलती-कूदती हुई आगे बढ़ती हूँ। शाल के सुन्दर वृक्ष मुझे छाया देते हैं। उनके पत्ते मुझे लोरियाँ सुनाते हैं। उन वृक्षों के बीच बहते हुए मुझे बड़ा आनन्द आता है। बड़े-बड़े पत्थरों और शिलाओं से टकराना मुझे बहुत अच्छा लगता है। मेरे दो भाई हैं-विन्ध्याचल और सतपुड़ा, ये सदा मेरी रक्षा करते हैं।

कुण्ड से सात किलोमीटर चलने के बाद मैं साहस करके प्रपात के रूप में नीचे गिरती है। इस प्रपात का नाम कपिलधारा है। इसके नीचे दूधधारा प्रपात है। मेरी झर-झर ध्वनि बहुत दूर तक सुनाई देती – है। धुआँधार में मेरा उज्ज्वल रूप जिसने एक बार देख लिया, वह उसे कभी नहीं भल सकता। भेडाघाट में संगमरमर की नीली-पीली शिलाएँ दर्शकों का मन मोह लेती हैं। यहाँ लोग मुझ में नौकाविहार भी करते हैं। मेरे दोनों ओर घने जंगल हैं जिनमें आदिवासियों की बस्तियाँ हैं। आदिवासी लोग मुझे अपनी माता मानते हैं। मैं भी उन्हें स्नेह से सराबोर कर देती हूँ।

बहुत दूर तक मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में बहती हुई मैं गुजरात में प्रवेश करती हूँ। मेरा कुल बहावमार्ग 1312 किलोमीटर का है। गुजरात में नवागाम के समीप मुझ पर 1210.2 मीटर लम्बा और 137.6 मीटर ऊँचा बाँध बनाया जा रहा है। इस बांध से तैयार होनेवाले सरोवर को ‘सरदार सरोवर’ नाम दिया गया है। इस बाँध के तैयार हो जाने पर मैं गुजरात की भाग्यरेखा बन जाऊंगी। मेरे पानी का लाभ कच्छ और सौराष्ट्र जैसे पानी की तंगीवाले लोगों को मिलेगा। गुजरात के भडौंच शहर के पास मैं अरबसागर में समा जाती हूँ।

भारत के पौराणिक ग्रंथों में मेरी बड़ी महिमा गाई गई है। मेरे तटों पर अनेक ऋषि-मुनियों ने तप किया है। आज भी मेरे किनारों पर अनेक मंदिर हैं। इनमें ओंकारनाथ का प्रसिद्ध मंदिर भी है। बहुत से लोग मेरी परिक्रमा करते हैं। अपने प्रति लोगों का प्रेम, उनकी श्रद्धा-भक्ति देखकर मेरा हृदय गद्गद् हो उठता है। मेरी यही इच्छा है कि मैं युग-युग तक इसी तरह बहती रहूं और लोगों की सेवा करती रहूँ।

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हमारे त्योहार

[भारत और त्योहार -संस्कृति के प्रतीक – मनाने की विधि-आनंदप्राप्ति के साधन -कुछ दोष -हमारा कर्तव्य]
जीवन में त्योहार का बहुत महत्त्व है। हमारे देश में त्योहारों की योजना इस ढंग से की गई है कि प्रत्येक महीने और हर मौसम में लोग त्योहारों से आनंद और उल्लास प्राप्त कर सकें।

भारत के त्योहार भारतीय संस्कृति के प्रतीक हैं। एक ओर दशहरा अन्याय पर न्याय की विजयघोषणा करता है, तो दूसरी ओर दीवाली यह बताती है कि हम प्रकाश के पुजारी हैं, अंधकार के नहीं। होली नृत्य और संगीत, रंग और राग का त्योहार है। रक्षाबंधन भाई-बहन के नि:स्वार्थ और पवित्र स्नेह की महिमा गाता है। इनके अतिरिक्त महाशिवरात्रि, गोकुलाष्टमी, रामनवमी, गणेश चतुर्थी आदि त्योहारों में भी हमारी संस्कृति अपने भव्य और भिन्न-भिन्न रूपों में प्रतिबिंबित होती है।

15 अगस्त, 26 जनवरी, गांधी जयंती, तिलक जयंती आदि हमारे राष्ट्रीय त्योहार हैं। इन त्योहारों के पीछे हमारे देश का स्वर्णिम इतिहास है। लाखों शहीदों के बलिदान और अनेक महापुरुषों के त्याग की गौरवगाथा इनके साथ जुड़ी हुई है। इन त्योहारों से राष्ट्रीय एकता और अखंडता की भावना दृढ़ होती है। ये त्योहार हमें देशभक्ति और बलिदान का संदेश देते हैं।

त्योहार के दिन प्रायः स्कूल, कॉलेज, दफ्तर आदि बंद रहते हैं। प्रायः लोग घरों में मिष्टान्न बनाते और खाते-खिलाते हैं। धार्मिक त्योहारों में लोग व्रत-उपवास रखते हैं। त्योहारों के उपलक्ष में घरों में सफाई और सजावट की जाती है। रोशनी की जगमगाहट से वातावरण आलोकित हो उठता है, तो कहीं संगीत-नृत्य से जिंदगी झूम उठती है। त्योहारों के अवसर पर कहीं कहीं मेले, प्रदर्शनियाँ भी लगती हैं। सभी लोग कुछ समय के लिए दु:ख और चिंताओं से मुक्त होकर आनंद के सागर में गोते लगाते हैं। बच्चे तो मारे खुशी के फूले नहीं समाते ।

हमारे त्योहार आनंद और मनोरंजन के प्रधान साधन हैं। त्योहारों से लोगों को ताजगी, स्फूर्ति तथा प्रेरणा मिलती है। धार्मिक त्योहारों से तनमन की कालिमा धुल जाती है। त्योहार जातीयता और प्रांतीयता की दीवारों को ढहा देते हैं। वे हमारे दिलों में सहयोग और भाईचारा उत्पन्न करते हैं। इनसे हमें अन्याय और अत्याचारों से लड़कर देश में न्याय और शांति की स्थापना करने की प्रेरणा मिलती है, त्याग और तपस्या से जीवन को सुखी बनाने का सुनहरा संदेश मिलता है।

यह खेद की बात है कि आजकल कुछ लोग त्योहारों की पवित्रता को भुलाकर जुआ खेलते हैं, शराब पीते हैं और गाली-गलौज करते हैं। वे पैसा बरबाद करते हैं और कभी-कभी जरा-सी बात पर कहा-सुनी या हाथापाई भी करने लगते हैं। त्योहार का आनंद किसी भी हालत में विलासिता का पोषक नहीं होना चाहिए। त्योहार हमारे जीवन का सहारा और प्राणों का प्रकाश है, इसलिए हमें त्योहारों के महत्त्व को समझना चाहिए और उनसे संबंधित बुराइयों का त्याग करना चाहिए ।

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यदि मैं प्रधानमंत्री होता …

[प्रधानमंत्री बनना एक सौभाग्य – जनता की प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति करना – राजनीतिक सुधार -अन्य समस्याओं का हल -विदेश नीति – मेरा आदर्श]
किसी भी जनतंत्र देश में प्रधानमंत्री का विशेष महत्त्व होता है। मंत्रीमंडल में प्रधानमंत्री ही सबसे मुख्य होता है। उसकी दूरदर्शिता और कार्यकुशलता पर ही देश के भविष्य का आधार है। इसलिए यदि मैं अपने देश का प्रधानमंत्री होता तो अपने आपको, सचमुच, बड़ा भाग्यशाली मानता, क्योंकि देशसेवा का ऐसा अवसर शायद ही मिल सकता है।

आज हमारे देश में लाखों-करोड़ों लोगों को पेट भरने के लिए भोजन, पहनने के लिए कपड़ा और रहने के लिए घर नहीं मिलता। प्रधानमंत्री के नाते मैं सबसे पहले देश की जनता की इन प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भरसक प्रयत्न करता । मजदूरों, कारीगरों आदि के कल्याण के लिए तथा निम्न वर्ग की दशा सुधारने के लिए मैं विशेष आयोजन करता। देश के बहुमुखी विकास के लिए मैं हर संभव प्रयत्न करता।

हमारे देश में आज प्रांतवाद और जातिवाद पनप रहे हैं। राजनीतिक क्षेत्र में भष्टाचार बढ़ गया है। रिश्वतखोरी, कालाबाजारी, तस्करी और दंगे-फसादों की कोई सीमा ही नहीं रही। यदि मैं प्रधानमंत्री होता तो इन बुराइयों को दूर करने के लिए कड़े हाथों से काम लेता। किसी भी हालत में देश की एकता को बनाए रखता और देश की प्रगति के लिए जी-जान से कोशिश करता।

बेकारी और गरीबी जैसी समस्याओं को हल करने के लिए मैं छोटे-मोटे उद्योगों को प्रोत्साहन देता। निरक्षरता दूर करने के लिए उचित प्रबंध करता, भारतवासियों के स्वास्थ्यसुधार के लिए ठोस कदम उठाता, गांवों की प्रगति के लिए पंचायतों को विशेष अधिकार देता, समाजसुधारकों और ग्रामसेवकों को भी प्रोत्साहित करता। इसके अतिरिक्त देश में वैज्ञानिक शिक्षण के लिए ठोस आयोजन करता।

मैं भारत का प्रधानमंत्री बनकर सभी देशों के साथ सहयोग और मित्रता का व्यवहार रखता और गुटबंदी से अलग रहता। परमाणुशखों पर विश्वव्यापी प्रतिबंध लगवाने का पूर्ण समर्थन करता। मैं विद्यालयों में फौजी तालीम अनिवार्य कराता और सुरक्षा की दृष्टि से देश को आत्मनिर्भर बनाता। जहाँ तक हो सके, युद्ध से दूर रहता, फिर भी अन्यायपूर्ण आक्रमणों का मुंहतोड़ जवाब देता। भुज-बल और चरित्र-बल दोनों के समन्वय से देश को ऊँचा उठाने का प्रयत्न करता।

मैं अपनी सेवा और कर्तव्यनिष्ठा से देशवासियों के समक्ष एक आदर्श प्रस्तुत करने का प्रयत्न करता। मैं विरोध पक्षों के दृष्टिकोण को समझने की पूरी कोशिश करता और देश की समस्याओं को हल करने के लिए उनका भी सहयोग लेता। मेरे मंत्रीमंडल के सदस्यों को मैं उनकी योग्यता के अनुसार उचित जिम्मेदारी सौंपता। उन सबके प्रति मेरा व्यवहार सहानुभूतिपूर्ण और निष्पक्ष होता, फिर भी किसी तरह का भ्रष्टाचार मैं बर्दाश्त न करता। प्रधानमंत्री के नाते मेरा लक्ष्य देश को हर तरह से सुखी, समृद्ध और शक्तिशाली बनाना होता। काश! मैं अपनी अभिलाषाओं को पूर्ण कर पाऊँ !

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गजराज के किसान

[प्रस्तावना – खेतीप्रधान देश – राज्य – वातावरण की अनिश्चितता -खेती की उपयोगिता -किसान का कार्यभार -किसान की चिंता]
किसान श्रम, सेवा और त्याग की साक्षात् मूर्ति है। फटे-पुराने कपड़े, दुबला-पतला शरीर और नंगे पैर उसके दीन-हीन जीवन की कहानी सुनाते हैं। वह हमारा अन्नदाता कहा जाता है, फिर भी उसकी झोपड़ी में अकसर दरिद्रता का ही साम्राज्य रहता है!

किसान बड़े सबेरे हल-बैल लेकर अपने खेत में चला जाता है और दिनभर वहाँ खेती के काम में जुटा रहता है। दोपहर तक लगातार वह परिश्रम करता है। भोजन और थोड़ा आराम करके वह काम में लगता है और शाम तक सख्त मेहनत करता है। वैशाख-जेठ की कड़ी धूप पड़ रही हो, तब भी किसान अपने प्यारे बगीचे (खेत) को अपने खून से (पसीने से) सींचता रहता है।

भयंकर शीत में या दिल दहला देनेवाली बिजली की कड़कड़ाहट और वर्षा की झड़ियों में भी वह अपने काम में लगा रहता है। इस कठोर श्रम के बाद भी जब भाग्यदेवता उस पर प्रसन्न नहीं होते तो उसे मन मसोसकर रह जाना पड़ता है। भारतीय किसान का रहन-सहन बड़ा सीधा-सादा और सरल होता है। एक छोटी-सी झोपड़ी में या मिट्टी से बने कच्चे मकान में वह अपने परिवार के साथ रहता है।

उसे जीवनोपयोगी वस्तुएं भी पर्याप्त मात्रा में नहीं प्राप्त होती. फिर भी वह संतोष से अपना जीवन बिताता है। उसके जीवन में आए दिन बदलते हुए फैशन का नाम तक नहीं होता। वह तो प्रकृति के पालने में ही पलता है। साहस और आत्मसम्मान की उसमें कमी नहीं। परिश्रम और सेवा का तो वह अवतार ही है। वह दानधर्म करने में कोई कसर उठा नहीं रखता। वह दिल खोलकर आतिथ्य करता है।

हमारे अधिकांश किसान अशिक्षित और अंधविश्वासी हैं। भूत-प्रेत और जादू-टोने पर उसका अटूट विश्वास रहता है। मृत्युभोज, विवाह आदि में अपने खून की कमाई को पानी की तरह बहा देने में वह अपना गौरव समझता है, लकीर का फकीर जो ठहरा । इस तरह बेशुमार खर्च करने के कारण वह प्रायः साहूकारों एवं जमींदारों के चंगुल में फैसा रहता है।

ललितकलाओं और उद्योगों में रुचि न होने से वर्ष में चार मास तो वह हाथ पर हाथ धरे बैठा रहता है। ताड़ी, भांग, तंबाकू और शराब जैसी नशीली चीजों का सेवन करके कभी-कभी वह अपने सोने के संसार में आग लगा देता है। देश को आजादी मिलने के बाद हमारे किसानों की दशा में काफी सुधार हुआ है। आज वे भले ही गरीब हों, पर लाचार नहीं हैं। अब उन्हें खेती के नए तरीके सिखाए जा रहे हैं।

सरकार भी उनको उत्तम बीज, रासायनिक खाद और मशीन खरीदने के लिए भरपूर सहायता दे रही है। उन्हें सेठ-साहूकारों और जमींदारों के पंजे से छुड़ाने की भी भरसक कोशिश हो रही है। ग्रामपंचायतों की स्थापना उनके जीवन को बड़ी तेजी से बदल रही है। सचमुच, कृषिप्रधान भारत में किसान का बड़ा महत्त्व है। जिस दिन किसान सुख से झूमेगा, उस दिन भारत का भाग्य मुस्कराएगा। जय किसान!

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मातृप्रेम

[मां का जीवन में स्थान -मातृस्नेह -माता के प्रेम का प्रभाव – त्याग और बलिदान की मूर्ति -बालक में संस्कार सींचन -इतिहास प्रसिद्ध उदाहरण-कृष्ण, शिवाजी-मातृप्रेम ईश्वर तुल्य]

जननी या माँ शब्द का उच्चारण करते ही आँखों के सामने एक ऐसी दिव्य मूर्ति खड़ी हो जाती है, जिसकी माया-ममता का कोई ओरछोर नहीं; जिसकी गोद में बैठने का सुख त्रैलोक्य के राज्य-सिंहासन पर बैठने के सुख से भी बढ़कर है।

माता का स्नेह स्वाभाविक होता है। पशु-पक्षियों में भी अपार मातृप्रेम के अनेक उदाहरण मिलते हैं। बंदरिया अपने बच्चे को सदा अपने पेट से चिपकाए रहती है। बिल्ली अपने बच्चे को मुंह में दबाकर सुरक्षित स्थान पर ले जाती है, पर बच्चे के शरीर पर अपने दाँत की एक खरोंच तक नहीं पड़ने देती। कंगारू पेट की थैली में ही अपने बच्चे को रखता है। गौरैया स्वयं भूखी रहकर भी अपने बच्चे को चुगाती है। यही नहीं, कई बार पशु-पक्षी अपने बच्चों की रक्षा के लिए अपनी जान तक करवान कर देते हैं।

मातृप्रेम की तुलना में संसार के सारे प्रेम और रिश्ते-नाते फीके पड़ जाते हैं। माँ बच्चे की मुस्कराहट को देखकर स्वर्गीय सुख का अनुभव करती है। जब बच्चा रोता, बिलखता है या कभी ठोकर खाकर भूमि पर गिर पड़ता है, तब माँ उसे कितने दुलार से चूमकर उठाती है और उसका मन बहलाती है। चाहे बच्चा निकम्मा, कुरूप, मूर्ख, मंद बुद्धिवाला, अपाहिज, अंधा तथा गूंगा ही क्यों न हो, फिर भी उसके प्रति माता के प्रेम में कभी कमी नहीं आती। माता जिस प्रकार सुंदर, होनहार बच्चे का पालनपोषण करती है, उसी प्रकार निकम्मे बच्चे का भी।

बच्चे के रोगग्रस्त होने पर माता उसकी देखभाल में दिन-रात एक कर देती है। . पिता का स्नेह बहुधा बदले में कुछ पाने की आशा रखता है। वह पुत्र को इसलिए पालता-पोसता और पढ़ाता-लिखाता है कि बुढ़ापे में वह घर की जिम्मेदारी संभाल ले और उसकी सेवा करे। पुत्र निकम्मा या कपूत निकले तो पिता उसे घर से निकाल देना चाहता है या उसकी शिक्षा-दीक्षा में पैसा खर्च करने से साफ इन्कार कर देता है। लेकिन माता कभी ऐसा सोच भी नहीं सकती, वह ममता की मूरत जो ठहरी।

माता के नि:स्वार्थ और स्वाभाविक प्रेम से बच्चे में अनेक सद्गुणों का विकास होता है। माता के सदाचरण, सद्भाव और सत् प्रवृत्ति की अमिट छाप बालक के मन पर पड़ती है। माता का स्नेह – ही बालक को सच्चा मनुष्य बना सकता है। माता का एक बार का प्रोत्साहन ही ध्रुव के लिए ध्रुव-पद की प्राप्ति का हेतु बन गया था।

यदि जीजाबाई न होती तो छत्रपति शिवाजी भी वीर न होते। मोहन को महात्मा गांधी बनानेवाली भी उनकी माता पुतलीबाई ही तो थी। सचमुच, वात्सल्यमूर्ति माताओं ने अनेक नररत्नों को जन्म दिया है। पुत्र कुपुत्र बन सकता है, लेकिन माता कभी कुमाता नहीं बनती। सचमुच, वात्सल्यमयी माता का स्नेह अनुपम है।

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आतंकवाद – एक वैश्विक समस्या

[प्रस्तावना -आतंकवाद का स्वरूप – जान-माल का नुकसान -भय-आतंक का वातावरण-रोकने के उपाय – उपसंहार]
राजनीति और धर्म के क्षेत्रों में कट्टर सिद्धांतवाले अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए हिंसा का बेहिचक उपयोग करते आए हैं। आज का आतंकवाद पुराने समय से चली आ रही इसी हिंसक प्रवृत्ति का आधुनिक रूप है।

मुख्य रूप से आर्थिक, राजनीतिक और धार्मिक, इन तीन कारणों से आतंकवाद को प्रोत्साहन मिलता है। हमारे समाज में आर्थिक विषमता है। पढ़े-लिखे युवकों की संख्या बढ़ती जा रही है, लेकिन नौकरियाँ मिलती नहीं हैं। बेरोजगारी बढ़ रही है। पेट की आग बुझाने के लिए आदमी अनीति को ‘पाप’ नहीं मानता। धार्मिक उन्माद भी बढ़ रहा है। राजनेता अपनी रोटियां सेंकने के लिए सांप्रदायिक दंगे करवाने से बाज नहीं आते। कमजोर पक्ष के लोग जानते हैं कि वे आमने-सामने के युद्ध में जीत नहीं सकते। इसलिए वे चोरी-छिपे हमले करते हैं। आतंकवाद के नाम पर यही आजकल हो रहा है।

आज से कुछ दशक पहले गिने-चुने देश ही आतंकवाद के शिकार थे, परंतु आज तो दर्जनों देश उसके सिकंजे में आ गए हैं। भारत, नेपाल, श्रीलंका, अफगानिस्तान, इजरायल जैसे देश तो एक लम्बे अर्से से आतंकवादी गतिविधियों के केन्द्र बने हुए हैं। सितम्बर, 2001 को संयुक्त राष्ट्र अमेरिका की दो सुप्रसिद्ध इमारतों को आत्मघाती बम हमले में उड़ा दिया गया।

13 दिसम्बर, 2001 में भारत के संसदभवन पर जबरदस्त आतंकवादी आक्रमण हुआ, जिसमें पांच आतंकवादी मारे गए। गांधीनगर में अक्षरधाम पर भयंकर हमला हुआ। इंग्लैण्ड, रूस, युगोस्लाविया जैसे कई युरोपीय देश भी आतंकवाद की मार झेल रहे हैं। इस प्रकार अब आतंकवाद वैश्विक रूप ले चुका है।

आतंकवादी हमेशा बंदूक और बम की भाषा में बात करते हैं। वे केवल धमकी और जबरदस्ती का व्यवहार करना ही जानते हैं। लोगों में दहशत पैदा करने के लिए वे बसों, ट्रेनों, बाज़ारों, मंदिरों, सिनेमाघरों में बम विस्फोट करते हैं। वे प्रमुख नागरिकों और विमानों का अपहरण करते हैं। वे बैंक, पेट्रोलपंप आदि लूटते हैं। अपनी विचारधारा लादने के लिए वे हिंसा और भय का खुलकर उपयोग करते हैं। वे पुलिस और सेना की टुकड़ियों पर भी हमला करते हैं!

हमें आतंकवाद का मुंहतोड़ जवाब देना होगा। इस वैश्विक समस्या के समाधान के लिए पूरे विश्व को इसका सामना करना होगा। अफसोस इस बात का है कि कुछ देश अभी भी आतंकवाद को शह दे रहे हैं। उन्हें पता नहीं कि आतंकवाद का यह भस्मासुर एक दिन उन्हें भी नहीं छोड़ेगा।

आतंकवाद पर काबू पाने के लिए हमें सबसे पहले युवकों को रोजगार मुहैया कराने होंगे। शिक्षित युवकों को नौकरियाँ देनी होगी। इसके साथ ही स्वावलंबन के लिए कुटीर-उद्योगों को बढ़ावा देना होगा। आर्थिक विषमता कम करते हुए हमें धार्मिक सहिष्णुता पर जोर देना होगा। समाज में भेदभाव पैदा करनेवाले धर्मगुरुओं का बहिष्कार करना होगा। ‘सर्वधर्म समभाव’ की भावना ही आतंकवाद के सिरफिरेपन को सही दिशा दे पाएगी।

इसमें संदेह नहीं कि हमारे विश्वव्यापी प्रयत्न ही इस वैश्विक – समस्या का प्रभावी समाधान कर सकेंगे।

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अकाल – प्रकृति का अभिशाप

[प्रस्तावना – प्रकृति का रौद्र रूप -अकाल का स्वरूप – अकाल : में लोगों का जीवन -अकाल-पीड़ितों की सहायता -अकाल को : रोकने के उपाय – उपसंहार]

सौंदर्य, प्रेम तथा संवेदनाओं से भरी प्रकृति कभी-कभी रुष्ट भी : हो जाती है। उसका कोप कोई भी रूप ले सकता है। अकाल प्रकृति : के कोप का ही एक भयंकर रूप है। भारत जैसे कृषि-प्रधान देश के लिए अकाल किसी अभिशाप से कम नहीं है।

अकाल का प्रमुख कारण अनावृष्टि है। कभी-कभी कहीं एक वर्ष या कई वर्षों तक वर्षा नहीं होती। वर्षा के अभाव में धरती को पानी नहीं मिल पाता। सूर्य के लगातार ताप से धरती की नमी सूख जाती है। नदियाँ और तालाब भी सूख जाते हैं। कुओं का जलस्तर घट जाता है। इस स्थिति में खेतों में बीज बोने का कोई अर्थ नहीं होता। सिंचाई के लिए पर्याप्त जल न होने से खेती की कल्पना ही नहीं की जा सकती। पेय जल का भी संकट खड़ा हो जाता है।

अकाल की ऐसी स्थिति में जीना मुश्किल हो जाता है। आकाश में बादल तो आते हैं, पर वे निराशा के सिवाय और कुछ नहीं देते। खाद्यान्नों के दाम आसमान छूने लगते हैं। महंगाई की ज्वाला में झुलसते हुए लोग त्राहि-त्राहि पुकारने लगते हैं। गरीबों का जीना मुश्किल हो जाता है। पेट की आग बुझाने में उनके जानवर ही नहीं, घर के बर्तन तक बिक जाते हैं। गांवों की चहल-पहल वीरानी में बदल जाती है। घास-चारे के अभाव से मवेशी दम तोड़ने लगते हैं।

स्वतंत्रता से पहले भारत में अकाल-पीड़ितों को भयंकर यातनाएं झेलनी पड़ती थीं। लेकिन आज हमारे देश में ऐसी स्थिति नहीं है। अकाल पीड़ितों को हर तरह की सहायता दी जाती है। प्रादेशिक सरकारें उन्हें रोजगार और अनाज देती हैं। केंद्र सरकार भी उन्हें धन और अन्न मुहैया कराती है। सामाजिक संस्थाएं भी अकाल-पीड़ितों की मदद के लिए दौड़ पड़ती हैं। देशभर के कलाकार अकालग्रस्तों की मदद करने के लिए सहायता-कार्यक्रम करते हैं। लोगों को पेय जल पहुंचाने के लिए टेंकरों का उपयोग किया जाता है। नलकूप लगाए जाते हैं और नए कुएं खोदे जाते हैं।

अकाल जैसी बुरी स्थितियों को पैदा करने में लोगों का भी दोष होता है। आजकल पर्यावरणशास्त्री अकाल की रोकथाम करने में लगे हुए हैं। वृक्षारोपण की प्रवृत्ति को राष्ट्रीय स्तर पर प्रोत्साहित किया जा रहा है। वनों की कटाई पर कानूनी प्रतिबंध लगा दिया गया है। नदियों पर विशाल बाँध बनाए गए हैं। कुओं-तालाबों को अधिक गहरा किया जा रहा है। परमाणु शक्तिवाले देशों से संहारक शस्त्रों के परीक्षणों पर प्रतिबंध लगाने के लिए कहा जा रहा है।

अकाल राष्ट्र की विकासगामी योजनाओं का शत्रु है। इसके कारण प्रगति की ओर बढ़ते हुए चरण रुक जाते हैं। इसलिए अकाल के दैत्य से बचने के लिए प्रभावी उपाय करने चाहिए। खुशी की बात है कि अब लोग इस दिशा में जाग्रत होने लगे हैं।

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